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पूना पैक्ट गाँधी और सवर्णों की साजिश ?

 पूना पैक्ट गाँधी और सवर्णों की साजिश ?

     "गाँधी कोई महात्मा नहीं मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता  वो एक शातिर राजनेता हैं।" ये बात बाबा साहब आंबेडकर ने गाँधी के बारे में कही थी। क्यों कही थी? क्योंकि बाबा साहब गाँधी को बहुत अच्छे से जान चुके थे वो पहचान चुके थे कि कैसे गाँधी वर्ण व्यवस्था के कट्टर समर्थक हैं,  और वर्ण व्यवस्था को बनाये रखने के लिए, जातियों को बनाये रखने के लिए किस तरह से उन्होंने शातिर तरिके से बहुजनों की हकमारी की। इसीलिए डॉ० आंबेडकर उन्हें कहते थे कि वो कोई  महात्मा नहीं हैं। 

 



पूना पैक्ट

       पूना  पैक्ट 24 सितम्बर  १९३२ को हुआ था। यह समझौता महात्मा गाँधी और बाबा साहब भीम राव आंबेडकर के बीच पुणे की यरवदा जेल में हुआ था। यही वह समझौता था जिसने बहुजनों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया जिसकी भरपाई आजतक नहीं हो पायी है। 


    पूना-
पैक्ट बहुजनों की हकमारी का दस्तावेज है उन सबूतों की कब्र  है कि कैसे बहुजनों की हकमारी हुई है। सबसे पहले यह समझते हैं कि पूना पैक्ट क्या था ? पूना पैक्ट की शर्ते क्या थीं?

पूना पैक्ट क्या था ?

     यह एक ऐसे समझौते के रूप में था जिसमें अम्बेडकर बहुजनों के हक़ के लिए दृढप्रतिज्ञ थे और गाँधी ने वर्ण व्यवस्था को कायम रखने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी थी।

     पूना पैक्ट से पहले गोलमेज सम्मलेन हुए थे जिसमें पहला गोलमेज सम्मलेन और दूसरा गोलमेज सम्मलेन लन्दन में हुए थे बाबा साहब डॉ० अम्बेडकर भारत से लन्दन इन सम्मेलनों में भाग लेने गए थे।

       आंबेडकर अंग्रेजों के सामने भारत के उन जातियों या वहिष्कृत समुदायों की ओर  से प्रतिनिधित्व करने गए थे। यह पहली बार था जब भारत की ओर से अछूतों के लिए कोई हकों की बात करने गया था। अम्बेडकर ने वहां पहुंचकर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनल्ड को बताया कि किस प्रकार भारत में सामाजिक व्यवस्था जातियों में बंटी हुई है और इसका सबसे निचला तबका जिसे भारत में ये लोग ( सवर्ण) अछूत कहते हैं।  उसके साथ घ्रणित व्यवहार करते हैं, उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। उनका शोषण होता है, उनकी हकमारी होती है और कितने जुल्म-ज्यादती होती है। प्रथम और दूसरे गोलमेज सम्मलेन में बाबा साहब ने ये बात सभी सम्मलेन उपस्थित लोगों के सामने रखीं।

     बाबा साहब की इन बातों के खिलाफ गाँधी और कांग्रेस ने तमाम दुष्प्रचार किया कि अम्बेडकर विदेश में भारत को बदनाम कर रहे हैं, तथा देशद्रोही का काम कर रहे हैं। लेकिन बाबा साहब अपनी बात अंग्रेजों को समझाने में कामयाब रहे कि यहाँ पर ( भारत में ) जिस तरह से मुसलमान, सिक्खों और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को अलग  से गिनते हैं, उसी तरह आप अछूतों ( बहुजनों ) को हिन्दुओं से अलग गिनिए क्योंकि हिन्दू समाज और धर्म में अछूतों को कोई अधिकार नहीं है। अम्बेडकर की बातों को ब्रटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड  उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने स्वीकार कर लिया।

कम्युनल अवार्ड की घोषणा

     आंबेडकर की बातों को स्वीकार करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने 16 अगस्त 1932 को कम्युनल अवार्ड की घोषणा हुयी। इसमें कहा गया कि सिक्खों और मुसलमानों की तरह अछूत समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय की तरह माना जायेगा। यानी अछूतों को हिन्दू धर्म से अलग माना जायेगा। अछूतों को एक अलग समुदाय के तौर पर समझा जायेगा। और उनकी स्थिति सुधारने के लिए कुछ विशेष अधिकार दिए जायेंगे।

