उत्तराखंड में पर्यावरण के संरक्षण के सन्दर्भ में ग्रामीण, जनजातियों एवं महिलाओं की भूमिका

          उत्तराखण्ड का इतिहास संघर्षों का इतिहास रहा है। यहाँ का ग्रामीण एवं जनजातीय समाज अपने हितों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहा है। उसके अपने प्राकृतिक एवं सामाजिक अधिकारों के लिए अनादिकाल से संघर्ष का मार्ग अपनाया है। औपनिवेशिक शासकों की नीतियों ने उनके सामाजिक ताने-बाने को जिस प्रकार छिन्न-छिन्न किया वो एक अत्यन्त घृणित कार्य था। औपनिवेशिक नीति निर्माताओं की वन भू-प्रबन्ध नीति का प्रभाव स्वतन्त्रोतर भारत में भी देखने को मिला। वन संरक्षण अथवा पर्यावरण संरक्षण केवल वर्तमान परिस्थितियों की देन नहीं है अपितु आज से हजारों वर्ष पूर्व से ही वनों के संरक्षण पर विचार किया जा रहा है। कश्मीर की एक कहावत है कि-

‘‘अन्न पोशों तेले, मेली पोशी वन’’

अर्थात खाद्य तभी तक टिकेगा जब तक किये वन हैं।

          वनों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सर्वप्रथम सितम्बर 1730 में राजस्थान के जोधपुर जिले के खोजडली गांव में यह आन्दोलन बड़े पैमाने पर हुए।

          इसी प्रकार आजादी के बाद उत्तराखण्ड में ब्रिटिश नीतियों के फलस्वरूप वनों को उत्पन्न खतरे से निपटने के लिए पहाड़ की महिलाओं ने विभिन्न आन्दोलनों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन आन्दोलन के विस्तृत अध्ययन से हमें महिलाआंे के संघर्ष का परिचय होगा।

चिपको आन्दोलन व उसका विस्तार

          चिपको आन्दोलन एक घटना मात्र नहीं यह पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा के लिए सतत चलने वाली प्रक्रिया है। चिपको आन्दोलन को एक अध्ययन मात्र में समाहित करना गागर में सागर भरने वाली बात है। चिपको आन्दोलन का सांकेतिक अर्थ यही है कि पेड़ों को बचाने के लिये पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, परन्तु पेड़ों को नहीं काटने देना है अर्थात प्राणों की आहुति देकर भी पेड़ों की रक्षा करना(1) उत्तराखण्ड राज्य के तीन जिलों उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ की सीमा चीन से लगती है चमोली तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों की रोजी-रोटी के लिये, व्यवसाय, मवेशी पालन तथा लघु वन उपज-जड़ी-बूटी, गोंद, शहद, चारे के लिए घास फूस, कृषि सम्बन्धी छोटे-मोटे औजार बनाना आदि था। यह भी स्पष्ट है कि भारत में गरीबी का सर्वाधिक प्रमुख स्रोत-भोजन, जलावन, चारे खाद निर्माण जरूरतों के लिए प्राकृतिक वानस्पतिक संसाधनों का अभाव है।(2) यद्यपि भारत सरकार ने वर्ष 1952 में ही पर्यावरण को वानस्पतिक रूप से संतुलित करने के उद्देश्य से भारत के भौगोलिक भूः भाग के 33 प्रतिशत क्षेत्र में वन लगाने का लक्ष्य रखा था, तथापि यह लक्ष्य कंभी प्राप्त नहीं किया जा सका। सातवी पंचवर्षीय योजना में सरकार ने अपने प्रयासों को दोहराते हुए स्वीकारा कि देश के भौगोलिक भूः भाग के 33 प्रतिशत में वन लगाने के कार्य को उच्च प्राथमिकता दी जायेगी जो कि वर्तमान में मात्र 22प्रतिशत है।(3)

          1962 तक तिब्बत व चीन के लोगों के साथ यहाँ के निवासी ऊन तथा हथकरघा उद्योग की वस्तुओं इत्यादि का व्यापार करते थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद परिस्थितियों में एकदम बदलाव आ गया। इसके कारण उत्तराखण्ड के लोगों का तिब्बत व चीन के साथ व्यापार खत्म हो गया। इसके कारण यहाँ लोगों की आजीविका पूर्णतया वनों पर निर्भर हो गयी। वनों के घटते हुए प्रतिशत के बावजूद कुमाऊँ व गढ़वाल की 80प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या की ऊर्जा व अन्य जरूरतों के लिए वनों पर निरंतर निर्भरता एक ओर अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन व विकास कार्यक्रमों की अपूर्णता की ओर इशारा करती है, तो दूसरी ओर ग्रामीण जनसंख्या में बढ़ते हुए कष्टों के सन्दर्भ में पनपते असन्तोष की ओर भी संकेत करती है।(4) प्राकृतिक संस्था (मसूरी) द्वारा जनता के लिए प्रतिबंधित वनों पर किये गए अध्ययन के अनुसार उत्तराखण्ड में 75प्रतिशत जनता चारा, पत्ती ईधन, सोतर और सूखे पत्ते के लिए पूरी तरह वनों पर निर्भर है।(5) एक अनुमान के अनुसार खाना पकाने, प्रकाश व्यवस्था तथा कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए घर तथा पानी गरम करने के लिए पहाड़ों में 98.59प्रतिशत ऊर्जा गैर व्यापारिक स्रोत अर्थात जलावन लकड़ी से प्राप्त की जाती है।(6)

          यद्यपि उत्तर औपनिवेशिक राज्य द्वारा 1952 में ही अपनी नवीन वन नीति का निर्धारण किया गया; तथापि ना तो इसके वन सम्बन्धी दृष्टिकोण व नियमों में औपनिवेशिक राज्य की तुलना में विशेष परिवर्तन हुए और न ही जनता के जंगलात सबंधी कष्टों का निवारण हो सका। उत्तर औपनिवेशिक राज्य की इस वन नीति व कार्य प्रणाली ने जनता की स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी कर तथा पर्यावरण व स्थानीय जनता विशेषतः महिलाओं के बीच घनिष्ठ सम्बन्धों को तिरस्कृत कर, पूँजीवादी पितृसत्तात्मक दृष्टि के तहत वनों के व्यावसायिक लाभ व अविवेकपूर्ण दोहन पर ही अधिकाधिक केन्द्रित किया।(7) जंगलों के अंधाधुंध अविवेकपूर्ण व अनवरत कटान से हुई क्षति का आकलन चण्डी प्रसाद भट्ट द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसे अग्रलिखित तालिका से समझा जा सकता है:-

 

 क्रम संख्या 

 1959 से 1969 में जंगलों की कटाई की दर 

 

 गिराने  वर्ष 

 ब्लॉक संख्या 

 कटे जंगलों का क्षेत्रफल एकड़ में 

 1

 1959

दशौली -VIII-IX

              6508

 2

 1960-61

 मन्दाकिनी-I

               498

 3

  1962-63

  मन्दाकिनी-I

             1659

 4

 1963-66

दशौली -V

              1068

 5

 1966-67

दशौली -V

              1872

 6

 1967-68

 दशौली -V

             1500

 7

 1968-69

दशौली -VI 

              1421

 8

 1968-69

 दशौली -VII

              973

 9

 1968-69

 दशौली -VI

              583

       

