History Of Chandragupta Maurya In Hindi,  Rise Of Mauryan Empire

 चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास हिंदी में, मौर्य साम्राज्य का उदय

       चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम आते ही हमारे दिमाग में एकदम उस राजा की छवि घूमने लगती है जिसने भारत में एक ऐसा साम्राज्य स्थापित  सम्पूर्ण भारत को अपने छत्र के निचे ले लिया और उस साम्राज्य का नाम था मौर्य साम्राज्य। चन्द्रगुप्त मौर्य इस साम्राज्य का संस्थापक था। मौर्य साम्राज्य का इतिहास या उसकी सत्यता जानने के लिए हमें देशी और विदेशी साहित्य साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है। इसके सह ही पुरातत्व संबंधी साक्ष्यों का भी सहारा लेना पड़ता है 




 

मौर्य वंश का इतिहास जानने के साधन 

 
ब्राह्मण साहित्यिक साक्ष्य-- ब्राह्मण साहित्य के अंतर्गत पुराण, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस नाटक प्रमुख हैं।  कौटिल्य का अर्थशास्त्र इनमें सबसे महत्पूर्ण है  ऐतिहासिक दृष्टि से यह बहुत महत्व रखता है।  अर्थशास्त्र मौर्य वंश के विषय में मत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। 

बौद्ध ग्रन्थ-- बौद्ध ग्रंथों  दीपवंश, महावंश, महावंश टीका, महाबोधिवंश, दिव्यदान, आदि ग्रंथों में मौर्यों के  विषय में उपयोगी जानकारी मिलती है। 

जैन ग्रन्थ-- जैन ग्रंथों में भद्रवाहु का कल्पसूत्र तथा हेमचन्द्र का परिशिष्ट पर्वन का सहारा लेते हैं। 

विदेशियों  विवरण--क्लासिकल ( यूनानी-रोमन ) लेखकों के विवरण से भी बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। हमें इन लेखकों  ग्रंथों से चन्द्रगुप्त मौर्य के  विषय में पता चलता है। यूनानी ग्रंथों में चन्द्रगुप्त मौर्य को 'सेंड्रोकोट्स' तथा 'एण्ड्रोकोट्स' कहा गया है। इन नामों को सबसे पहले विलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त से  सुमेलित  किया। सिकन्दर के लेखक - नियार्कस, आनेसिक्रित्स तथा आरिस्टोबुलस के विवरण चन्द्रगुप्त के विषय में महत्वपूर्ण सूचनाएं देते हैं।  सिकन्दर के बादके लेखकों में मेगस्थनीज का प्रमुख स्थान है जो चन्द्रगुप्त मौर्य दरबार में चार वर्ष रहा। उसकी पुस्तक इंडिका  ही मूल्यवान  है दुर्भाग्यवस  पुस्तक अपने मूल रूप  उपलब्ध  लेकिन स्ट्रैबो, डियोडोरस, प्लिनी, एरियन, प्लूटार्क तथा जस्टिन  लेखों में इंडिका के उद्धरण मिलते हैं। 
 
पुरातत्व सम्बन्धी साक्ष्य-- पुरातात्विक साक्ष्यों में सबसे पहला स्थान अशोक के अभिलेख हैं। अशोक के लगभग 40 अभिलेख भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में प्राप्त हुए हैं। 
    अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त महाक्षत्रप रुद्रदामन के जूनागढ़ ( गिरनार )  मौर्यकाल के विषय में जानकारी मिलती है। 

मौर्य वंश की स्थापना Establishment of Maurya dynasty

      भारत के महानतम सम्राटों में विख्यात चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की।  मौर्य वंश का उदय इतिहास की सबसे रोमांचकारी घटना है। भारत को यूनानी दस्ता से मुक्त करने तथा नंदों के घृणित और अत्याचारी  शासन से भारत की जनता को मुक्ति दिलाने के साथ संपूर्ण भारत को राजनितिक एकता के सूत्र में संगठित  करने का महान कार्य चन्द्रगुप्त मौर्य ने  ही किया। 
 

चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति, क्या चन्द्रगुप्त मौर्य शूद्र थे ? The caste of Chandragupta Maurya, was Chandragupta Maurya Shudra?


