जानिए ऋग्वेद के सबसे लोकप्रिय देवता-इन्द्र- rigved ke devta indra ki kahani

 जानिए ऋग्वेद के सबसे लोकप्रिय  देवता-इन्द्र rigved ke devta indra ki kahani

         ऋग्वेद में जिस देवता की स्तुति में सबसे ज्यादा मन्त्रों की रचना की गयी उनका नाम इंद्र है। इंद्र आर्यों के सबसे बड़े और तेजस्वी देवता थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि आज हिन्दू धर्म में राम और कृष्ण को जिस प्रकार उच्च स्थान प्राप्त है उन्हें ऋग्वेदिककाल में कोई जनता तक नहीं था। यह इस बात का सूचक है कि राम और कृष्ण का उद्भव बाद में ही हुआ है। हिन्दू या फिर कहें कि सनातन ( वैदिक ) धर्म के सबसे लोकप्रिय देवता इंद्र ही थे। यद्पि ईरानी आर्यों ने जरथुस्त  के मत के अनुसार देव शब्द का अर्थ राक्षस और देवों के राजा इंद्र को राक्षसराज बना दिया है, पर यह समझना नितांत गलत होगा कि जरथुस्त से पहले भी इसका यही अर्थ था। यह हमे पता है कि , हि बिना अपवाद के सभी इंडो-यूरोपीय जातियों के पूर्वज दिव्य अर्थ ही में देव शब्द का उपयोग करते थे। इस ब्लॉग के माध्यम से हम ऋग्वेद में वर्णित इन्द्र के लिए मन्त्रों सहित उनके विषय में जानेंगे। 

 

bhagwan indra

 

 इन्द्र- 

ऋग्वेदिक ऋषियों में सबसे ज्येष्ठ भरद्वाज इंद्र की महिमा में कहते हैं ( 6 |17 ) ----

       "इन्द्र, रक्षा करो, जो कि तुम शत्रुओं से रक्षक, जो वृषभ ( मनोकामना पूरक ), जो शिप्रवान, जो मतियों ( अभिलाषाओं ) का वर्षक वृषभ हो, जो पर्वतों के विदारक वज्रधर, जो घोड़ों पर चलने वाले, वह इन्द्र विचित्र अन्न-धन प्रदान करे |2|"

      इसी प्रकार भरद्वाज के पुत्र गर्ग ने इंद्र को रक्षक कहते हुए प्रार्थना की है ( 6 | 47) ---

      "त्राता इंद्र, अविता ( रक्षक ) इंद्र, प्रत्येक यज्ञ में अच्छे से आह्वान किये गए इंद्र, शूर इंद्र, शक्र, पुरुहूत ( ज्यादा पुकारे जाने वाले ) इंद्र को मैं आहूत करता हूँ। मधवा ( धनवान ) इंद्र हमारी स्वस्ति करे | 11 |"

      "जो इंद्र रूप-रूप  में  भिन्न रूप हुआ, सो उसके रूप को बतलाने के लिए हैं। इंद्र ( अपनी ) मायाओं से बहुरूप होता है। इसके रथ में हज़ार घोड़े जुते हैं।"

     वशिष्ठ ( 7| 29| ) इंद्र को सोम पीने के लिए आमंत्रित करते हुए कहते हैं ---

    "हे इंद्र यह सोम तुम्हारे लिए छाना हुआ है। हे घोड़ेवाले, उसके पास जल्दी आओ। इस चारु ( भली प्रकार ) छने  को पियो और हे मधवा, आकर हमें मेघ (धन) दो |1|"

      सोम आर्यों और उनके देवताओं का अत्यंत प्रिय पेय पदार्थ था। उसको पीकर वह प्रसन्न और मस्त होते थे। वशिष्ठ ने ( 7 |32 ) कहा है--- 

     "यह दही के साथ मिश्रित  ( दध्याशिर ) सोम छान कर तैयार किये गये हैं। हे वज्र हस्त, मस्त होने के लिए दोनों घोड़ों पर सवार होकर उनके लिए उनके पास के स्थान में आओ |4|"

        वशिष्ठ शतयातु ( सौ जादूवाले ) कहे जाते थे, लेकिन वह जादू में चतुर इंद्र के बल पर ही।  इसलिए वह इंद्र से प्रार्थना करते हैं (7 |104 )---

     "हे इंद्र, माया ( छल-कपट ) से हिंसा करने वाले यातुधान ( जादूगर ) पुरुष और स्त्री का अंत करो। बिना गर्दन के राक्षस समाप्त हों, वे उगते सूर्य को भी न देख पायें  | 24 |"