          विकास की एकांगी सोच तथा अक्षम शासन प्रणाली व शासन प्रबंध ने  वन अधिकारियों व ठेकेदारों के भ्रष्ट गठबन्धन को जन्म दिया, जिसने स्थानीय साधारण जनता के हितों व अधिकारों की अनदेखी कर वनों के उपयोग को निजी व प्रभावशाली वर्ग के हितों के लिए प्रमुख रूप से नियोजित किया।(12) स्वतन्त्रता के पश्चात पहाड़ में विकास के नाम पर विशाल बांधों के निर्माण, खनन, सड़कों व अन्य व्यावसायिक उपयोगों हेतु वनों के अविवेकपूर्ण व अंधाधुंध कटान को बढ़ावा दिया गया, जिसने न केवल पर्यावरणीय संकट को उपस्थित किया बल्कि महिलाओं की स्थिति को भी और दयनीय बना दिया। ‘‘संभवतः ग्रामीण निर्धन स्त्रियों को छोड़कर कोई अन्य समूह पर्यावरण के विनाश से इतना प्रभावित नहीं है। उनके प्रत्येक दिन की शुरूआत सूर्योदय के साथ ही ईधन, चारा तथा पानी की तलाश में यात्रा से होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्त्रियाँ बूढ़ी, जवान या गर्भवती हैं। रोजमर्रा की कठिन घरेलू जरूरतें उन्हें पूरी ही करनी पड़ती है। वानस्पतिक स्थितियाँ जैसे-जैसे बिगड़ती जाती हैं, इन गरीब महिलाओं की ईधन तलाश यात्रा और अधिक लम्बी तथा थकाऊ होती जाती है, गरीबी और पर्यावरणीय विनाश में जकड़ी इन गरीब ग्रामीण महिलाओं की मेहनत की दाद देनी होगी।’’(10)

          इसके अतिरिक्त बढ़ते परिस्थितकीय संकटों व प्राकृतिक आपदाओं यथा भूस्खलन, बाढ़ आदि के भयावह रूपों, जिन्होंने कि पहाड़ में वनों के महत्व को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया(11) के अतिरिक्त उत्तराखण्ड में क्रय शक्ति की कमी, आर्थिक विकल्पों (रोजगार) के अभाव, कृषि क्षेत्र की तुलनात्मक अलाभदायकता के बावजूद इस पर अत्याधिक निर्भरता, विभिन्न योजनाओं के लाभ से अधिसंख्या का वंचित रहना, आधुनिक विकास के लाभों का असमान वितरण व जनसंख्या के व्यापक हिस्से में फैली संसाधन-विहीनता तथा अभाव आदि के परिणामस्वरूप महिलाओं की वनों पर निर्भरता अत्याधिक बढ़ गई। हरिप्रिया रंगन ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि 1950 से 1970 तक की भारत सरकार की आर्थिक योजनाओं व नीतियों का पहाड़ी क्षेत्र की ग्रामीण जनसंख्या के आर्थिक स्तर, रोजगार के अवसरों, कृषि उत्पादकता व विस्तार तथा कृषकों के जीवन स्तर पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप आर्थिक विकल्पों के अभाव, संसाधनों की कमी व व्यापक गरीबी ने प्रवासी अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा दिया। साथ ही, कृषकों के अतिरिक्त महिलायें व हस्तकला उद्योग से सम्बद्ध लघु उत्पादक, इस व्यवस्था से और हाशिये पर चले गये।(12)

          इन्हीं उत्पीड़नात्मक खामियों के फलस्वरूप 1970 के दशक में चिपको तथा अचिपको आंदोलनों का आविर्भाव हुआ। यद्यपि चिपको आंदोलन का सूत्रपात जाने माने पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा एवं चंडीप्रसाद भट्ट ने किया था, परन्तु स्त्रियों ने इसे अपनाआंदोलन मानते हुए मोर्चा खोला।

चिपको अर्थ

          चिपको आंदोलन का नामकरण हिन्दी भाषा के शब्द चिपकोके आधार पर हुआ, जिसका अर्थ है चिपक जाना। पेड़ों को गिरने या कटने से बचाने के लिए लोग पेड़ों से चिपक जाते थे। दूसरी नागरिक रिपोर्ट के अनुसार, यह आंदोलन वर्ष 1973 में मार्च के महीने की एक सुबह तब शुरू हुआ जब चमोली जिले के सुदूर पहाड़ी कस्बे गोपेश्वर में इलाहाबाद की खेल सामान बनाने वाली साइमन कम्पनी के लोग देवदार के दस वृक्ष काटने के उद्देश्य से पहुँचे। शुरू में गांव वालों ने अनुरोध किया कि वे पेड़ न काटें, परन्तु जब ठेकेदार अड़े रहे तो ग्रामीणों ने चिन्हित वृक्षों का घेराव कर लिया तथा इनसे चिपक गये।(13) अन्ततः ठेकेदारों को विवश होकर वापस जाना पड़ा। इसके कुछ सप्ताह बाद इन्हीं ठेकेदारों ने रामपुरा फाटनामक गांव में पेड़ काटने की कोशिश की परन्तु चंडीप्रसाद भट्ट के नेतृत्व में ग्रामीणों ने वहाँ पहुँचकर उनकी कोशिश को एक बार फिर नाकाम कर दिया(14) यद्यपि सरकार की जंगलात व्यवस्था के विरूद्ध विशेषतः 1970 के दशक की शुरूआत से ही मुखर हो रहे ग्रामीण जनता के असंतोष व संघर्ष की विविध प्रतिरोधी अभिव्यक्तियों में महिलाओं की सहभागिता आरम्भ से ही स्पष्ट थी, तथापि चिपको आंदोलन में स्त्रियों का व्यापक व सक्रिय स्वतंत्र प्रवेश वर्ष 1974 में हुआ(15) जोशीमठ से 65 कि0 मी0 दूर रेणी गांव की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में, गांव के पुरूषों की अनुपस्थिति की परवाह न करते हुए रेणी गांव के नजदीक के जंगल में, ठेकेदार द्वारा पेड़ों को काटे जाने की कार्यवाही के विरोध में स्वतंत्र रूप से प्रतिरोध जताते हुए, सफलतापूर्वक ठेकेदारों को पेड़ों के कटान का कार्य छोड़कर वापस जाने के लिए विवश कर दिया(16) गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने न केवल गांव के पीछे स्थित जंगल को जाने वाले मार्ग को अवरूद्ध कर दिया था, बल्कि ठेकेदारों व मजदूरों को चुनौती देते हुए तीखी आवाज में कहा- यहाँ से अच्छी तरह चले जाओ, वरना इसका परिणाम बुरा होगा। आखिर हम तुम्हारी माँ-बहने हैं, जब संकट आता है तो वे आगे आती हैं, अगर जंगल कट गये तो अलकनंदा की भाँति बाढ़ आयेगी, भू-स्खलन होगा, घर खेत बर्बाद होंगे, कौन जानता है आगे क्या होगा। क्या तुम्हें मजदूरी दूसरे स्थानों पर नहीं मिलती? तुम संख्या में अधिक हो और तुम्हारे पास कुल्हाड़ियाँ है लेकिन यह बात मत भूलों कि हमारे सम्मुख तुम्हारी शक्ति कुछ भी नहीं है।(17) महिलाओं की स्वतंत्र, आत्मविश्वासपूर्ण, साहसपूर्ण सफल कार्यवाही ने जहाँ एक ओर इस तथ्य को सफलतापूर्वक सिद्ध किया कि सरकार की वन नीति के विरूद्ध जन संघर्ष बिना महिलाओं को सम्मिलित किये अधूरा है और ना ही व्यापक रूप से विस्तृत हो सकता है, तो वहीं दूसरी इस कार्यवाही से उपजे आत्मविश्वास ने उत्तराखण्ड के वन संघर्ष में बड़ी संख्या में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी व संघर्षपूर्ण आंदोलनात्मक रवैये को प्रोत्साहित किया, तथा साथ ही पुरूषों को सहयोग पर आश्रित न रहते हुए महिलाओं को स्वतंत्र रूप से आंदोलन करने की प्रेरणा दी।(18) सीमांत का खामोश सा गांव रैणीदुनिया का एक चर्चित गांव हो गया और गौरा देवी व अन्य महिलायें चिपको का प्रतीक बन गयी। चिपको आंदोलनपहाड़ में एक संशक्त आंदोलन के रूप में उभरा और शीघ्र ही समस्त चमोली जिले के साथ टिहरी गढ़वाल के क्षेत्र में भी फैल गया जिसके अग्रणी मोर्चे पर महिलायें खड़ी थी। गढ़वाल के अतिरिक्त, कुमाऊँ क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में स्त्रियों ने इस वन आंदोलन में अपनी भागीदारी दी।(19) 1970 के सम्पूर्ण दशक में उत्तराखण्ड वन आंदोलनों के सक्रिय विस्तार व प्रसार का साक्षी बना जिसमें वन नीति को बदलने की माँग भी एक सक्रिय मुद्दा थी।(20) वनों के कटान के खिलाफ तथा वनों के संरक्षण हेतु बादरी क्षेत्र (बंदिश),(21) 1976 में हैवेल घाटी, (22) 1978 में द्वाराहाट से कुछ दूरी पर स्थित चाँचरीधार, (23) जनौटी, पालड़ी तथा धयाड़ी आदि स्थानों, लोहीताल, (24) बालगंगा घाटी में (अमरसर जंगल को बचाने हेतु),(25) भागीरथी तथा अलकनंदा नदियों के बीच स्थित मालगुड़ी (बडियारगढ़),(26) 1979 मे ठुमकदार पट्टी लासी गांव (गोपेश्वर),(27) 1980 में श्यामपुर क्षेत्र (देहरादून) (28) दुगरी पतोली (जिला चमोली),(29) तथा यमुनाघाटी (उत्तरकाशी)(30) में हुए जन संघर्षों में स्थानीय जनता व महिलाओं की सक्रियता हिस्सेदारी प्रत्यक्ष हुई। कई गाँधीवादी समूहों जैसे दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ (टिहरी गढ़वाल) ने वन आंदोलन को संगठित करने में सहयोग किया।(31)