   चन्द्रगुप्त मौर्य जाति  विषय में बहुत मतभेद हैं और भारत  अधिकांश इतिहासकारों में मौर्यों को क्षत्रिय सिद्ध करने की होड़ लगी है।  जबकि अधिकांश ग्रंथों में चन्द्रगुप्त को शूद्र अथवा निम्नकुल में जन्मा बताया गया है। तत्कालीन भारतीय समाज में शायद ही जाती  इतना विकराल रूप  जैसा आज देखने को मिलता है। लेकिन भारतीय इतिहासकार यहाँ जातिगत पूर्वाग्रह  ग्रसित नज़र आते हैं। वो वर्तमान ऊंच-नीच की श्रेष्ठता को  चालाकी से अपने लेखों में मनमाने अर्थों में इसका प्रयोग जातिगत श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए करते हैं। आगे हम निम्न ग्रंथों में मौर्यों की जातिगत पहचान की समीक्षा करेंगे। 

   वह ग्रन्थ जो मौर्यों को शूद्र घोषित करते हैं 


पुराण-- ब्राह्मण साहित्य में हम सर्वप्रथम पुराणों उल्लेख कर सकते हैं। विष्णु पुराणमें कहा गया है कि शैशुनागवंशीन शासक महानंदी के पश्चात् शूद्र योनि  शासक पृथ्वी पर शासन करेंगे  ( ततः प्रभृत्ति राजानो भविष्यन्ति शूद्रयोनयः। -- पार्जिटर, डायनेस्टीज ऑफ़ कलिएज, पृष्ठ 25 ) श्रीधर स्वामी जो विष्णुपुराण के एक भाष्यकार के एक भाष्यकार हैं के इस कथन के आधार पर चन्द्रगुप्त को नंदराज की पत्नी 'मुरा'  से पैदा हुआ बताया है। उनके अनुसार मुरा का पुत्र होने के कारण ही वह मौर्य  कहलाये। 

मुद्राराक्षस--विशाखदत्त रचित 'मुद्राराक्षस' नामक नाटक में चद्रगुप्त मौर्य को नंदराज का पुत्र मन गया है। परन्तु इसमें जो वर्णन किया गया है उसके अनुसार चन्द्रगुप्त नंदराज का वैध पुत्र नहीं था।  इस नाटक में नदवंश को चन्द्रगुप्त का 'पितृकुलभूत' अर्थात पितृकुल बनाया गया पद उल्लिखित है।  यदि चन्द्रगुप्त नंदराज का वैध पुत्र होता तो उसके लिए 'पितृकुल' का प्रयोग होता। मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त को 'वृषल' तथा 'कुलहीन'कहा गया है। मौर्यों की शूद्र जाती समर्थक विद्वान इन शब्दों को शूद्र शूद्र जाति के संबंध में ग्रहण किया है। 

मुद्राराक्षस के टीकाकार धुण्ढिराज का मत-- धुण्ढिराज ने एक कहानी के द्वारा चन्द्रगुप्त को शूद्र सिद्ध करने  किया है। इस कहानी के अनुसार सर्वार्थीसिद्धि नामक एक क्षत्रिय राजा की दो पत्नियां थीं- सुनंदा तथा मुरा। सुनंदा एक क्षत्राणी थी  पुत्र हुए जो 'नव नन्द' कहलाये। मुरा शूद्र ( वृषलात्मजा)  थी।उसका एक पुत्र हुस जो मौर्य कहलाया। 
 
 कथासरित्सागर तथा बृहत्कथामंजरी का विवरण-- सोमदेव कृत 'कथासरित्सागर' तथा क्षेमेन्द्र कृत 'बृहत्कथामंजरी' दोनों ही चन्द्रगुप्त की शूद्र उत्पत्ति  बात करते हैं इन दोनों ग्रंथों में में एक विवरण  मिलता है जिसके अनुसार नंदराज की अचानक मृत्यु हो गयी तथा इंद्रदत्त नामक  व्यक्ति तोग के बल पर उसकी आत्मा में प्रवेश कर गया तथा राजा बन बैठा तत्पश्चात वह योगनंद  नाम से जाना जाने लगा। उसने नंदराज की पत्नी से विवाह कर लिया। जिससे उसे हिरण्यगुप्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। किन्तु वास्तविक नन्द राजा ( पूर्वनन्द ) को  पहले से ही एक पुत्र था जिसका नाम चन्द्रगुप्त था। योगनंद अपने तथा अपने पुत्र हिरण्यगुप्त  के मार्ग   में बाधक समझता था। जिसके कारण  वैमनस्य हो गया। वास्तविक नन्द राजा के मंत्री शकटार ने चन्द्रगुप्त का साथ दिया । चाणक्य नामक चतुर ब्राह्मण को अपनी ओर शामिल कर लिया और फिर उसकी सहायता  से शकटार ने  योगनंद तथा हिरण्यगुप्त का वध कर दिया तथा राज्य के असली उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त को  सिंहासन पर  बैठाया। इस प्रकार इन दोनों ग्रंथों में चन्द्रगुप्त को  नंदराज का पुत्र बताकर उसकी शूद्र उत्पत्ति का मत व्यक्त किया गया है।

