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कर्नाटक में अग्रेंजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष के कारण और परिणाम- Anglo French Rivalry In The Carnatic

कर्नाटक में अग्रेंजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष के कारण और परिणाम- Anglo French Rivalry In The Carnatic 

       पुर्तगालियों के भारत आगमन के साथ ही जलमार्ग द्वारा यूरोप और भारत के मध्य व्यापारिक संबंध बड़ी तेजी से विकसित हुए और एक-एक कर क्रमसः पुर्तगाली, डच, ब्रिटिश और फ्रेंच व्यापारी भारत में व्यापार करने आने लगे। पुर्तगाली और डच अंग्रेजी शक्ति के  सामने कमजोर पड़ गए  और शांतिपूर्वक व्यापार तक सिमित  हो गए। यूरोप की दो मुख्य शक्तियां इंग्लैंड और फ्रांस जो वहां भी आपस में घोर प्रतिद्वन्दी थे, भारत में भी दोनों कंपनियां आपस में उलझ गयीं। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य कर्नाटक में तीन युद्ध हुए जिन्हें हम 'आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष' कहते हैं।  आज इस ब्लॉग के माध्यम से हम इन  तीनों युद्धों कारणों और परिणाम के साथ ही  भारत पर इनके प्रभाव का भी अध्ययन करेंगें। 

anglo-french comptetion in karnatka

 

       1707 में अंतिम शक्तिशाली मुग़ल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु से मुग़ल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा जिसके कारण भारत में कोई शक्तिशाली शक्ति नहीं थी जो यूरोपियन्स पर नियंत्रण रखती। अनेक छोटे-छोटे राज्य उठ खड़े हुए जिससे इन यूरोपीय व्यापारियों को भारत की खोखली सैनिक शक्ति का अहसास हो गया था अतः अब वे भारत में व्यापार के लिए खुले तौर पर अधिकाधिक अधिकार करना चाहते थे।  ईस्ट इंडिया कम्पनी और फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी दोनों ही व्यापार से लाभ उठाना चाहती थीं और यह तभी संभव था जब भारत के व्यापार पर एकतरफा अधिकार हो जाये अर्थात दूसरी कंपनी मार्ग से हट जाये। 

   प्रथम कर्नाटक युद्ध के कारण 

       आंग्ल और फ्रांसीसी शाश्वत शत्रु थे और यह शत्रुतता सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में अधिक बढ़ गयी थी। इस शत्रुता का परिणाम यह होता था कि जब भी दोनों देशों में टकराब होता तो दुनियां के जिस कोने में भीं दोनों देश व्यापार कर रहे थे वहां भी दोनों देश लड़ने लग जाते थे। 

कर्नाटक में एंग्लों-फ्रेंच युद्ध, ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर आरम्भ हुआ। 

उस समय भारत में फ्रांसीसियों का मुख्य अड्डे पांडिचेरी में था जबकि मसौलीपट्म, कारिकल, माही, सूरत तथा चंद्रनगर में उनके उपकार्यालय थे। 

वहीँ अंग्रेजों की  मुख्य बस्तियां मद्रास , बम्बई और कलकत्ता थे। 

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कर्नाटक का प्रथम युद्ध 1746-48 

      इस युद्ध का मुख्य कारण ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार से उत्पन्न युद्ध था और भारत में यह उसका विस्तार मात्र था। 

कर्नाटक के नवाब की बिना परवाह किये दोनों कंपनियों में 1746 में युद्ध आरम्भ हो गया और न ही दोनों देशों की गृह सरकारों ने ऐसे किसी संघर्ष की आज्ञा दी थी। 

बारनैट के अधीन एक अंग्रेजी नौसैनिक टुकड़ी ने  फ्रांसीसियों के कुछ जलपोतों को अपने अधिकार में कर लिया। 

इससे भयभीत पांडिचेरी के फ्रेंच गवर्नर-जनरल 'डूप्ले' जो 1741 से उस पद पर था ने मॉरीसस स्थित फ्रांसीसी गवर्नर 'ला बर्डोने से सहयता की  मांगी। 

ला बर्डोने शीघ्र ही 3000 सैनिकों के साथ भारत आ पहुंचा और मद्रास के निकट कोरोमंडल तट के पास अंग्रेजी नौसेना को परास्त किया। इस सहायता को पाकर फ्रांसीसियों ने मद्रास को जल तथा थल दोनों ओर से घेर लिया। 

21 सितम्बर को मद्रास स्थित अंग्रेज अधिकारियों  और सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इन युद्धबंदियों में लार्ड क्लाइव भी था। 

ला बर्डोने मद्रास को फिरौती लेकर अंग्रेजों को लौटना चाहता था परन्तु डूप्ले ने इससे इंकार कर दिया। 

 ला बर्डोने इस सब के बाबजूद मोटी रकम लेकर मद्रास को अंग्रेजों के हवाले कर मॉरीशस लौट गया परन्तु डूप्ले ने इसे स्वीकार नहीं किया और मद्रास पर पुनः अधिकार कर लिया। 