          जंगलात आंदोलन में शामिल महिलाओं द्वारा की जा रही माँगे (जो कि अन्य आंदोलनकारियों की भी माँगे थी) स्पष्ट करती है कि जंगलात आंदोलन मूलतः जंगलात के न्यायोचित व समान उपयोग के पक्ष में, व ठेकेदारी प्रथा के विरूद्ध स्थानीय जनता के हितों व आवश्यकताओं के संरक्षण की प्राथमिकता पर आधारित वन नीति व प्रबंधन की माँग को लेकर हुआ । महिलाओं की प्रमुख मांगे थी।(32)

1.      जंगल और वनवासियों को बर्बाद करने वाली नीलामी ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जाये।

2.      कच्चे माल का निर्यात क्षेत्र से बाहर न हो।

3.      वन सम्पदा पर आधारित छोटे-मोटे उद्योग-धंधों को चलाने के लिए वनवासियों को कच्चा माल, पूँजी और तकनीकी सहायता उपलब्ध करवायी जाये।

4.      वन व्यवस्था और प्रशासन में जंगलों की सुरक्षा के लिये वनवासियों को शामिल किया जाये।

5.      योजना आयोग के निर्देशानुसार वन श्रमिक सहकारी समितियों के द्वारा वन सम्पदा का दोहन किया जाये।

6.      चीड़ के जंगलों का विनाश करने वाली हिमालयी पद्धति (गहरे घाव लगाकर लीसा निकालने की पद्धति) तुरंत समाप्त की जाये।

          यद्यपि प्रत्यक्ष तौर पर वन आंदोलन मूलतः विकास की अविवेकपूर्ण नीति व दोषपूर्ण वन व्यवस्था व वन प्रबन्धन के खिलाफ स्थानीय ग्रामीण जनों के असंतोष को अभिव्यक्त करता है, तथापि महिलाओं की इसमें स्वतंत्र, साहसी, सक्रिय, निर्भीक तथा व्यापक सहभागिता ने इसे नये आयाम दिये। आंदोलन ने स्पष्ट किया कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं के लिए पर्यावरण के साथ सम्बन्ध कहीं अधिक भावात्मक, गहरे व महत्वपूर्ण हैं। चंड़ी प्रसाद भट्ट ने एक सभा में प्रस्तुत अपने निबंध में स्वीकार किया कि वर्ष 1975 का रैणी का स्त्री कार्यकर्तावाद उनके लिए. आँख खोलने वाला था क्योंकि इसके बाद ही इन्होंने महसूस करना शुरू किया कि गढ़वाल में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिए जंगल कितने अधिक महत्वपूर्ण थे।(33) महिला आंदोलनकारियों द्वारा प्रदर्शित भावनायें तथा उनके द्वारा दिये गये भाषण, लेखन, नारे व सम्बोधन आदि स्पष्ट करते है कि पर्यावरण का संकट उनके अस्तित्व से जुड़ा संकट था, अतः जंगलों की सुरक्षा का प्रश्न उनके लिए अस्तित्वमूलक प्रश्न बन गया। रेणी गांव की आंदोलनकारी महिलाओं ने पेड़ काटने आये मजदूरों को रोकते हुए कहा-भुला (भैय्या) यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें घास, लकड़ी, जड़ी-बूटी मिलती है, इस जंगल को मत काटो, जंगल काटोगे तो हमारा यह पहाड़ हमारे गांव पर गिर पड़ेगा, बाढ़ आयेगी, बगड़ बन जायेंगे, भुला हमारे मायके को बर्बाद मत करो----(34)

