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लार्ड विलियम बैंटिक के सामाजिक और प्रशासनिक सुधार , सती प्रथा का अंत, ठगी का अंत, सरकारी सेवाओं में भेदभाव का अंत lord william bentinck reforms in hindi

लार्ड विलियम बैंटिक के सामाजिक और प्रशासनिक सुधार , सती प्रथा का अंत, ठगी का अंत, सरकारी सेवाओं में भेदभाव का अंत lord william bentinck reforms in hindi

    लार्ड विलियम बेंटिक भारतीय इतिहास में एक सम्मानित गवर्नर जनरल के रूप में विख्यात है। उसने भारतीय महिलाओं के विरुद्ध की जाने वाली अमानवीय प्रथा सती पर रोक लगा दी। विलियम बैंटिक ने अपने सुधारों से भारत में एक नए दौर की शुरुआत की।आज इस ब्लॉग में हम विलियम बैंटिक द्वारा किये गए सुधारों और उसकी उपलब्धियों का मूल्याँकन करेंगे। 

  

lord william bentinck
फोटो विकिपीडिया से प्राप्त


      लार्ड विलियम बैंटिक ने अपना जीवन सेना में एक एनसाइन के रूप में आरम्भ किया और शीघ्र ही लेफ्टिनेंट-कर्नल के पद तक पहुँच गया। 1796 ईस्वी में वह संसद का सदस्य चुना गया। वह नेपोलियन के विरुद्ध उत्तरी इटली में लड़ा। उसके सैनिक अनुभव के आधार पर 1803 ईस्वी में वह मद्रास का गवर्नर नियुक्त हुआ।  उसने अपने उदारवादी स्वभाव के कारण सेना में सैनिकों के माथे पर जातीय चिन्ह और कानों में बालियां पहनने पर 1806 ईस्वी में  रोक लगा दी, जिसके कारण उच्च जातीय भारतीय सैनिकों ने वैलोर में सैनिक विद्रोह कर दिया । इसके बाद कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर ने उसे इंग्लैंड वापिस बुला लिया। 

भारत का प्रथम गवर्नर जनरल

        लार्ड विलियम बैंटिक को 1828 ईस्वी में भारत का प्रथम गवर्नर जनरल बनाकर भारत भेजा गया। वह एमहर्स्ट के उत्तराधिकारी के रूप में भारत आया। बैंटिक स्वाभाव से एक कट्टर व्हिग ( उदारवादी ) था, वह इंग्लैंड में हुए सुधारों से बहुत अधिक प्रभावित था। भारत में उसने क्रूर रीती-रिवाजों को बंद कर दिया और भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्ति दी। उसने भारतीय समाचार प्रत्रों के प्रति अधिक नरम रूख अपनाया और भारतीय शिक्षा के सुधार के लिए प्रयास किये। 

   पी. ई. रॉबर्ट्स का कथन सत्य है कि "मैकाले का सुप्रसिद्ध कथन गवर्नर-जनरल की पवित्र मनोकामनाओं और उसकी नीति की अंतिम मनोवृत्ति को दर्शाता है न कि उसकी सफलता का प्रतिनिधित्व करता है।"

लार्ड विलियम बेंटिक के सुधार 

सती प्रथा का अंत करना 

    लार्ड विलियम बैंटिक से पूर्व किसी भी अन्य गवर्नर-जनरल ने सामाजिक प्रश्नों कोइतने साहसपूर्ण ढंग से हल करने का पर्यटन नहीं किया था। बैंटिक ने सती प्रथा जैसी क्रूर और आमनवीय प्रथा को समाप्त, किया साथ ही शिशुवध और ठगी  प्रथा का भी अंत किया। 

    सती प्रथा क्या थी -

  सती का अर्थ है एक 'एक पवित्र और सचरित्र स्त्री" ( यद्पि यह एक मनगढंत अर्थ है ) । भारतीय हिन्दू परम्परा के अनुसार पति-पत्नी का संबंध जन्म-जन्मांतर का है और पति  की मृत्यु हो जाने पर पत्नी को भी पति के साथ मर जाना चाहिए, बिडंबना यह थी कि पति के लिए ऐसी कोई वाध्यता नहीं थी।यद्पि मृतक के साथ उसकी प्रिय वस्तुओं को दफ़नाने की परम्परा बहुत प्राचीन काल से थी हड़प्पा सभ्यता में ऐसे अनेक शव  मिले जिसके साथ उनकी खाद्य वस्तुओं से लेकर कुत्ते तक को दफनाया गया था। 