डूप्ले पांडिचेरी से 18 मील दूर सेंट डेविड फोर्ट को जीतने में असफल रहा। 

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सेन्ट टोमे का युद्ध 

 कर्नाटक  का प्रथम युद्ध सिर्फ अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के ही बीच नहीं हुआ बल्कि इसने कर्नाटक  के नवाब अनवरुद्दीन को भी अपनी चपेट में ले लिया। 

कर्नाटक के नवाब ने दोनों कंपनियों को लड़ते हुए देखकर दोनों को आज्ञा दी कि वह युद्ध तुरंत बंद करें ताकि देश में अशांति उत्पन्न न हो। इस पर डूप्ले ने अनवरुद्दीन से कहा कि वह मद्रास को जीतकर नवाब के सुपुर्द कर देगा। 

परन्तु मद्रास को जीतने के बाद डूप्ले अपने वादे  से मुकर गया, इस पर कर्नाटक के नवाब ने अपनी सेना भेज दी। 

यह आश्चर्यजनक था कि फ्रांसीसी कैप्टेन पैराडाइज के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने नवाब की 10000 सेना को परास्त कर दिया जबकि फ्रांसीसी सेना में मात्र 230 फ्रांसीसी सैनिक और 700 भारतीय सैनिक थे। 

नवाब की सेना का नेतृत्व महफूज खां कर रहा था।  यह युद्ध अड्यार नदी के तट पर स्थित सेंट टोमे के स्थान पर हुआ था। 

इस युद्ध ने भारतीयों की सैनिक कमजोरियों को उजगार कर दिया। वहीं यूरोपियन सेना के अनुशासित प्रदर्शन का झंडा बुलंद हो गया और भारत की गुलामी के प्रथम चिन्ह इसी युद्ध में दृष्टिगोचर हो गए। 

ए ला शापल की सन्धि 1748 द्वारा यूरोप में दोनों देशों के मध्य ऑस्ट्रिया के उत्तराधिका का युद्ध समाप्त हो गया तथा मद्रास अंग्रेजों को पुनः प्राप्त हो गया। 

इस युद्ध ने नौसेना के महत्व को दर्शाया जहां स्थल पर फ्रांसीसी सेना ने विजय हासिल की वहीँ नौसेना के मामले में अंग्रेज श्रेष्ठ रहे।  डूप्ले ने अपनी चतुर कूटनीति और युद्ध नीति का प्रदर्शन किया। 

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कर्नाटक का द्वितीय युद्ध-1749-54 

      कर्नाटक के प्रथम युद्ध में मिली अप्रत्याशित विजय से डूप्ले की राजनीतिक इच्छाएं जाग उठीं। और फ्रांसीसी वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से उसने भारतीय राजाओं के परस्पर झगड़ों में भाग लेने का विचार किया। ( डूप्ले प्रथम व्यक्ति था जिसने भारतीय राजाओं के साथ राजनैतिक संबंध बनाने के उद्देश्य से अपनी सेना किराये पर देना शुरू किया ।)

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द्वितीय कर्नाटक युद्ध के कारण 

आसफ़जाह जो दक्कन में स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर चुका था, जिसकी मृत्यु 21 मई 1748 को हो गई। नासिरजंग (1748-50) उसके पश्चात नवाब बना। परन्तु आसफ़जाह के भतीजे जिसका नाम मुज़्ज़फ़रजंग था ने इस उत्तराधिकार को मानने से इंकार कर दिया। 

दूसरी और कर्नाटक में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। कर्नाटक के नवाब और उसके बहनोई चंदा साहिब के बीच विवाद खड़ा हो गया। 

शीघ्र ही ये दोनों झगड़े एक बड़े विवाद के रूप में सामने आये। 

डूप्ले जो पहले ही भारतीय राजाओं के झगड़े में हस्तक्षेप का मन बना चुका था ने इस स्थिति का लाभ उठाने का निश्चय किया। उसने दक्कन के लिए मुज़्ज़फ़रजंग और कर्नाटक की सूबेदारी के लिए चंदा साहिब का समर्थन करने का फैसला किया। 

दूसरी और अंग्रेजों को भी अपरिहार्य कारण से नासिरजंग और अनवरुद्दीन का समर्थन करना पड़ा। 

मुज़फ़्फ़रजंग, चंदा साहिब और फ्रेंच सेनाओं ने मिलकर अगस्त1749 में कर्णाटक के नवाब को वेल्लौर के निकट अम्बुर के स्थान पर मार गिराया। 

नासिरजंग भी 1750 में एक युद्ध में मारा गया। 

मुज़्ज़फ़रजंग दक्कन का सूबेदार बन गया , कृतज्ञ मुज़फ़रजंग ने डूप्ले को कृष्ण नदी के दक्षिण के मुग़ल प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त कर दिया। 

उत्तरी सरकारों के कुछ जिले भी फ्रांसीसियों को प्राप्त हो गए। एक फ्रांसीसी सैनिक टुकड़ी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद में तैनात कर दी गयी। 

वहीँ चंदा साहिब भी 1751 में कर्नाटक का नवाब बन गया।  इस प्रकार डूप्ले इस समय अपने राजनैतिक शक्ति की चरम सीमा पर था। 