          वन नीति के विरोध में 15 मार्च 1974 को रैणी में आयोजित सभा में गोदावरी देवी, सोभती देवी, गंगादेवी, चंद्रा देवी आदि महिलाओं के समूह ने क्रमशः प्रतिज्ञा की- ये वन हमारे मायके हैं। माता-पिता से भी अधिक स्नेह हमें इनसे मिला है---- क्या चंद लोगों के चाहने पर जंगलों के पेड़ काटे जाते हैं।(35) सरकार की जंगलों के प्रति पितृसत्तात्मक पूँजीवादी दृष्टि, जो जंगलों के अंधाधुंध दोहन व लाभ पर एकक्षत्र रूप से आधारित थी, के विपरीत, महिलाओं की दृष्टि जंगलों को जीवन के सरंक्षण व जीवन के मूल आधार के रूप में देख रही थी। दृष्टिकोण की इस भिन्नता ने, महिलाओं के लिए जंगलात आंदोलन को मानव जीवन को बचाने व सरंक्षित रखने के लिए किये जा रहे संघर्ष के रूप में स्पष्ट किया। 1976 में शुरू हुए हैवेल घाटी में जंगलात आंदोलन में महिलाओं की व्यापकता व सक्रियता को निरस्त करने के उद्देश्य से जब वन विभाग के एक अधिकारी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि मूर्ख महिलाओं क्या तुम जानती हो? क्या हैं जंगल के उपकार-लीसा, लकड़ी और व्यापार(36) के प्रत्युत्तर में बचनी (महिला आंदोलनकारी) ने कहा-क्या हैं जंगल के उपकार-मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार(37) महिलाओं के लिये जंगलों के कटान का प्रत्यक्ष अर्थ था जलावन लकड़ी, घास-चारे व पानी का अभाव, और इसका प्रत्यक्ष परिणाम महिलाओं के अभावग्रस्त जीवन की बढ़ी हुई कठिनाइयों व कष्टों में व्यक्त होता था। यह एक महत्वपूर्ण कारण बना आंदोलन में महिलाओं के उग्र व निर्भीक प्रतिरोध तथा व्यापक व सक्रिय हिस्सेदारी का। नरेन्द्रनगर में हुए जंगलात आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुई महिला आंदोलनकारियों ने संकल्प लिया- जंगलों के रक्षार्थ जेल तो क्या हम प्राणों की बाजी लगा देंगे। व्यापारिक दोहन से घास, लकड़ी और पानी का अभाव हो गया है -- दैनिक आवश्यकताओं की उपेक्षा करके सरकार निरंतर जंगलों को कटवा रही है। -- नये पेड़ के नाम पर जनता के लिए जरूरी चारा और खाद देने वाले पेड़ों के स्थान पर देवदार तथा अंगू आदि को लगाकर व्यापारिक प्रजातियों को बढ़ावा दे रही है।(38) आर्थिक अवसरों की कमी, व आर्थिक संसाधनों के अभाव विशेष रूप से कृषि व लघु उद्योग धंधों की अलाभप्रद स्थिति या अभाव, के मद्देनजर आजीविका की तलाश में बड़ी संख्या में ग्रामीण पुरूषों के बर्हिप्रव्रजन का दर्द व कष्ट झेल रही महिलाओं के लिए जंगलात आंदोलन, स्थानीय आबादी के लिए रोजगार के अवसर जुटाने की संभावना के रूप में भी प्रकट हुआ। महिलाओं की दृष्टि में आंदोलन के माध्यम से सरकार की वन नीति में बदलाव, न केवल जनता के पलायन को रोकेगा बल्कि उन पर पारिवारिक उत्तरदायित्व व कृषि कार्यों के संदर्भ में पड़ रहे दोहरे बोझ को भी कम करेगा। 1979 में मालगुड़ (बडियागढ़) में चल रहे जंगलात आंदोलन के दौरान महिलाओं ने ठेकेदारों को सम्बोधित करते हुए कहा- जंगलों का व्यापारिक दोहन बंद होने से किसी के भी बेरोजगार होने का प्रश्न ही नहीं उठता -- पेड़ों की खेती करके हिमालयवासी अपना और अपने देशवासियों का उचित पालन पोषण कर रहे हैं।(39)

 गौरा देवी और चिपको आंदोलन

          महिलाओं द्वारा आंदोलन के दौरान विरोध प्रकट करने के लिए अपनाये गये एक-से-बढ़कर-एक उत्तम तरीकों से स्पष्ट था कि महिलाओं के लिए वनएक परिवार थे, उनके साथ महिलाओ के जीवंत सम्बंध थे, वे उनके अपनेथे जिनके साथ उनका भावनात्मक लगाव था। वे वनों को अपने माता-पिता, भाई या उनसे भी बढ़कर संरक्षक के रूप में देख रहीं थी जो उनके जीवन के आश्रय-रूप तथा जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले जीवन-आधार के रूप में थे। अतः वनों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए महिलाओं ने वृक्षों को राखी बाँधी।(40) तथा घायल चीड़ के पेड़ों पर गीली मिट्टी की मरहम पट्टी करते हुए उन पर लीसा निकालने वाली लोहे की पत्तियाँ उखाड़कर फेंक दी।(41) आंदोलन के दौरान महिलाओं के द्वारा लगाये गये नारे-भले कुल्हाड़े चमकेंगे हम पेड़ों पर चिपकेंगे, (42) ’पेड़ गिराने वालो सोचो-धरती माँ की खाल न नोचों(43) ’माँ बहिनों की यही पुकार, जंगल बचाने का हमें अधिकार’(44) ’जगलों के तीन उपकार- मिट्टी, पानी और बयार(45) आदि, स्त्रियों के प्राकृति के साथ निकटस्थ व प्रेमपूर्ण भावुक सम्बंध की भी गाथा प्रस्तुत कर रहे थे।

          आंदोलन के प्रसार के साथ ही महिलाओं ने संगठित होने तथा संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता महसूस की। चण्डी प्रसाद भट्ट के ग्राम स्वराज मंडल की सहायता से अनेक गांवों में महिला मंगल दल की स्थापना की गई। इनमें से अनेक ने, जंगलों तथा खेतों में होने वाली गतिविधियों का नियंत्रण तथा निर्णय का अधिकार प्राप्त करने का दावा किया।(46) महिला मंगल दल के माध्यम से महिलाओं ने घास-चारा तथा ईधन के बढ़ते अभाव को खत्म करने के लिए वनीकरणका कार्यक्रम जोर-शोर से चलाया। महिलाओं ने आंदोलन को व्यापक व सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक गांव में स्वयंसेवी संगठन, ‘महिला शक्ति जागरण का प्रयास, पर्यावरण/जंगल संवर्द्धन शिविरों का आयोजन किया।(47) महिलाओं ने भागवत कथा का प्रयोग कर उसे ऐसे मंच के रूप में परिवर्तित कर दिया कि वह वन संरक्षण सम्बन्धी विचार व लोक शिक्षा देने एवं अपनी बात सुनाने का मंच बन गया था।(48) आंदोलन ने महिलाओं की संगठन शक्ति, निर्भीकता, आत्मनिर्भरता तथा एकजुटता को भी प्रदर्शित किया।(49) ठेकेदारों की धमकी व प्रताड़ना तथा सरकार द्वारा गिरफ्तारी व दमन के तमाम प्रयासों के बावजूद, महिलाओं ने प्रत्येक चुनौती का सामना पूरी, निर्भीकता व साहस से किया, तथा प्रतिरोध संघर्ष के प्रत्येक मोर्चे पर वे अग्रणी रूप से मौजूद तथा सक्रिय देखीं।(50) महिलाओं की स्वतंत्र व बहादुरी भरी कार्यवाहियों व व्यापक सक्रियता ने अप्रत्यक्ष रूप से पितृसत्ता के दबाव व मान्यता को भी चुनौती दी, जो उन्हें मूक, निरीह, महत्वहीन, कमजोर मानता था।

          पुरूषों का रवैया स्त्रियों से कभी-कभी अलग व बिल्कुल विपरीत था जो वनों के प्रति स्त्री व पुरूषों की संवेदना के अंतर को भी स्पष्ट करता है। उदाहरण के लिए बादरी घाटी में जंगलों की नीलामी के विरूद्ध संघर्षरत जनता का तर्क था कि जब तक इस पिछड़े क्षेत्र में स्कूल, सड़कें तथा विकास कार्य नहीं होंगे, तब तक वे इस क्षेत्र के कीमती जंगलों से सरकार को कोई आमदनी नहीं होने देंगे।(51) दूसरे शब्दों में जंगल इनके लिए जलावन लकड़ी, घास के स्रोत व बाढ़ भूस्खलन आदि आपदाओं से बचाने वाले संरक्षक के रूप में नहीं, वरन सरकार से लाभदायक विनिमय प्रबंध करने के माध्यम के रूप में कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। सरकार यदि विकास कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम दे, तो उन्हें जंगलों को कटाने में कोई संकोच नहीं था।