      भारत में यह प्रथा ( सती ) सम्भतः शक लोग लाये थे। रामायण और महाभारत के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थ ,में सती का उल्लेख नहीं मिलता। यद्पि गुप्त शासक भानुगुप्त के 510 ई. के  एरण अभिलेख में भी सती का उल्लेख है। अठारहवीं  शतब्दी में ब्राह्मणों ने सती को शास्त्र-सम्मत बताकर यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि स्त्री के सती होने से उसके पति के कुल की सात पीढ़ियों तक के लोग स्वर्ग को प्राप्त करेंगे। तथाकथित उच्च वर्गीय ब्राह्मण, क्षत्रियों, और राजपूत कुलों में यह प्रथा अधिक प्रचलित थी। सती प्रथा का सबसे घ्रणित पक्ष यह था कि मृतक की विधवा स्त्री को ( चाहे किसी भी आयु की हो ) सती होने के लिए बाध्य किया जाता था।  कई बार स्त्री के विरोध करने पर उसे अचेत करके जबरन आग में फेंक दिया जाता था। 

    मुग़ल शासक अकबर ने इस प्रथा को प्रतिबंधित करने का प्रयत्न किया मगर असफल रहा। मराठा शासकों ने इसे अपने प्रेदशों में प्रतिबंधित कर दिया था। 

गोवा में पुर्तगालियों ने और चंद्रनगर में फ्रांसीसियों ने इस प्रथा को बन्द  करने का प्रयत्न किया। 1800 ईस्वी के पश्चात् ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय सामाजिक और धार्मिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति अपनाई।  बैंटिक से पूर्व कॉर्नवालिस, लार्ड मिटों, और लार्ड हेस्टिंग्ज ने गर्भवती स्त्रियों के सती होने पर रोक लगाई थी परन्तु सफल नहीं हुए। 

    राजा राम मोहन राय जैसे प्रगतिशील विचारक और समाज सुधारक ने लार्ड विलियम बैंटिक को इस प्रथा को अवैध घोषित करने के लिए प्रेरित किया। राममोहन राय की भाभी को भी उनके घर वालों ने सती कर दिया था, जिसके कारण उन्हें अपार दुःख हुआ और इस प्रथा को बंद करने के लिए आगे आये। अतः लार्ड विलियम बेंटिक ने दिसम्बर 1829 में नियम 17 के अनुसार विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर दिया गया। प्रारम्भ में यह नियम सिर्फ बंगाल के लिए बनाया गया लेकिन 1830 ईस्वी से यह नियम बम्बई और मद्रास प्रसिडेन्सी में भी लागू कर दिया गया। 

      इसी तरह लार्ड विलियम बैंटिक ने नर-बलि, और राजपूतों में प्रचलित लड़की ( शिशु) हत्या की प्रथा को भी बंद कर दिया। 

ठगी प्रथा को समाप्त करना 

    ठगी शब्द आज के संदर्भ में देखा जाये तो धोखे से पैसे हड़पने को ठगी कहते हैं लेकिन उस समय ठग, डाकुओं और हत्यारों के संगठित गिरोह थे जो निर्दोष और राहगीरों को लूटकर उनकी हत्या कर देते थे। ये लोग अपने शिकार लोगों का रुमाल से गाला घोंट देते थे जिसके लिए 'फ़ांसीगर' शब्द प्रयोग किया जाता था। 

    मुग़ल काल के अंत में कमजोर पुलिस व्यवस्था का लाभ उठाकर इन ठगों ने अपने गरोह की संख्या बढ़ा ली और ये अवध, हैदराबाद, राजपुताना तथा बुंदेलखंड के क्षेत्र में सक्रिय हो गए।  