 उपरोक्त तथ्यों और प्रसंगों को अधिकांश भारतीय इतिहासकार मिथ्या और काल्पनिक बताते हुए निम्नलिखित तर्क देकर मौर्यों की शूद्र उत्पत्ति को ख़ारिज करते हैं ---


1- पुराण चन्द्रगुप्त की जाति के विषय में बिलकुल मौन हैं। वे एक स्वर से नंदों को शूद्र कहते हैं तथा यह बताते हैं कि द्विजर्षभ ( श्रेष्ठ ब्राह्मण ) कौटिल्य सभी नंदों को मारकर चन्द्रगुप्त को सिंहासनासीन करेगा।  बिष्णुपुराण का कथन केवल नंदों के ऊपर ही लागू होता है न की बाद के सभी राजवनाशों पर। 
2- मुद्राराक्षस में वर्णित शब्द 'मुरा' के संबंध में पाणनि के व्याकरण के नियमानुसार मौर्य शब्द की व्युत्पत्ति पुलिंग 'मुर' से होगी। 'मुरा' शब्द से 'मोरय' बनेगा, मौर्य नहीं। 
 
3- वृषल तथा कुलहीन  शब्दों के खंडन- मनुस्मृति तथा महाभारत में 'वृषल' शब्द का प्रयोग धर्मच्युत व्यक्ति के लिए किया गया है।  मनु के अनुसार भगवान धर्म को वृष कहते हैं। जो व्यक्ति धर्म का नाश करता है देवता देवता उसे वृषल  समझते हैं। इसी तरह कुलहीन शब्द के  अर्थ के विषय में कहा गया है की इस शब्द का अर्थ सामान्य परिवार  जन्मा हो सकता है। अतः यही कहा जा सकता है कि वह एक सामान्य कुल  उत्पन्न हुआ था। 
     अतः चन्द्रगुप्त को शूद्र मानने के विभिन्न तर्कों को ख़ारिज कर  गया।  अब प्रश्न यह उठता है की यदि वह शूद्र नहीं था तो क्षत्रिय के समंध में क्या तर्क दिया जाये।  आगे देखते हैं बौद्ध, जैन, तथा विदेशी साक्ष्य काया कहते हैं। 

    बौद्ध साहित्य के साक्ष्य--  बौद्ध ग्रंथों में चन्द्रगुप्त मौर्य को क्षत्रिय बताया गया। है मोरिय कपिलवस्तु के शाक्यों की ही एक शाखा से संबंधित बताये  हैं। कौशल नरेश विडूडभ के अत्याचारों से बचने के लिए कपिलवास्तु के कुछ लोग हिमालय के एक सुरक्षित क्षेत्र में  गए। यहाँ मोर बहुत ज्यादा थे इसलिए  ये लोग मोरिय  कहे जाने लगे। 
     एक और कथा के अनुसार जिस  पर ये लोग बसे वहां उन्होने मयूर की गर्दन के आकार की ईंटों से अपने घर बनाये।  अतः इस नगर के निवासी मोरिय कहलाये।
 महाबोधिवंश में चन्द्रगुप्त को राजकुल से सम्ब्नधित बताता है। मगर  अगर सत्य है  चाणक्य ने उसे 1000 कार्षापण देकर क्यों ख़रीदा ऐसा केवल एक  व्यक्यि ही  कर सकता है कि अपनी संतान  दे जैसा आज भी देखने मिल जाता है। 
'महापरिनिब्बानसूत' में मौर्यों को पिप्पलिवन का  तथा क्षत्रिय वंश में उत्पन्न बताया गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के बाद मोरियों ने कुशीनारा के मल्लों के पास उनके अवशेषों का अंश प्राप्त करने के  राजदूत भेजकर अपने क्षत्रिय होने के अआधार पर ही दावा  था। 
 