          महिलायें शुरू से ही जंगलात आंदोलन के माध्यम से पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों व पुरूष वर्चस्व की मानसिकता को भी चुनौती दे रही थीं। दुगरी पतोली (जिलाचमोली) के वन आंदोलन के दौरान वन अधिकारियों के इस तर्क के विरूद्ध कि उन्होंने वृक्षों को काटने हेतु गांव के पुरूषों से सहमति ले ली हैं, महिलाओं ने तीखेपन से पूछा कि पेड़ गिराने से पूर्व उनसे मशविरा क्यों नही लिया गया। वे ही जंगलों से सर्वाधिक जुड़ी हैं।(52) पुरूषों का रवैया आंदोलन में स्त्रियों की सक्रियता के प्रति उपेक्षापूर्ण, असहयोगपूर्ण व विरोधपूर्ण था। दुगरी पतोली (जिला चमोली) में सरकार द्वारा सारे वृक्षों को कटवाने के निर्णय के प्रति पुरूषों ने चुप रहकर अपनी सहमति दे दी, किंतु महिलाओं ने पूर्ण सक्रियता से सरकार के इस कदम का विरोध किया। जब ग्राम प्रधान ने विरोध प्रदर्शन में महिलाओं का सक्रियता से साथ दिया, तो गांव के अन्य पुरूषों ने ग्राम प्रधान को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया यह कह कर कि इसने ही हमारी महिलाओं को भड़काया है, जिससे हमारी पत्नियाँ हमारा कहना नहीं मान रही हैं।(53) स्पष्टतः पुरूष स्त्रियों की कार्यवाहियों को पसंद नहीं करते थे। गोपा जोशी के अनुसार, रेणी गांव के पुरूषों ने स्त्रियों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया- गांव के मर्दो की ओर से स्त्रियों का उत्पीड़न इसी दिन से शुरू हो गया जब गौरा देवी ने गांव को 27 अन्य स्त्रियों के साथ मिलकर ठेकेदार के कर्मचारियों तथा वन विभाग के कुछ कर्मचारियों समेत 60 लोगों को रैणी जंगल में जाकर 2415 पेड़ काटने से रोक दिया। जिस समय स्त्रियाँ जंगल की ओर जाने वाले संकरे रास्ते को जाम कर रही थी, पुरूषों ने उन्हें सब प्रकार की धमकियाँ दीं और बाद में नशे में धुत होकर स्त्रियों के साथ बदसलूकी करने की कोशिश की। परन्तु स्त्रियाँ टस से मस नहीं हुई तथा उन्होनें बदसलूकी का डटकर से मुकाबला किया। अंततः एक आदमी ने गौरा देवी के मुँह पर थूक दिया। वह औरत फिर भी शांत भाव से अडिग रही --।

          गौरा देवी अपने इरादे के प्रति दृढ़ थी। ठेकेदार ने अपने आदमियों को जंगल में जाने देने के लिए गौरा देवी को रिश्वत देने की कोशिश की। जब उसने ठेकेदार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो वन विभाग के कर्मचारियों ने पुलिस बुलाने की धमकी दी। ठेकेदार ने कुछ ग्रामीणों के साथ मिलकर गौरादेवी की गिरफ्तारी से सम्बंधित लोकगीत तैयार किया-- वे लोग सारी रात यह लोकगीत गाते रहे तथा एक साथ मिलकर नाचते रहे ---।

          गांव को काली सूची में डलवाने के लिए चिपको महिला कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया जाने लगा। गांव के पुरूष कहते है कि चूंकि स्त्रियों के व्यवहार के कारण गांव को काली सूची में डाल दिया गया है, अब जवानों को, जिनमें से अधिसंख्या फौज में है, कहीं नौकरी नहीं मिलेगी और गांव में नमक और मिट्टी के तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी नहीं की जायेगी -- कार्यकर्ताओं को शांति का दुश्मन बताया जाने लगा।”(54)

          महिलाओं को हतोत्साहित करने के लिए पितृसत्ता के पास सबसे आसान हथियार उनके चरित्रपर निशाना साधना था, किंतु महिलाओं ने इससे अप्रभावित रहते हुए इसका डटकर सामना किया। रेणीके वन आंदोलन के दौरान महिलाओं के सक्रिय प्रतिरोध के प्रत्युत्तर में ठेकेदार की शह पाकर पतरौल (जंगल रक्षक) महिलाओं का उपहास करते हुए कहने लगा कि काम न धाम, चली आयी है घर बार छोड़कर! शर्म नहीं आती इन महिलाओं को, बेशर्म कहीं की, हम कोई अंधे तो नहीं हैं जो जंगल कटवा रहे है। हमारी तो नौकरी है जंगलों की रक्षा करना।(55)

          यद्यपि वन आंदोलन की तीव्रता 1980 के बाद प्रत्यक्ष नहीं होती, तथापि यह आंदोलन 1980 के बाद छिटपुट रूप में चलता रहा और जिला चमोली में इसका कोई न कोई रूप प्रकट होता रहा। हालाँकि वन आंदोलन में स्थानीय पुरूष भी जुड़े लेकिन यह मुख्य रूप से महिलाओं का आंदोलन था। यह उनके ही विरोध का नतीजा था कि सरकारी समिति बनी, अनुसंधान हुए और ऊपरी पहाड़ी इलाकों में जंगलों की कटाई पर रोक लगी।(56)

          चिपको आन्दोलन के दौरान स्त्रियों की संगठित व व्यापक प्रतिरोधी कार्यवाही का विस्तार अल्मोड़ा में खनन के विरोध में हुए आंदोलन में भी दिखा। महिलाओं का चिपको आंदोलन जहाँ लकड़ी की ठेकेदारी के विरूद्ध किया गया, वहीं अल्मोड़ा में उनका आंदोलन खनन के विरोध में था। सोमेश्वर घाटी के खीराकोट गांव में जहाँ कि गांव के ऊपर गांव का जंगल तथा उसके ऊपर सरकारी आरक्षित जंगल है, कई वर्षों पूर्व कानपुर के एक ठेकेदार ने सरकार से खड़िया-मिट्टी की खुदाई का पट्टा लिया। पत्थर को सड़क तक लाने के लिए उसे खीराकोट के बहारी छोर से उन रास्तों से होकर गुजरना पड़ता था जिनका इस्तेमाल ग्रामीण अपने खेतों की जुताई के लिए, पानी, ईधन या चारा लाने के लिए करते थे।(57) इसके परिणामस्वरूप स्त्रियों ने अनुभव किया कि उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मार्ग पर न केवल टटटुओं (मालवाही पशु) की आवाजाही से भीड़ बढ़ गई है, बल्कि जंगल में जाने के लिए उनका रास्ता भी अवरूद्ध हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी पाया कि खान का कचरा उनके संरक्षित वन को नष्ट कर रहा है। वर्षा के दिनों में खदान की यह धूलबहकर खेतों में पहुँच जाती है तथा उनमें पत्थर की तरह जम जाती है जिससे खेतों की जुताई असम्भव हो जाती है।(58) स्त्रियों ने हर संभव तरीके से खनन का जबरदस्त प्रतिरोध शुरू कर दिया- स्वयं तथा गांव के पुरूषों का खानों में काम करना बंद कर दिया तथा खेतों की भी सुरक्षा के लिए उसके इर्दगिर्द दीवार बना दी, प्रत्येक परिवार से धान एकत्र कर अदालती लड़ाई लड़ी, मालवाही पशुओं के आने-जाने वाले मार्ग पर भौतिक रूप से कब्जा कर लिया, खनन कार्य हेतु बाहर से बुलाये गये मजदूरों को काम नहीं करने दिया, ठेकेदार द्वारा भाड़े के गुंडे बुलवाने, घरों पर पत्थर बरसाने व आग लगवाने आदि जैसी उत्पीड़नात्मक कार्यवाही का निडरता से मुकाबला किया।(59)