    इन ठगों के गिरोह  में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मों के लोग थे। ये लोग अपने शिकार का सिर काटकर देवी के चरणों में चढ़ाते थे। 

    ठगों के अंत के लिए कर्नल स्लीमन को नियुक्त किया गया। कर्नल स्लीमन ने कठोर कार्यवाही करते हुए 1500 ठगों को गिरफ्तार कर, अधिकांश को फांसी पर लटका दिया। 1837 तक ठगों को लगभग समाप्त कर दिया गया। 

सरकारी सेवाओं में भेदभाव का अंत 

        1833 के चार्टर एक्ट की धरा 87 के अनुसार योग्यता ही सरकारी सेवा का आधार स्वीकार की गयी तथा कम्पनी के अधीनस्थ किसी भी भारतीय नागरिक को "जाति, धर्म, जन्मस्थान अथवा रंग" के आधार पर भेदभाव बंद कर दिया गया और सरकारी सेवा के लिए सभी को अवसर प्रदान किया गया। इस प्रकार लार्ड कार्नवालिस के समय से चली आ रही भेदभाव की नीति का अंत आकर दिया गया।  परन्तु व्यवहारिक रूप में यह बहुत कम प्रभावी हुआ। 

   भारतीय समाचार पत्रों के प्रति उदार नीति 

     लार्ड विलियम बैंटिक समाचारपत्रों को असंतोष से रक्षा का कवच मानता था।  इसलिए अपनी आलोचना के बाबजूद वह समाचारपत्रों की स्वतंत्रता के पक्ष में रहा।बैंटिक को स्वास्थ्य कारणों से स्तीफा देना पड़ा और भारतीय समाचार पत्रों को स्वायत्ता देने का श्रेय उसके उत्तराधिकारी चार्ल्स मेटकॉफ़ को ही प्राप्त हुआ। 

  विलियम बेंटिक के शिक्षा संबंधी सुधार 

     एल्फिंस्टन ने 1825 में कहा था कि सामाजिक सुधार का सबसे प्रभावशाली मार्ग शिक्षा से होकर जाता है।  और विलियम बेंटिक का सबसे महत्वपूर्ण कार्य शिक्षा से संबंधित ही था। बेंटिक ने लार्ड मैकाले को सार्वजानिक शिक्षा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया और मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपने सुप्रसिद्ध स्मरण पत्र ( minute ) में प्रतिपादित किया। 

    मैकाले ने भारत के आयुर्वेद विज्ञान, गणित, ज्योतिष, इतिहास तथा भूगोल की खिल्ली उड़ाई और कहा "क्या यह हमें मिथ्या धर्म से संबंधित इतिहास, गणित, ज्योतिष और आयुर्वेद पढ़ना है ?" मैकाले के अनुसार एक पाश्चात्य पुस्तकालयकी एक अलमारी भारत तथा अरब के समस्त साहित्य के बराबर है। मैकाले के अनुसार भारतीय भाषाओं में न तो तत्व है और न ही वैज्ञानिक जानकारी। 

     मैकाले वास्तव में अपनी शिक्षा नीति के प्रस्ताव द्वारा एक एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहता था जो रक्त और शरीर से तो भारतीय हो लेकिन विचार और बुध्दि से अंग्रेज हो। मैकाले ने अपने पिता को लिखे एक पत्र में आशा व्यक्त की थी कि यदि उसकी योजना सफल रही तो अगले 30 वर्षों में बंगाल के प्रतिष्ठित वर्ग में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा। 

  मैकाले के प्रस्ताव को 7 मार्च 1835 को स्वीकार कर लिया गया और यह निश्चय हुआ कि उच्च स्तरीय प्रशासन की भाषा अंग्रेजी होगी। उस समय से अंग्रेजी भाषा, साहित्य, राजनैतिक विचार तथा प्राकृतिक विज्ञान हमारी उच्च शिक्षा की नीति के आधार रहे हैं। 

1835 में लार्ड विलियम बेंटिक ने कलकत्ते में मेडिकल कॉलेज की नींव रखी। इस प्रकार भारत में अंग्रेजी शिक्षा का चलन लार्ड मैकाले द्वारा किया गया। 