जैन साहित्य संबंधी मत - जैन साहित्य में हेमचन्द्र कृत 'परिशिष्टपर्वन'  महत्वपुर्ण है।  इस ग्रन्थ में चन्द्रगुप्त मौर्य को 'मयूर पोषकों के ग्राम के मुखिया ( मयूर पोषक ग्रामे ) मुखिया की पुत्री का पुत्र कहा गया है।

    इस प्रकार जैन एवं  ग्रन्थ मौर्यों की शूद्र उत्पत्ति के संकेत नहीं देते वे उन्हें क्षत्रिय बताते हैं। 
           
* मयूर मौर्यों का वंशीय चिन्ह था। 
* सर्वप्रथम 'ग्रूनवेडेल' ( Grunwedel ) ने यह बताया कि मयूर मौर्यों का वंशीय चिन्ह है। 
विदेशी लेखकों के साक्ष्य-  सिकंदर के बाद  लेखकों ने चंद्रगुप्त के  संबंध में काफी विवरण  दिए हैं।  
* यूनानी लेखक  चन्द्रगुप्त को 'एण्ड्रोकोट्स' तथा 'सेंड्रोकोट्स'  कहते हैं।

* प्लूटार्क ने  है कि भारत पर जब सिकंदर  आक्रमण किया तब चंद्रगुप्त मौर्य की उससे मुलाकात हुई थी। 
* जस्टिन ने भी चन्द्रगुप्त ( सैंड्रोकोट्स ) और सिंकंदर की मुलाकात का विवरण दिया है। 
 
वर्ण निर्धारण- मौर्यों के वर्ण या जाति निर्धारण का विषय बहुत विवादित है अतः उनकी जाति या वर्ण के बजाय उनकी उपलब्धियों पर गौर करना चाहिए शूद्र  या क्षत्रिय सिद्ध करना ऐतिहासिक दृस्टि से इतिहासकार अपने पूर्वाग्रह के कारण शूद्र या क्षत्रिय की परिकल्पना करने लगता है।  अतः हम उनकी जाति के बजाय उनकी उपलब्धियों की चर्चा करेंगे। 

 चन्द्रगुप्त मौर्य का बचपन Childhood of Chandragupta Maurya


     चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक जीवन के विषय में ठोस ऐतिहासिक सामग्री का अभाव है । इसलिए चन्द्रगुप्त मौर्य के बचपन को जानने के लिए हमें बौद्ध ग्रंथों का सहारा लेना पड़ता है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार  चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता का नाम 'सवार्थसिद्धि' 'मौर्य' था और  माता का नाम 'मुरा' था। चन्द्रगुप्त का  पिता मोरिय नगर का प्रमुख था। जब चन्द्रगुप्त अपनी माता  गर्भ में था तभी उसके पिता की मृत्यु हो गयी। चन्द्रगुप्त की माता पाटलिपुत्र आ गयी जहां चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ। चन्द्रगुप्त का पालन-पोषण एक गोपालक के संरक्षण में हुआ। 
    

 चन्द्रगुप्त की चाणक्य से मुलाकात 

       
   चन्द्रगुप्त बचपन से ही प्रतिभावान था इसलिए अपने सहपाठियों में वह बहुत प्रमुख था। वह बालकों के बीच खेल-खेल में राजा बनकर न्याय करता था। एक दिन चन्द्रगुप्त  साथियों के साथ 'राजकीलम' नामक खेल रहा था तभी उधर से चाणक्य गुजर रहे थे , चाणक्य  बालक चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को पहचान लिया।  चाणक्य ने गोपालक को 1000 कार्षापण देकर चन्द्रगुप्त को खरीद लिया और उसे अपने साथ तक्षशिला ले गया। 
    तक्षशिला उस समय विद्या  प्रमुख केंद्र था। चाणक्य तक्षशिला का  आचार्य था उसने चन्द्रगुप्त को सभी विद्याओं में निपुण बनाया।  जस्टिन के अनुसार तक्षशिला पर सिकंदर के आक्रमण के समय चंद्रगुप्त की स्पष्टवादिता से खिन्न होकर सिंकंदर ने उसे जान से मारने का आदेश दिया लेकिन वह बच निकला। 
 