          स्त्रियों का पुरूषों के लिये यह कथन कि तुम पहले हमें मारकर पहाड़ की चोटियों पर दफना दो तभी पहाड़ को हाथ लगा सकते हो या फिर यह कि हम खान श्रमिकों को पकड़कर बैठा लेंगे और उन्हें खान में खुदाई नहीं करने देगें, आदि कथन(60) स्त्रियों की जबरदस्त प्रतिरोधी भावना के साथ ही, पुरूष वर्चस्वके विरूद्ध उनकी निडरता व साहस की बानगी भी स्पष्ट करता है। सुरक्षित पर्यावरण के लिये महिलाओं का जबरदस्त संघर्ष सफल हुआ और 1982 के आखिरी दिनों में खनन कार्य को अंततः बन्द कर दिया गया। खीराकोट की स्त्रियाँ नुकसान की भरपाई करने में जुट गई, उन्होंने गढ्ढों को भरकर खेत के चारों ओरं सुरक्षा दीवार. बना दी ताकि पहाड़ से बहकर आने वाला कचरा उनके खेतों को क्षतिग्रस्त न कर सके, परन्तु उनका सबसे बड़ा पुरस्कार है इस अंचल के पिथौरागढ़ और झिरौली क्षेत्र में होने वाला आन्दोलन जो कि खीराकोट में हुए धरने-चिंगारी से भड़का।(61)

          आन्दोलन के दौरान महिलाओं ने जिस प्रकार अपनी अद्भुत संगठन शक्ति व क्षमता, व्यापक एकता व सहयोग की भावना, संघर्षशीलता, प्रतिरोध की क्षमता, दृढ़ता व साहस का व्यापक परिचय दिया, और जिस प्रकार महिलाओं द्वारा, पुरूषों के सत्तापक्ष या ताकतवर के समक्ष समर्पण कर देने की प्रवृत्ति के विपरीत; ताकतवर हितों/पुरूष सत्ता द्वारा किये गये हर प्रकार के उत्पीड़न, दमन व भय की कार्यवाही का बिना भयभीत हुए व बिना झुके हुए पूरी निडरता से मुकाबला किया गया, उससे स्पष्ट था कि वन आन्दोलन महिलाओं के लिये लैगिंक समानता व पितृसत्ता के व्यापक अर्थ में बदलाव की गहरी सम्भावनाओं व व्यापक क्षमताओं को भी अपने में समेटा हुआ था। इस आन्दोलन में महिलाओं की सहभागिता में, उस आधार भूमि का निर्माण किया जिसे कि पितृसत्ता के प्रति विरोध व्यक्त करने के लिये प्रचारित किया जा सकता था। किन्तु अफसोस की बात यह है कि आन्दोलन के दौरान प्रत्यक्ष हुई महिलाओं की क्रांतिकारी क्षमताओं व शक्तियों का विस्तार व रूपान्तरण सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के संरचनात्मक बदलाव के लिये होने वाले किसी अन्य आन्दोलन में परिवर्तित नहीं हो सका, और न ही पितृसत्ता की जड़ो पर कोई सार्थक प्रहार ही किया जा सका। आन्दोलन में महिलाओं द्वारा प्राप्त की गयी सीमित/आंशिक सफलता(62) के बावजूद यह लड़ाई मुख्यतः ठेकेदारों द्वारा वनों के निर्मम दोहन व सरकार की वन नीति के विरूद्ध वनों के संरक्षण व संवर्द्धन तक ही सीमित रह गयी और लैंगिक न्याय व समानता तथा पितृसत्ता से मुक्ति के सन्दर्भ में, सामाजिक रूपान्तरण की कोई सार्थक व स्थायी पहल को जन्म देने में असफल ही सिद्ध हुई। जैसा कि इस तथ्य से स्पष्ट है- बावजूद इस सच्चाई के कि उत्तराखण्ड की महिलायें लकड़ी की प्रजाति के बारे में पुरूषों की तुलना में कहीं बेहतर जानकारी रखती हैंक्योंकि जलावन की लकड़ी बीनने का काम मुख्यतः महिलायें ही करती है, उनकी हिस्सेदारी को कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया। सभी समितियों में यथा 1973 में सरकार द्वारा शुरू किया गया सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम हो, या 1980 में परती भूमि विकास कार्यक्रम के तहत बना 1985 में परती भूमि का विकास बोर्ड, या फिर संयुक्त वन प्रबन्ध परियोजना आदि इन सभी में महिलाओं की हिस्सेदारी को नजरंदाज किया गया।(63)

रक्षा सूत्र आन्दोलन

          रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण भागीरथी, मिलगना, यमुना, टॉस, धर्मगंगा, बालगंगा आदि कई नदी जलग्रहण क्षेत्रों में वन निगम द्वारा किए जाने वाले लाखों हरे पेड़ों की कटाई को सफलतापूर्वक रोक दिया गया। यहां तक कि टिहरी और उत्तरकाशी में सन् 1997 में लगभग 121 वन कर्मियों को वन मंत्रालय की एक जांच कमेटी के द्वारा निलंबित भी किया गया था। रक्षासूत्र आन्दोलन ने ग्राम वनके विकास-प्रसार पर भी ध्यान दिया। इसके अंतर्गत जहां-जहां पर लोग परम्परागत तरीके से वन बचाते आ रहे है और इसका दोहन भी अपनी आवश्यकतानुसार करते हैं। वनों के विनाश को रोकने में भारत सरकार के सन् 1983 के चिपको के साथ उस समझौते का खुला उल्लंघन माना गया है, जिसमें 1000 मीटर की ऊँचाई से वनों के कटान पर लगे प्रतिबंध को 10 वर्ष बाद यानि सन् 1994 में यह कहकर हटा दिया गया कि पेड़ों के कटान से जनता के हक-हकूकों की आपूर्ति की जाएगी। जबकि सन् 1983 में चिपको आंदोलन के साथ हुए इस समझौते के बाद सरकारी तंत्र ने वनों के संरक्षण का दायित्व स्वयं उठाया था।(64)

          इसके बावजूद भी टिहरी, उत्तरकाशी जनपदों में सन् 1983-98 के दौरान गोमुख, जांगला, नेलंग, कारचा, हार्षिल, बैंरगीखाल, हरून्ता, अडाला, मुखेम, रयाला, मोरी, भिलंग आदि कई वन क्षेत्रों में कोई भी स्थान ऐसा नहीं था, जहाँ पर वनों की कटाई प्रारम्भ न हुई हो। सन् 1994 में वनों की इस व्यावसायिक कटाई के खिलाफ रक्षासूत्र आन्दोलनप्रारम्भ हुआ। पर्यावरण संरक्षण से जुडे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वनों में जाकर कटान का अध्ययन किया था।

          यहाँ पर राई, कैल, मुरैंडा, मौरू, बांझ, बुरांस, के साथ अनेकों प्रकार की जड़ी-बूटियाँ एवं जैव विविधता मौजूद है। अध्ययन के दौरान पाया कि वन विभाग ने वन निगम के साथ मिलकर हजारों हरे पेड़ों पर छपान कर रखा था। वन निगम जंगलों में रातों-रात अंधाधुंध कटान करवा रहा था। कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा बनाई गई पर्यावरण टीम ने इसकी सूचना आस-पास के ग्रामीणों को दी थी। यह सूचना मिलने पर गांव के लोग सजग हुए।(65)

          इसमें दुर्भाग्य की बात यह थी कि जनप्रतिनिधि भी जंगलों को काटने का ठेका लिए हुए थे, जिसके कारण ग्रामीणों को पहले अपने ही जनप्रतिनिधियों से संघर्ष करना पड़ा था। इस प्रकार वन कटान को रोकने के सबंध में टिहरी-उत्तरकाशी के गांव थाती, खवाड़ा, भेटी, डालगांव, चैदियाट गांव, दिखौली, सौड़, भेटियारा, कमद, ल्वार्ख, मुखेम, हर्षिल, मुखवा, उत्तरकाशी आदि कई स्थानों पर हुई बैठकों में पेड़ों पर रक्षासूत्रबाँधे जाने का निर्णय लिया गया था, जिसे रक्षासूत्र आन्दोलन के रूप में जाना जाता है।