लार्ड विलियम बेंटिक के वित्तीय सुधार 

   1828 में कम्पनी की वित्तीय स्थिति बहुत ख़राब थी और खर्च आय से अधिक था।  इस ख़राब वित्तीय दशा का कारण बर्मा युद्ध था। 

   गृह सर्कार ने बैंटिक को शांति तथा सार्वजानिक व्यय में मितव्ययता के आदेश दिए। 

   बेंटिक ने स्थिति को सँभालने के लिए दो समितियां गठित की एक सैनिक और दूसरी असैनिक। 

   कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स की अनुमति से उसने सैनिक भत्ता कम कर दिया। 

  कलकत्ता से 400 मील की परिधि में नियुक्त होने पर भत्ता आधा कर दिया गया। और इस प्रकार £120,000 की बचत हुयी। इसी प्रकार असैनिक भत्ते भी कम कर दिए गए। 

     बंगाल तथा पश्चिमोत्तर प्रान्त में भूमिकर संग्रहण के लिए ठोस कदम उठाये गए। पश्चिमोत्तर प्रान्त ( वर्तमान उत्तर प्रदेश ) में मार्टिन बर्ड की भूमि व्यवस्था से अधिक कर प्राप्त होने लगा। बैंटिक ने कार्यकुशल भारतीयों को अंग्रेजों के स्थान पर नियुक्ति देकर भी खर्च को कम किया। 

  अफीम के व्यापार को नियमित तथा लाइसेंस  प्रक्रिया के अंतर्गत किया और केवल बम्बई बंदरगाह से ही निर्यात करने की आज्ञा दी। 

    बैंटिक के इन  कंपनी शीघ्र ही घाटे से उबर गयी और 1 करोड़ वार्षिक  पर 2 करोड़ वार्षिक के लाभ में पहुँच गयी। 

बैंटिक के न्यायिक सुधार 

   कॉर्नवालिस  द्वारा गठित प्रांतीय अपीलीय तथा सर्किट न्यायालयों में काम अधिक बढ़ने के कारण बहुत सा कार्य शेष हो गया। इससे मुक्ति पाने के लिए बेंटिक ने ये न्यायलय बंद कर दिए तथा इसके स्थान पर दण्डनायको तथा कलेक्टरों को नियुक्त  कर दिया जो राजस्व तथा भ्रमणकारी  आयुक्तों के अधीन कार्य करते थे। दिल्ली तथा वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए पृथक सदर दीवानी तथा सदर निजामत अदालत इलाहाबाद में स्थापित की गयी। इससे लाभ यह हुआ  कि अब इस क्षेत्र के  लोगों को अपील के लिए कलकत्ता जाने की आवश्यकता नहीं थी । 

 न्यायालयों की फ़ारसी भाषा के स्थान पर स्थानीय भाषाओँ को भी प्रयोग करने की अनुमति दी गई। इसी तरह उच्च न्यायलयों में  सिर्फ अंग्रेजी भाषा  को प्रयोग किया जाने लगा। 

योग्य भारतीयों को मुंसिफ नियुक्त किया गया  और ये लोग सदर  अमीन के पद तक पहुँच  सकते थे। 

बैंटिक की भारतीय रियासतों के प्रति नीति 

        भारतीय रियासतों के प्रति  बेंटिक ने तटस्थाता  नीति अपनाई। लेकिन 1831 में मैसूर, 1834 में कुर्ग  तथा कछाड़  रियासतों को अंग्रेजी प्रदेश में मिला लिया गया क्योंकि वहां अत्यधिक अव्यवस्था थी। 

    बैंटिक का मूल्यांकन 

    अपने 7 वर्ष  के कार्यकाल में बेंटिक ने निरंतर युद्धों और संयोजन नीति  स्थान पर शांति और विकास की नीति  किया। उसके सुधारों के कारण अंग्रेजी राज्य अधिक सुढृढ़ हुआ। भारत के इतिहास में बेंटिक  का नाम सामजिक तथा प्रशासनिक सुधारों के लिए सदा स्मरणीय रहेगा। 

     

 


   

     


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