       कम्युनल अवार्ड में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की थी कि जो अछूत समुदाय होगा उसको अब --
     पृथक निर्वाचन क्षेत्र मिलेगा यानि सेपरेट इलेक्ट्रट एरिया होगा
   जिसमें वो अब अपने समुदाय ( दलित ) के प्रतिनिधि को सिर्फ दलित वोटर ही चुनेंगे।
इस प्रकार दलितों को दो अधिकार मिले --
प्रथम -- पृथक निर्वाचन का  और
दूसरा -- दो मत ( वोट ) देने का।

       आसान भाषा में इसे आप इस प्रकार समझिये ----
      जैसे वर्तमान में हम विधान सभा क्षेत्र देखते हैं। फिर लोकसभा क्षेत्र देखते हैं। तो कम्युनल अवार्ड में यह व्यवस्था की गयी थी कि जो अछूत समुदाय हैं उनकी विधान सभा क्षेत्रों में या लोक सभा क्षेत्रों में ये व्यवस्था होगी कि वहां से केवल अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का ही उम्मीदवार होगा अन्य कोई उम्मीदवार नहीं होगा। और उस उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति का होगा। मतलब दलित उम्मीदार और दलित ही मतदाता।

         इसके अतिरिक्त उस एरिया की जो सामान्य सीट का उम्मीदवार होगा उसमें भी मतदान का अधिकार दलितों को होगा।
    भारत  इतिहास में यह एक बहुत महत्वपूर्ण घटना थी जब दलितों भी भागीदारी राजनीति में शुरू करने का हक़ मिला। यद्पि गाँधी ने दूसरे गोलमेज सम्मलेन में इसके विरोध में इस व्यवस्था को गलतमाना और कहा कि दलितों को हिन्दुओं से अलग नहीं माना जा सकता और अलग से कोई विशेष अधिकार नहीं दिया जाये।
 

कम्युनल अवार्ड के विरोध में गाँधी का अनशन


       गाँधी  भारत में लौटकर यहाँ अंग्रेजों  पर दबाव बनाने की कोशिश की लेकिन इसका कोई फर्क नहीं पड़ा और कम्युनल अवार्ड की घोषणा कर दी गई। अंग्रेजों ने गाँधी की बातों को तथ्यहीन मानकर अम्बेडकर की बातों को स्वीकार किया और जो सच्चाई भी थी।
    20 सितम्बर 1932 को गाँधी ने कम्युनल अवार्ड के विरोध में  पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने कहा---

               'यदि अछूतों को हिन्दू धर्म से अलग गिना जायेगा, उन्हें पृथक निर्वाचन दिया जायेगा तो मैं अपनी जान दे दूंगा।'

      यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि गाँधी ने अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए कभी आमरण अनशन नहीं किया, लेकिन दलितों को मिले हक़ और अधिकार के विरोध में वे आमरण अनशन पर बैठ गए। कम्युनल अवार्ड से मिलने वाले हक़ और अधिकार दलितों का भविष्य सुधारते, उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक जीने का हक मिलता। मगर गाँधी इसके विरोध में धरने और अनशन पर बैठ गए।

     गाँधी के आमरण अनशन पर बैठते ही पुरे देश में खलबली मच गयी क्योंकि गाँधी पुरे देश में आजादी की लड़ाई के नायक के तौर पर देखे जाते थे। जब गाँधी आमरण अनशन पर बैठ गए और उनकी जान पर बन आयी तब कांग्रेस और उसके नेताओं ने अम्बेडकर के विरुद्ध साजिशे रचनी शुरू करदी। अख़बारों में आंबेडकर को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के लेख लिखे गए।  विभिन्न तरीकों से बाबा साहब पर दबाव डाला गया। बाबा साहब को धमकाया गया कि यदि गाँधी को कुछ हो गया तो हम आपके साथ ऐसा सुलूक करेंगे कि जैसा आपने सोचा भी नहीं होगा। कांग्रेस और सवर्णों ने अम्बेडकर को धमकी दी कि अगर गाँधी को कुछ होता है तो हम दलितों और पिछड़ों के घरों और वस्तियों में आग लगा देंगे उनकी हत्या कर देंगे।

पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर

      कस्तुरवा गाँधी ने आंबेडकर के सामने झोली फैलाकर खड़ी हो गयीं थी और कहा कि मुझे मेरे सुहाग की भीख दे दीजिये। अम्बेडकर पर पड़ रहे चौहतरफ़ा दबाव ने आंबेडकर को परेशान कर दिया वे जानते थे कि यदि गाँधी की जान गई तो सवर्ण लोग दलितों और पिछड़ों के साथ कितना भयानक सुलूक करेंगें। हिंसा और दलितों की जान बचाने को लेकर बाबा साहब मज़बूरी में बहुत दुखी मन से रोते हुए 24 सितम्बर को यरवदा जेल गए। उन्होंने गाँधी से कहा कि आप ठीक नहीं कर रहे हैं।  मेरे समाज के लोगों के लिए मैंने बहुत मेहनत की है लेकिन आप नहीं मान रहे हैं। गाँधी ने इसके प्रत्युत्तर में कहा कि मैं मर जाऊंगा मगर दलितों को हिन्दुओं से अलग नहीं होने दूंगा। दलितों को पृथक निर्वाचन नहीं मिलने दूंगा। आंबेडकर की आँखों से आंसू निकल रहे थे और रोते हुए उन्होंने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए।

       हस्ताक्षर करने से पहले आंबेडकर ने गाँधी से कहा मैंने आपकी बात मानी है लेकिन मैं चाहता हूँ की मेरे समाज को आरक्षण मिले क्योंकि मैं जानता हूँ जिस दिन आपके हाथ में सत्ता होगी मेरे समाज की स्थिति गुलाम की तरह ही होगी। अम्बेडकर ने पूना पैक्ट में संवैधानिक आरक्षण की मांग की। गाँधी ने मज़बूरी और दबाव में गाँधी ने यह बात स्वीकार कर ली क्योंकि आंबेडकर ने भी कह दिया था कि अगर यह बात आप नहीं मानते हैं तो मैं हस्ताक्षर नहीं करूँगा। इस प्रकार विधायिका और शिक्षा में आरक्षण दलितों को प्राप्त हुआ। लेकिन इस अधिकार  के लिए गाँधी ने बहुजनों से एक बहुत बड़ा अधिकार छीन लिया था। इसी पूना पैक्ट के आधार पर संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

क्या मिला पूना पैक्ट में दलितों अथवा अछूतों को ?

       गाँधी और आंबेडकर के बीच पूना समझौता 24 सितम्बर 1932 को सांय 5 बजे यरवदा जेल में हुआ। इसमें आंबेडकर को कम्युनल अवार्ड में मिले अधिकार त्यागने पड़े। पूना पैकट में आरक्षित सीटों की संख्या 148 करदी गयी ( कम्युनल अवार्ड में 71 सीट मिली थीं ) साथ ही अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए प्रत्येक प्रान्त में पर्याप्त धनराशि नियत की गई।
     सरकारी नौकरियों में अछूतों/दलितों को बिना किसी भेदभाव के भर्ती को सुनिश्चित किया गया। इस समझौते पर हस्ताक्षर कर  बाबा साहब ने गाँधी को प्राणदान दिया।

      "अम्बेडकर इस समझौते से बिल्कुल सहमत नहीं थे। उन्होंने गाँधी के आमरण अनशन को दलितों/अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने वाला, और आंबेडकर पर दबाव डालकर पीछे हटने को मजबूर करने के लिए गाँधी का नाटक करार दिया।

      1942 में आंबेडकर ने इस समझौते को धिक्कार के रूप में व्यक्त किया।  आंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'स्टेट ऑफ़ मायनॉरिटी ('State of Minority') में खुलकर पूना पैक्ट पर अपनी नाराजगी व्यक्त की।

निष्कर्ष
       उपरोक्त बातों के सन्दर्भ में ही आंबेडकर ने गाँधी को कहा था 'गाँधी कोई महात्मा नहीं मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता  वो एक शातिर राजनेता हैं। इसके पीछे यही कारण था कि जो गाँधी अहिंसा की बात करते थे उन्होंने दलितों को उनके हकों से बंचित करने के लिए आंबेडकर  विरुद्ध मानशिक हिंसा का सहारा लिया और उन्हें इस कदर मजबूर किया कि आंबेडकर को अंततः कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन और दोहरे मतदान के अधिकार को त्यागना पड़ा। 


       गाँधी जहाँ वर्ण व्यवस्था  के समर्थक थे तो आंबेडकर जातियों को जड़ से समाप्त करने के समर्थक थे।  गाँधी ने अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज और अपनी आत्मकथा में वर्ण व्यवस्था को सामाजिक रूप से अच्छा बताया है।  गाँधी हमेशा चतुवर्ण प्रणाली के पोषक थे जिसमें सबको उनकी जातिनुसार ही काम करने थे।  इस सन्दर्भ में आंबेडकर ने गाँधी से कहा कि अगर आप वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते हैं उसके अनुसार आपका वर्ण वैश्य है और आपको व्यापार करना चाहिए मगर आप वकील क्यों बने?


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