        विश्वामित्र तीनों ऋषियों में सबसे पीछे प्रभुता में आये। उन्होंने सुदास  को अश्वमेध-यज्ञ कराया। वह इंद्र की स्तुति करते कहते हैं ( 3 | 32 )---

    "हे इंद्र, गवाशिर ( दूध-सहित ) मथे सफेद ( शुक्र ) सोम को पियो। तुम्हारे मदद के लिए  हम ( इसे ) देते हैं। ब्रह्मकृत ( मंत्रकर्ता ), मरुतगणों और रुद्रों के साथ तृप्त होने तक ( इसे ) पियो | 2 |"

      "हे इंद्र, जो तुम्हारे शक्ति और बल को बढ़ाते हैं, वह मारुति तुम्हारे ओज को बढ़ाएं।  हे  वज्र-हस्त,  सुमुकुटधर ( सुशिप्र ),  गण-सहित रुद्रों के साथ मध्यान्ह के सवन ( सत्र ) में ( सोम ) पीओ | 3 |"

        "सारे देव इंद्र के सुकृत को, बहुत से व्रतों वाले कर्म को नष्ट नहीं कर सकते। जिसने द्यौलोक  और इस पृथ्वी को धारण किया, सुदर्शना पूर्ण और उषा को पैदा किया | 8 |"

विश्वमित्र इंद्र के घोड़ों को मोरपंखी बतलाते हैं ( 3|45 )-----

  "हे इंद्र, मोर के रोमवाले मस्त घोड़ों के साथ आओ। ( जाल से ) फंसाने वाले बहेलिये की तरह, मरुभूमि की तरह कोई तुझे ना रोके | 1 |"

बामदेव इंद्र की प्रशंसा में कहते हैं (4 | 16 )-----

         "हे इंद्र, सूर्य के समीप रूप धारण करता है। अमृत के शरीर-हस्त वाले मृग की तरह तेज में जलाते सिंह की तरह, भयंकर होते आयुधों को धारण करता है | 14 |"

        "हे शूर, जनों के किसी युद्ध के भीतर तीक्ष्ण अशनि गिरे। हे स्वामी, जब घोर युद्ध हो तो हम लोगों के शरीर की तुम रक्षा करना जानो | 17 |" 

      "तुम बामदेव की स्तुतियों के रक्षक हो। ( हमारे ) अशत्रु हो युद्ध में सखा बनो। हे महाबुद्धिमान, हम तुम्हारा अनुगमन करें। तुम सदा स्तुति कर्ताओं के बहु प्रशंसनीय होओ | 18 |" 

बामदेव फिर कहते हैं ( 4 | 17 )---

       "हे इंद्र तुम महान हो। महा पृथ्वी ने तुम्हारा अनुमोदन किया। द्यौ ने तुम्हें  माना। तुमने अपने बल से वृत्र को मारा, अहि ( वृत्र ) द्वारा ग्रसी जाती सिन्धुओं ( नदियों ) को मुक्त किया | 1 |"

        "तुम्हारे प्रकाश के जन्मने पर द्यौलोक चमकने लगा। तुम्हारे कोप  से भयभीत भूमि कंपि, सुंदर होने वाले मेघ बढ़, नदियां आद्र कर मरूभूमियों को नष्ट करती चलीं | 2 |"

   बामदेव फिर गाते हैं ( 4 | 22 )---

      कामनापूरक श्रेष्ठ नेता शची-वान उग्र इंद्र चार धारवाले बज्र को दोनों बाहुओं  में लिये ऊनवाली ( भेड़ोंवाली या ढांकती ) पुरुष्णी  ( रावी ) का सेवन करते हैं, उसके स्थानों को मित्रता के लिए वयन  करते हैं | 2 |"

       जो उत्पन्न देव, देवतम  महान अन्नों और महान बलों से युक्त है। दोनों बाहुओं में बल धारण किये उसने अभिलषित, द्यौ और भूमि को बहुत कँपाया | 3 |"

बामदेव इंद्र के मुंह से उसकी महिमा कहलवाते हैं। (4|26)---

     "मैं मनु हूं, मैं सूर्य और कक्षीवान् विप्र ऋषि हूं। मैंने आर्जुनेय कुत्स को अलंकृत किया, मुझे ही उष्णा कवि करके देखो |1|"

      "मैंने आर्य के लिए भूमि दी, दाता मर्द को मैंने वृष्टि दी। मैं शब्द करते जल लाया। देव मेरे संकल्प का अनुगमन करते हैं |2|"

     "जब मैंने युद्ध में अतिथिग्व ( दिवोदास ) की रक्षा की, मैंने मस्त हो शम्बर के नौ और नब्बे पुर (दुर्ग ) ध्वस्त किये। तो सौंवी को ( उसे ) रहने के लिए दिया |3|"