लेकिन डूप्ले को यह सफलता ज्यादा समय तक नसीब नहीं हुयी और शीघ्र ही उसके सामने अंग्रेजी चुनौती थी। अनवरुद्दीन के पुत्र मुहम्मद अली ने त्रिचनापल्ली में शरण ली।  फ्रांसीसी और चंदा साहिब भी मिलकर त्रिचनापल्ली के दुर्ग को विजय करने में असफल रहे । क्लाइव ने मात्र 210 सैनिकों की सहायता से कर्नाटक की राजधानी अरकाट को जीत लिया। चंदा साहिब ने 4000 सैनिक भेजे लेकिन वह अरकाट को नहीं जीत सके। 

     1752 में स्ट्रिंगर लॉरेंस के नेतृत्व में त्रिचनापल्ली को भी बचा लिया।  फ्रांसीसी सेना ने हथियार डाल दिए तथा चंदा साहिब को तंजौर के राजा ने धोखे से मार डाला। 

     त्रिचनापल्ली की हार ने डूप्ले का भाग्य अंधकार में कर दिया। फ्रांसीसी कम्पनी के निर्देशकों ने इस हार और उससे हुयी जन-धन की हानि के लिए डूप्ले को जिम्मेदार ठहरया और उसे वापिस  बुला लिया। डूप्ले के स्थान पर 1754  में 'गोडेहू' को भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा गया। 1765 में दोनों कंपनियों के बीच एक अस्थाई सन्धि हो गयी। 

 

    कर्नाटक का तृतीय युद्ध 

कर्नाटक का तृतीय युद्ध यूरोपीय संघर्ष का परिणाम था।

1756  में सप्तवर्षीय युद्ध प्रारम्भ हो गया और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों में युद्ध शुरू हो गया। 

इस बीच अंग्रेजों के हाथ एक बहुत बड़ी सफलता लग चुकी थी जब उन्होंने 1757 के प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब को हराकर बंगाल की धन संपदा पर डाका डाल लिया था। फ्रांसीसी सरकार ने कॉउन्ट  लाली को भारत भेजा जिसे भारत पहुँचने में 12 महीने लग गए। अप्रैल 1758 में वह भारत पहुंचा। 

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काउंट लाली ने 1758 में फोर्ट सेंट डेविड को विजय कर लिया और तंजौर के राजा से 56 लाख रूपये की बकाया रकम बसूलने के लिए सेना भेज दी पर यह सेना असफल रही। लाली ने मद्रास को घेरने की असफल कोशिश की, क्योंकि अंग्रेज नौसेना के कारण उसे मद्रास का घेरा उठाना पड़ा। 

   लाली ने बस्सी को हैदराबाद से वापिस बुला लिया और यह उसकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुयी। अंग्रेजों की नौसेना ने पोकॉक के नतृत्व में फ्रांसीसी नौसेना को तीन बार पराजित किया और उसे बापस लौटने को बाध्य कर दिया। 

1760 में सर आयरकूट के नेतृत्व में अंग्रेजों ने वंदिवाश के स्थान पर फ्रेंच सेना को बुरी तरह पराजित किया। बस्सी को बंदी बना लिया गया।  फ़्रैंक्कियों को1761 में पूर्ण पराजय को स्वीकार करना पड़ा और वापस पांडिचेरी लौटना पड़ा। परन्तु अंग्रेजों ने पांडिचेरी को भी जीत लिया और पूरी तरह फ्रांसीसियों को पराजित कर  दिया।यद्पि अंत में 1763 की एक संधि द्वारा फ्रांसीसियों को पांडिचेरी सहित कुछ अन्य प्रदेश उन्हें लौटा दिए गए। इस प्रकार कर्णाटक के तीन युद्धों ने भारत और फ्रांसीसियों का भाग्य तय कर दिया। 

  निष्कर्ष 

         कर्नाटक में हुए इस तीनों युद्धों ने अंग्रेजों की श्रेष्ठता सिद्ध कर दी और फ्रांसीसियों को भारत के व्यापार से एकाधिकार के स्वप्न को चकनाचूर कर दिया।  फ्रांसीसी यूरोप की उलझनों के कारण असफलता का मुँह देखना पड़ा।  दोनों देशों की प्रशासनिक व्यवस्था में भरी भिन्नता थी जहां फ्रांस में स्वेछाचारी सम्राट थे, वहीँ इंग्लैंड में एक जागरूक लोकतंत्र स्थापित हो चुका था।  दोनों कंपनियों के गठन में भी भिन्नता थी फ्रेंच कम्पनी में सम्राट का भी 35 लाख लिव्र लगा था दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कम्पनी एक निजी कम्पनी थी। नौसेना की श्रेष्ठता के कारण अंग्रेजों ने आसानी से फ़्रांस की नौसेना को पराजित किया। बंगाल में मिली सफलता ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को धनाढ्य बना दिया था जबकि फ्रांसीसी मदद के लिए अपनी सरकार की ओर देखते थे।  

    

    

 


 

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