 चन्द्रगुप्त की  उपलब्धियां 

      
चन्द्रगुप्त के सामने दो प्रारंभिक लक्ष्य थे--
प्रथम- यूनानियों से देश को मुक्त करना और 
द्वितीय-- नंदों के घृणित शासन से जनता को मुक्ति दिलाना। 

    चन्द्रगुप्त ने अपनी बुद्धिमता से एक विशाल सेना का गठन किया। इस सेना में उसने निम्न वर्गों से सैनिक भर्ती किये-
      1- चोर अथवा प्रतिरोधक 
      2- म्लेच्छ ,
      3- चोर गण ,
      4- आटविक ,
      5- शस्त्रोपजीवी श्रेणी। 
* जस्टिन ने चन्द्रगुप्त की सेना को डाकुओं गिरोह कहा है ( Aband of robbers )
      323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के पश्चात पश्चिमी भारत के यूनानी अधिकार वाले क्षेत्रों  विद्रोह हो गया और अनेक यूनानी क्षत्रपों को मौत के घाट उतर दिया गया।  चन्द्रगुप्त के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा अनुकूल हो गयी। 
    इतिहासकार  जस्टिन ने इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया है --"सिकंदर की मृत्यु के भारत  ने अपनी गर्दन से दस्ता का जुआ उतर फेंका तथा यूनानी गवर्नरों की हत्या कर दी। इस स्वतंत्रता का जन्मदाता सैंड्रोकोट्स ( चंदगुप्त ) था।" 
*सिकन्दर के अंतिम यूनानी सेनानायक ( यूडेमस ) 317 ईसा पूर्व में  हराकर चन्द्रगुप्त ने भारत के पश्चिमी हिस्से पर अधिकार कर लिया।अब चन्द्रगुप्त मौर्य सिंध तथा पंजाब का एकक्षत्र शासक बन गया। 
      

नन्द साम्राज्य का उन्मूलन 

 
     यूनानियों से देश को मुक्त कराकर  चन्द्रगुप्त मौर्य के सामने एक ही लक्ष्य था नंदों के घृणित शासन का अंत करना। चन्द्रगुप्त मौर्य ने शुरुआती असफलता के बाद अंततः नन्द शासक धनानंद को हराकर मगध के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। 'मिलिंदपन्हों' में नन्द-मौर्य संघर्ष का बहुत रक्तरंजित विवरण मिलता है।

     

  सेल्यूकस से युद्ध 

 
   सिकंदर की मृत्यु के  पूर्वी क्षेत्रों का उत्तराधिकारी सेल्यूकस हुआ। यूनानी क्षत्रपों की हत्या और क्षेत्र पर पुनः  अधिकार में लेने के लिए सेल्यूकस 305 ईसा पूर्व में  सेना लेकर भारत पर आक्रमण के लिए आ पहुंचा।
स्ट्रेबो के अनुसार उस समय भारतीय सिन्धु नदी के समीपवर्ती भाग  थे।  यह भाग पहले पारसीकों  के अधीन था। सिंकंदर ने इस क्षेत्र को जीतकर यूनानी साम्राज्य का  लिया मगर सेल्यूकस ने इस क्षेत्र को वैवाहिक  संबंधों द्वारा सैंड्रोकोट्स ( चंद्रगुप्त ) को।   प्रसंग  से यही पता चलता है कि सेल्यूकस चन्द्रगुप्त से पराजित हुआ। दोनों के बीच संधि हुयी जिसमें सेल्यूकस  बेटी हेलना  विवाह चन्द्रगुप्त  कर दिया।  चद्रगुप्त ने उपहार में 500 हाथी सेल्यूकस को दिए। 
*सेल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक अपना राजदूत मौर्य दरबार में भेजा जो यहाँ चार वर्ष रहा और इंडिका नामक पुस्तक लिखी। 
     इसके पश्चात चन्द्रगुप्त के साम्राज्य की सीमाएं पारसिक ( ईरान ), और अफगानिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। 