      गुत्समद भी ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषियों में हैं। वह इंद्र की सर्वशक्तिमत्ता के बारे में कहते हैं (2|12)----

      "जिसकी आज्ञा में अश्व हैं, जिसकी में गायें, जिसकी में  ग्राम, जिसकी आज्ञा में सारे रथ हैं। जिसने सूर्य और उषा को पैदा किया, जो नदियों का नेता है ; हे लोगों, वह इंद्र है |7|"

      "जिसने पर्वतों में रहने वाले शम्बर को चालीसवीं  शरद में ( मार ) धरा। ओजस्वी हो जिसने सोए हुए अहि दानव को मारा। हे लोगों,वह इन्द्र है |11||"

     वशिष्ठ ने आर्यों की सारी विजयों का श्रेय इंद्र को दिया है। इनके दो सूक्तों में (7|18|10 ) ऋग्वैदिक आर्यों के संघर्षों के संबंध में बहुमूल्य सूचनाएं मिलती हैं, जिनका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। वह कहते हैं (7|18)----

    "हे इंद्र हमारे पितरों ने तुम्हारी स्तुति करते सारे बढ़िया धन प्राप्त किये। तुम से ही सुंदर दुधार गायें, तुम से ही अश्व हैं। देवों के भक्त को तुम बहुत सा धन देते हो |1|"

      "जैसे स्त्रियों के साथ राजा, वैसे ही विद्वान् और कवि तुम द्युतियों वाले होकर रहते हो। हे मघवन् स्त्रोताओं को गौवों और अश्वों के साथ रूप दो। धन के लिये हमें तुम सिखाओ |2|"

     "देवभक्ति-सहित स्पर्धा-युक्त यह मेरी मधुर स्तुतियां तुम्हारे पास जा रही हैं। हे इंद्र तुम्हारा पत्थय धन हमारी ओर आवै। तुम्हारी सुमति से हम शर्म (सुख ) युक्त होवें|3|"

     "जैसे धेनु के लिए सुंदर तृण, वैसे ही तुम्हें दुहने के लिए वशिष्ठ ने ब्रह्मों ( मंत्रों ) को रचा। सब तुम्हें ही गो-पति कहते हैं। इंद्र हमारी सुंदर स्तुति के पास आयें |4|"

     आंगिरस प्रियमेध कहते हैं (8|48)----

       "जो पास में प्राप्त है' उसे वज्रधारी इंद्र के लिये गाये मधुर आशिर ( दूध )दुहाती हैं |7|"

        'हे प्रियमेध- संतानों, अर्चना करो, खूब अर्चना करो, अर्चना करो। दुर्गध्वंसक को जैसे वैसे ही हे पुत्रों अर्चना करो |8|"

      गर्गर ( बाजा ) आवाज कर रहा है, गोधा ( गोह के चमड़ेवाला बाजा ) ध्वनि कर रही है। पिंगा ( पीली प्रत्यंचा ) चिल्ला रही हैं। इंद्र के लिये ब्रह्मा ( स्तुति ) उद्यत हो|9|"

       "शिशुकुमार की तरह नवीन रथ पर चढ़े पिता-माता ( द्यौलोक और पृथ्वी ) के सामने वह ( इन्द्र ) महिष ( महान् )  मृग के समान और बहुत कर्म वाले हैं |15 |"

       "हे सुंदर मुकुटवाले स्वामी, सुनहले रथ पर चढ़ो। सहस्रपाद, कोप-रहित निष्पाप, स्वस्थ से चलने वाले सुनहले रथ पर चढ़ो। तब हम दोनों मिलेंगे |16 |"

       आर्यों में कुछ लोग इंद्र के अस्तित्व पर संदेह करते थे, जैसा कि भ्रुगूगोत्रीय नेम के वचन ( 8| 89 ) से मालूम होता है----

      "यदि सत्य है तो युद्धेच्छुक को, इंद्र के लिए सच्चे स्तोम ( स्तोत्र ) को पढो। नेम ऋषि तो कहता है, इंद्र नहीं है। किसने ( इंद्र को ) देखा, फिर किसकी स्तुति करें |3|"

      नेम के ऐसा संदेह करने पर इंद्र ने स्वयं जवाब दिया----

       "हे भगत' यह हूं मैं' देख मुझे। यहां सारी सृष्टि को ( अपनी ) महिमा से मैं वश में करता हूं। दिशायें मेरे सत्य का बधावा देती हैं। मैं भुवनों का विदारक हूं | 4 |"   

      ऋषि इंद्र को शरीरधारी समझते थे। उसके मुकुट और दो भुजाओं का वर्णन ऊपर हो चुका है। विमद ( प्रजापति-पुत्र ) ने इंद्र की मूंछ-दाढ़ी ( श्मश्रु ) का वर्णन किया है (10|23)---