          रक्षासूत्र आन्दोलन की मांग थी कि जंगलों से सर्वप्रथम लोगों के हक-हकूकों की आपूर्ति होनी चाहिए, और वन कटान का सर्वाधिक दोषी वन निगम में आमूल-चूल परिवर्तन करने की मांग भी उठाई गई थी। इसके चलते ऊँचाई की दुर्लभ प्रजाति कैल, मुरेंडा, खर्सू, मौरू, बांझ, बुरांस, दालचीनी, देवदार आदि की लाखों वन प्रजातियों को बचाने का काम रक्षासूत्र आन्दोलन ने किया है।

          रक्षासूत्र आन्दोलन ने ग्राम वनके विकास-प्रसार पर भी ध्यान दिया। इसके अंतर्गत जहां-जहां पर लोग परंपरागत तरीके से वन बचाते आ रहे है और इसका दोहन भी अपनी आवश्यकतानुसार करते है, ऐसे कई गाँवों में ग्राम वन के संरक्षण के लिए भी पेड़ों पर रक्षासूत्र बांधे गए। ग्राम वन का प्रबंधन, वितरण, सुरक्षा गांव आधारित चैकीदारी प्रथा से की जाती है।

          वन चैकीदार का जीवन निर्वाह गांव वालों पर निर्भर रहता है। इसके कारण गांव वालों की चारापत्ती, खेती, फसल सुरक्षा, जंगली जानवरों से सुरक्षा तथा पड़ोसी गांव से भी जंगल की सुरक्षा की जाती है। इससे महिलाओं के कष्टमय जीवन को राहत मिलती है। वन संरक्षण व संवर्द्धन के साथ-साथ जल संरक्षण के काम को भी सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया गया।(66)

          रक्षासूत्र आंदोलन के चलते सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा बनाई गई हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने सन् 1995 से लगातार गांव-गांव में महिला संगठनों के साथ 400 छोटे तालाब बना दिए है, इसके साथ ही अग्नि नियंत्रण के लिए भी स्थान-स्थान पर रक्षासूत्र आन्दोलन किया है। परन्तु जब से लोगों को हक-हकूक मिलने कम हुए हैं तब से वनों को आग से बचाए रखना भी चुनौती है।

          रक्षासूत्र आन्दोलन में मन्दोदरी देवी, जेठी देवी, सुशीला पैन्यूली, सुमती नौटियाल, बंसती नेगी, मीना नौटियाल, कुंवरी कलूडा, गंगा देवी रावत, गंगा देवी चैहान, हिमला बहन, उमा देवी, विमला देवी, अनिता देवी और क्षेत्र की तमाम वे महिलाएं जो मुख्य रूप से दिखोली, चैदीयाट गांव, खवाडा, भेटी, बूढाकेदार, हर्षिल, मुखेम आदि कई गाँवों से सक्रिय योगदान दिया है।

          रक्षासूत्र आन्दोलन की सफलता ने वनों के प्रति एक नई दृष्टि को जन्म दिया। इसके बाद उत्तराखण्ड में विभिन्न इलाकों में विभिन्न मुद्दों को लेकर वनान्दोलन चलने लगे। कितु रक्षासूत्र आन्दोलन हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर वन बचाओं हेतु वन सम्मेलन करवाते हैं, जिसमें प्रत्येक क्षेत्र से कार्यकर्ताओं द्वारा वन संबंधी जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है।

          आन्दोलन की खास बात यह है कि इससे जुड़े कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष सघन वृक्षारोपण के साथ-साथ वनों को बचाने के लिए पेड़ों पर रक्षा बंधन करवाते हैं, ताकि लोगों की इन पेड़ों से आत्मीयता बंधे और वनों का व्यावसायिक दोहन न हो सके।

          पिछले 15-20 वर्षों के दौरान जहां-जहां अवैध कटान किया गया है वहां-वहां रक्षासूत्र आन्दोलन द्वारा गठित उत्तराखण्डवन अध्ययन जन समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में उन क्षेत्रों का विस्तृत ब्यौरा दिया है तथा उत्तर प्रदेश वन निगम को प्रतिवर्ष जो करोड़ों रूपयों का लाभ मिला है उसमें 80 प्रतिशत लाभ उत्तराखण्ड के वनों के कटान से प्राप्त हुआ है।

गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्वतीय शोध केन्द्र ने रक्षासूत्र की घटनाओं पर एक पुस्तक तैयार की है।

मैती आन्दोलन(67)

          उत्तराखंड राज्य में पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कई आन्दोलन पहले से ही चले आ रहे है, जैसे- चिपको आन्दोलन। इसी तरह उत्तराखंड में एक और आन्दोलन चला, जिसका नाम मैती आन्दोलनहै। आज जो एक सामाजिक रीति की तरह समूचे गढ़वाल में प्रसिद्ध है। जिसमें सामान्य जनमानस बढ़-चढ़ कर भाग लेते है। यह आन्दोलन पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अनूठी मिसाल कायम कर चुका है। जो आज गढ़वाल में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में भी अपनी छाप छोड़ चुका है।

मैती का तात्पर्य

          उत्तराखंड राज्य में मैतशब्द का मतलब मायकाहोता है, और मैतीशब्द का अर्थ मायके वालेसे है। मैती आन्दोलन का अभिप्राय उससे है, जब किसी भी लड़की की शादी हो रही हो, वह फेरे लेने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच एक पेड़ लगाकर उसे भी अपना मैती बनाती है। जिस की देख-रेख उसके मैती अर्थात् मायके वाले अपने घर के सदस्य (पुत्री या बहिन) के समान करते है।

 

 

आन्दोलन की प्रेरणा

          मैती आन्दोलन के जनक श्री कल्याण सिंह रावत जी कहते हैं की, इस आन्दोलन की प्रेरणा उन्हें चिपको आंदोलन से मिली। जब सरकारी वृक्षारोपण अभियान विफल हो रहे थे। एक ही जगह पर पांच-पांच बार पेड़ लगाए जाने पर उसका नतीजा शून्य होता। इतनी बार पेड़ लगाने के बावजूद पेड़ दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इन हालात को देखते हुए मन में यह बात आई कि जब तक हम लोगों को भावनात्मक रूप से सक्रिय नहीं करेंगे, तब तक वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम सफल नहीं हो सकते। जब लोग भावनात्मक रूप से वृक्षारोपण से जुड़ेंगे तो पेड़ लगाने के बाद उसके चारों ओर दीवार या बाड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लोग खुद ही उसकी सुरक्षा करेंगे। इस तरह मैती की शुरुआत हुई।

आन्दोलन की शुरुआत

          इस पर्यावरणीय आन्दोलन की शुरुआत 1994 में चमोली के ग्वालदम राजकीय इण्टर कालेज के जीव विज्ञान प्रवक्ता श्री कल्याण सिंह रावत जी द्वारा की गई। इस आन्दोलन के तहत रावत जी ने सबसे पहले स्कूली बच्चों को प्रेरित किया, फिर धीरे-धीरे समूचे गाँव के लोगों को प्रेरित करने का कार्य किया। रावत जी के अनेक अभिनव प्रयोगों और गरीबों, विकलांगों, महिलाओं और छात्रों के बीच सामाजिक कार्यों के कारण मैती संगठन की पहचान सभी वर्गों के बीच बनाईं। इसके तहत गढ़वाल के किसी गांव में किसी लड़की की शादी होती है, तो विदाई के समय मैती बहनों द्वारा दूल्हा-दुल्हन को गांव के एक निश्चित स्थान पर ले जाकर फलदार पौधा दिया जाता है। वैदिक मंत्रे द्वारा दूल्हा इस पौधो को रोपित करता है तथा दुल्हन इसे पानी से सींचती है, फिर ब्राह्मण द्वारा इस नव दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया जाता है। दूल्हा अपनी इच्छा अनुसार मैती बहनों को पैसे भी देता है। जिसका उपयोग पर्यावरण सुधारक कार्यों में और समाज के निर्धन बच्चों के पठन-पाठन में किया जाता है।