पश्चिमी भारत की विजय

   150 ईसा पूर्व के शक महाक्षत्रप रुद्रदामन के गिरनार  अभिलेख से से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्चिमी भारत में सुराष्ट्र तक का प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण  में ले लिया।
*  चन्द्रगुप्त मौर्य ने पुष्यगुप्त वैश्य को सुराष्ट्र का राजयपाल ( राष्ट्रीय ) नियुक्त किया, जिसने वहां सुदर्शन नामक झील  निर्माण कराया। 

चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा  दक्षिण की  विजय 

    चंद्रगुप्त मौर्य की दक्षिण विजय का विवरण हमें अशोक के अभिलेखों, जैन एवं तमिल स्रोतों से मिलती है। दक्षिण भारत के कई स्थानों से अशोक के अभिलेख मिले हैं---
सिद्धपुर,
ब्रह्मगिरि,
जटिंगरामेश्वर पहाड़ी (कर्नाटक राज्य के चित्तलदुर्ग जिले में स्थित)
गोविमठ,
पालक्कि गुण्द्रु,
मास्की तथा गूटी ( आन्ध्र प्रदेश के करनूल जिले में स्थित ),
   अशोक के अभिलेखों में चोल, पाण्ड्य, सत्तियपुत्र तथा केरलपुत्र जातियों का उल्लेख प्राप्त होता है।
    अशोक के तेरहवें शिलालेख से हमें ज्ञात होता है कि उसने कलिंग ( वर्तमान उड़िसा ) को विजित किया। हमें भलीभांति याद है कि कलिगं युद्ध के बाद युद्ध नीति का त्याग कर दिया था। स्पष्ट है कि दक्षिण के उपरोक्त राज्यों को चन्द्रगुप्त मौर्य अथवा बिदुसार ने ही विजित किया होगा। यहाँ स्मरण हो कि बिदुसार एक योद्धा के रूप में नहीं जाना जाता। अतः दक्षिणी राज्यों को चन्द्रगुप्त मौर्य ने ही जीता ।

   चन्द्रगुप्त दक्षिण विजय की पुष्टि जैन परम्परा की उस बात से भी सिद्ध होती है जिसमें कहा गया है कि  "चन्द्रगुप्त अपनी वृद्धावस्था  अवस्था में जैन मुनि भद्रवाहु का शिष्य बन गया और जैन धर्म स्वीकार कर लिया। इसके बाद दोनों 'श्रवणवेलगोला' (कर्नाटक राज्य) नामक स्थान पर चले गये । यहीं चन्द्रगिरि नामक पहाड़ी पर चन्द्रगुप्त ने तपस्या की। अतः यह स्थान उसके राज्य का एक भाग होगा। 

   

    चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य विस्तार 


    चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य सम्पूर्ण भारत में विस्तृत था। इस सम्बन्ध में प्लूटार्क ने लिखा है कि "उसने ( सेंड्रोकोट्स ) छः लाख की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद डाला और उस  अपना अधिकार  लिया।" चन्द्रगुप्त का विशाल साम्राज्य की सीमाएं पश्चिम में ईरान की सिमा से लगी थी।  इसी प्रकार वर्तमान कर्नाटक तक फैली थी। पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सुराष्ट्र तथा सोपारा तक का सम्पूर्ण प्रदेश उसके राज्य का भाग था। 
  इतिहासकार स्मिथ अनुसार हिन्दुकुश पर्वत भारत की वैज्ञानिक सीमा थी।  यूनानी लेखक इसे पैरोपेनिसस अथवा 'इंडियन काकेशस' कहते थे। चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को हराकर भारत की उस वैज्ञानिक सीमा अधिकार कर लिया था। 

मौर्य साम्राज्य  राजधानी 


   चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र  की बहुत प्रशंसा की है। वह लिखता है कि गंगा तथा सोन नदियों के संगम पर स्थित यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा नगर था। यह 80 स्टेडिया ( 16 किलोमीटर ) लंबा तथा 15 स्टेडिया ( तीन किलोमीटर ) चौड़ा था। इसके चरों ओर 185 मीटर चौड़ी तथा 30 हाथ गहरी खाई थी।  नगर चारो ओर से ऊँची दिवार से घिरा था।, जिसमे 64 द्वार ( तोरण ) तथा 570 बुर्ज थे। नगर का प्रबंध एक नगर समिति द्वारा संचालित किया जाता था (यह बिलकुल आजके नगर निगम जैसी व्यवस्था थी)। इस समिति में पांच-पांच सदस्यों वाली छ: समितियां काम करती थीं।  नगर के मध्य  चन्द्रगुप्त मौर्य  राजप्रासाद स्थित था। मेगेस्थनीज के अनुसार यह विशाल और सुन्दर भवन सुसा और एकबतना के राजमहलों से कहीं ज्यादा खूबसूरत था। 