       "दाहिने हाथ में वज्र-युक्त, कार्य-निपुण घोड़ों के रथवाले इंद्र की हम पूजा करते हैं। सोम द्वारा प्रसन्न हो सेनाओं और अन्न के साथ अपनी श्मश्रु को हिलाते शत्रुओं के संहार के लिये वह प्रकट हुये |1|"

     "जैसे वृष्टि पशुयूथों को भिगोती है, वैसे ही हरित (पीले) सोम से इंद्र अपने शत्रुओं को भिगोते हैं। फिर सुन्दर यज्ञ में जा छने मधुर सोम को पीकर जैसे वायु वन को वैसे ही अपने शत्रुओं को हिलाते हैं। |4|"

       विमद ऋषि केवल सोम-पान से ही इंद्र की तृप्ति नहीं समझते, वह उनके भोजन के बारे में कहते हैं (10|23)----

      "हे इंद्र विमद-लोगों ने सुदाता तुम्हारे लिए अपूर्व विस्तृत स्तोम ( स्तुति ) रचा। इस ( इंद्र ) राजा के भोजन को हम जानते हैं, इसलिए गोपालकों की तरह ( ग्रास ) दिखा कर पास पशु को बुलाते हैं |6|"

       वसुक्र इंद्र की अद्वितीय प्रतिभा पर विश्वास रखते समझते हैं, कि इंद्र असंभव को संभव कर सकते हैं (10 | 28.3 )----

       "हे मघवन इंद्र, अन्न के लिए पुकारते समय तुम्हारे लिए जल्दी-जल्दी पत्थर से मददायक सोम को ( पीसकर हम ) छानते हैं, तुम उसको पीते हो। वे बैल पकाते हैं, तुम उन्हें खाते हो|3|"

      "हे स्तुत्य, मेरे लिए तुम ऐसा कर दो, कि नदियां उलटी दिशा में बहें। घास खानेवाला मृगा सिंह को भगाये, सियार बराह को वन से हटा दे |4|"

        "इंद्र की कृपा होने पर शशक स्वापद का सामना कर सकता है। मैं समीप जा ढेले से पहाड़ को तोड़ सकता हूं। ( उसकी  कृपा से ) महान् भी क्षुद्र के वश में आ सकता है, बछड़ा सांड से लड़ सकता है |9|"

       "पिंजड़े  में बंधा सिंह चारों ओर अपने पैर को जैसे रगड़े, वैसे ही गरुड ( बाज ) पक्षी अपना नख रगड़ने लगे। जो रुंधा प्यासा महिष है, उसके लिये यह गोधा पानी लाये |10|"

       इंद्र के रूप आदि के बारे में अंगिरास वरु कहते हैं ( 10 | 96 ) 

    "इसका वह वज्र हरित ( पीला ) है, जो आयास ( तांबे या पत्थर का ) अत्यंत सुंदर दोनों हाथों में है। धनी, शुशिप्र( सुमुकुट ), सुंदर, क्रोधरूपी वाणवाले इंद्र को हरित ( सुनहले ) सोम से अभिषिक्त किया | 3 |"

       जो हरित ( पीले ) मूंछ-दाढ़ी पीले केशवाले ताम्र से दृढ़ सोम पीकर शरीर ( बल ) को बढ़ाते हैं, जिसे हरित घोड़े यज्ञ में ले जाते हैं, वह दो घोड़ों पर चढ़े सारी दुर्गति को दूर करते हैं | 8 |"

        इंद्र मनुष्य की तरह साकार था, इस बात का उल्लेख यास्क भी करते हैं ( निरुक्त उत्तरषटक 7 | 2 | 2 )---  

      "देवताओं के आकार का चिंतन करते हुए पुरुष से लगते हैं। चेतनावान ( मनुष्य ) की तरह सी स्तुतियां (ऋचायें )  बतलाती हैं। पुरुष जैसे अंगों के साथ उनकी स्तुति की जाती है।"

         इंद्र संबंधी ऋचाओं के देखने से भी यास्क की बात की सत्यता का पता लगता है। इंद्र शिप्र ( शिर ठुड्डी या मुकुट ) वाले हैं। वह घोड़ों के रथ पर सवार होकर चलते हैं। वह सोम पीकर मस्त होते हैं। उनके दोनों हाथ में चार धारों वाला वज्र  है। उनके घोड़े मोरपंखी हैं उनके मुंह पर पीली दाढ़ी-मूछ है। उनके खाने के लिए भक्तगण वृषभ पकाते हैं। शचि  उनकी पत्नी है इत्यादि।

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