आन्दोलन का परिणाम

          आज मैती एक आन्दोलन के ही रूप में नहीं, अपितु लोगो के लिए एक भावनात्मक लगाव के रूप में समूचे गढ़वाल में प्रसिद्ध है। यही कारण है, की आज जब भी गढ़वाल में कोई शादी का कार्यक्रम होता है, तो शादी के कार्ड में मैती कार्यक्रम का जिक्र भी होता है। मैती बहनों ने पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण के अलावा वन्यजीवों की रक्षा के साथ अंधविश्वास के खिलाफ न सिर्फ चेतना जगाई बल्कि लंबा संघर्ष भी किया। चैरींखाल पौड़ी गढ़वाल में बूंखाल मेले के दौरान पशुवध के खिलाफ संघर्ष किया। संघर्ष का परिणाम यह हुआ है कि जहां हर वर्ष इस मेले में चार सौ भैंसों की बलि दी जाती थी, वहीं उनकी संख्या अब चालीस से भी कम हो गई है। मैती संगठन ने पूरे उत्तराखंड में वन्यप्राणियों के प्रति प्रेम पैदा करने के लिए आठ सौ किलोमीटर की महायात्रा का आयोजन किया और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए लोगों को जागरुक किया।

          अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों में भी अपने जड़े जमा चुका है। जिनमे से कुछ राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है। कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं। वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया। अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं। मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं।

रक्षा सूत्र आन्दोलन

          नवसृजित उत्तराखण्ड राज्य में जलनीति बनाने की जोरदार वकालत रक्षासूत्र आन्दोलन की टीम कर चुकी हैं। इसके लिए लोक जलनीति बनाकर अब तक आई सभी राज्य सरकारों ने इसका स्वागत करके इसके अनुसार जलनीति बनाने का आश्वासन देते रहते हैं। उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद रक्षासूत्र आन्दोलन की टीम ने नए राज्य की रीति-नीति के लिए राज्य व्यवस्था को जनता के सुझााव कई दस्तावेजों के माध्यम से सौंपे हैं।

          चिपको के बाद रक्षासूत्र आन्दोलन पेड़ों की कटान रोकने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जल, जंगल, जमीन की एकीकृत समझ बढ़ाने के प्रति लोगों को जागरूक भी करता आ रहा है, जिसके फलस्वरूप उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान एवं हिमालय नीति के विषय पर लगातार संवाद जारी है।

          पहाड़ी क्षेत्रों में एक ही खेतों में बारह प्रकार की फसल उगाने में जंगलों का अद्भुत योगदान है। एक ही खेल में मंडवा, गहत, उड़द, तिल, भंगजीर, हुँटा, सोयाबीन, ककड़ी, रामदाना, कद्दू के साथ-साथ जंगली सब्जी कंडलिया, ढोलण, लेंगड़ा जैसी अमूल्य फसलों को लोग प्राप्त करते है।

          आज वनों पर व्यापारिक दृष्टि होने से बारहनाजा भी प्रभावित हो गया है। महिलाओं का जीवन संकट में पड़ गया है। बच्चों का स्वस्थ्य बिगड़ गया हैं। घरों में जंगली सब्जियों के अभाव में बाहर से आ रही सब्जियों के साथ तरह-तरह की बीमारियाँ गांव में पहुँच रही हैं। इसके कारण गरीब व्यक्ति की जीविका नष्ट हो गई है। खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।

          अतः हम कह सकते है कि आजादी के बाद का उत्तराखण्ड, 19601970 के दशकों में, प्रभावशील व गतिशील रहे शराबन्दी तथा चिपको व अचिपको आन्दोलन के रूप में नारीवादी आन्दोलन की दूसरी बड़ी लहर को प्रत्यक्ष कर रहा था। ये आन्दोलन स्वातंत्रयोत्तर काल में न केवल महिलाओं की राजनीतिक/ सार्वजनिक सक्रियता व गतिविधियों के अद्भुत उदाहरण के रूप में प्रत्यक्ष होते हैं, बल्कि साथ ही नारीवादी चेतना के ऐसे भिन्न स्वरूप का साक्षात्कार कराते है जो कि उन मुद्दों से अलग है जिनके इर्द-गिर्द अभिजात्य-वर्गीय महिलायें स्वतंत्रतापूर्व काल में संगठित हुई थी। यद्यपि ये आन्दोलन लैगिंक न्याय व लैगिंक समानता के सन्दर्भ में, किसी वृहद सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनकारी आन्दोलन के रूप में परिवर्तित नहीं किये जा सके, तथापि इनके गहरे सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिणाम दृष्टिगत हुए। महिलाओं के अदम्य साहसी, व्यापक व संगठित प्रतिरोध ने विशेषतः सरकार-ठेकेदार-पुलिस के गठजोड़ के रूप में पुरूष वर्चस्व व पूँजी के वर्चस्व तथा पुरूष वर्चस्ववादी दृष्टि को चुनौती देकर, तथा महिलाओं की पारिवारिक व सामाजिक दयनीय स्थिति को सामाजिक चेतना/जागरूकता का अनिवार्य प्रश्न बनाकर, व महिलाओं की स्थिति पर सामाजिक पुर्नविचार को प्रेरित करके पितृसत्तात्मक दबाव के विरोध की भूमिका को तैयार किया। आन्दोलन के दौरान उत्पन्न आत्मविश्वास ने, महिलाओं ने इस विश्वास/आग्रह को भी बढ़ावा दिया कि उन्हें स्वयं ही अनिवार्य रूप से इन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, जिससे कि भारत प्रतिबद्ध है, उन क्षेत्रों/रास्तों को बदलना होगा जहाँ कि उनके साथ भेदभाव किया जाता है ताकि सामाजिक वास्तविकता में परिवर्तन लाया जा सके। इन आन्दोलनों के माध्यम से महिलाओं का संघर्ष उत्तर औपनिवेशिक राज्य की, जिसके कि निर्माण की पृष्ठभूमि में सामाजिक (संरचनात्मक परिवर्तन) की वृहद आशा व उद्देश्य निहित थे, स्त्री प्रश्न पर असफलता व अक्षमता को भी स्पष्ट करता है। वस्तुतः स्वतंत्र भारतीय राज्य महिलाओं की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रति अधिकांशतः असंवेदनशील व अनुच्छिुक ही बना रहा।

          इस प्रकार स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड में महिलाएं राजनीतिक परिवर्तन से लेकर सामाजिक एवं भौगोलिक या प्राकृतिक परिवर्तन में प्रमुख भूमिका निभाई। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विषम परिस्थितियों दुर्गभ रास्तों तथा कठोर भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उत्तराखण्ड के विभिन्न आंचलों में महिला आन्दोलन होते रहे। जहाँ चिपको आन्दोलन में गौरा देवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर पर्यावरण तथा वनों की रक्षा के लिए उत्कृष्ट कार्य किया तो शराब बन्दी आन्दोलन में विभिन्न महिलाओं की सामूहिक भागीदारी ने समाज को नशामुक्त बनाने का कार्य किया वर्तमान में वन एवं नदी को बचाने के लिए किया गया रक्षा सूत्र आन्दोलन इसका ताजा उदाहरण है कि उत्तरांचल की महिलाएं अत्यन्त जागरूक एवं अपने अधिकारों के साथ-साथ समाज एवं पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी सचेत है।

 

 

 

 

                 

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