   चन्द्रगुप्त की मृत्यु किस प्रकार हुई 

   चन्द्रगुप्त की मृत्यु  सम्बन्ध में हमें जैन साहित्य का सहारा  पड़ता है जिसमें  मृत्यु के विषय में विवरण प्राप्त  होता है। 
      जैन परम्पराओं  अनुसार अपने जीवन अंतिम दिनों में चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म की दीक्षा ली। और वह जैन मुनि भद्रवाहु का शिष्य हो गया। उसके शासन काल के अंत में मगध में बारह वर्ष  भीषण अकाल पड़ा। चन्द्रगुप्त अथक प्रयत्न के बाद भी स्थिति को संभाल नहीं सका तो अपने पुत्र ( बिन्दुसार ) के पक्ष में सिंहासन त्याग कर जैन मुनि भद्रवाहु के साथ श्रवणवेलगोला ( मैसूर ) में तपस्या करने चले गए।  वहीँ पर 298 ईसा पूर्व  लगभग जैन विधि से ( सल्लेखना ) अपने प्राण त्याग दिए। 
 

चन्द्रगुप्त का शासन काल 


   चंद्रगुप्त मौर्य का शासनकाल 322-298 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है। 
 

चन्द्रगुप्त मौर्य की पत्नियां 

     
       जैन ग्रन्थ परिशिष्टपर्वन ( हेमचन्द्र कृत ) से हमें उसकी एक पत्नी दुर्धरा के विषय में जानकारी मिलती है।  इस ग्रन्थ में उसेमहापद्मनंद की पुत्री बताया  हैं। इसके अतिरिक्त उनकी दूसरी पत्नी यूनान की राजकुमारी ( सेल्यूकस की पुत्री ) कार्नेलिया हेलेना या हेलन तथा तीसरी पत्नी  नाम चन्द्रनन्दिनी था। इस प्रकार चन्द्रगुप्त की तीन पत्नियां थीं। 
 

चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र कौन था ?

 
बिन्दुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी और पुत्र था। 
 

चन्द्रगुप्त मौर्य से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य 

 
       
      

                चन्द्रगुप्त मौर्य 

 

 

 जन्म 

 340 ईसा  पूर्व ( पाटलिपुत्र )

पिता का     नाम 

 सर्वार्थसिद्धि मौर्या 

माता का  नाम 

 मुरा मौर्या 

 पत्नियां 

 दुर्धरा, कार्नेलिया हेलेनाऔर चंद्र नंदिनी 

 पुत्र 

 बिन्दुसार 

 पौत्र 

 अशोक , सुसीम 

 धर्म 

 जैन धर्म 

 राजधानी 

 पाटलिपुत्र 

 प्रधानमंत्री 

 चाणक्य 

 सेल्यूकस से युद्ध 

 305 ईसा पूर्व 

 मृत्यु 

 

 298 ईसा पूर्व श्रवणवेलगोला ( मैसूर कर्नाटक )

 

निष्कर्ष 
        इस प्रकार चन्द्रगुप्त भारत का प्रथम महान ऐतिहासिक सम्राट था जिसके नेतृत्व में चक्रवती सम्राट की परिकल्पना को मूर्त रूप प्राप्त हुआ। यदि यूनानी स्रोतों पर विश्वास किया जाये तो कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त की महान सफलता अधिकांशतः उसकी वीरता, अदम्य साहस, उत्साह एवं साहस का प्रतिफल थी। चन्द्रगुप्त एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भारत का चक्रवती सम्राट बना।उसने यूनानियों से देश को आज़ाद कराया और नंदों के घृणित शासन से भारत की जनता को मुक्ति दिलाई। इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य एक लोकोपकारी और उत्तम शासन व्यवस्था का निर्माता था। 

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