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Fundamental Rights In Hindi



Fundamental Rights In Hind


 FUNDAMENTAL RIGHTS? 


fundamental rights

      भारत जैसे विशाल एवं विविधतापूर्ण देश में जहाँ सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक रूप से नागरिकों में पर्याप्त विभेद हैं, उस देश में मूल अधिकारों का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। भारत में नागरिक अधिकारों का प्रारम्भ ब्रिटिशकालीन भारत में ही प्रारम्भ हुआ। भारत की आज़ादी के बाद भारत के संविधान में नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए मूल अधिकारों की व्यवस्था की गयी। मूल अधिकार वह अधिकार होते हैं जो संविधान अपने नागरिकों को प्रदान करता है, उन्हें प्रायः प्राकृतिक अधिकार अथवा मूल अधिकार की संज्ञा दी जाती है। मूल अधिकारों का उद्देश्य सरकार अथवा राज्यों को मनमानी करने से रोकना है और नागरिकों को सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान करना है। ये अधिकार न्यायलय द्वारा बाध्य किये जा सकते हैं और कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा करने के लिए जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय उन सभी कानूनों को जो इन अधिकारों का उल्लंघन करते हैं अथवा अपमानित करते हैं उन्हें अवैध घोषित कर सकता है। परन्तु मूल अधिकार पूर्णतया असीमित (Absolute) नहीं हैं। सरकार आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सीमित कर सकती है। संविधान के 42वें संसोधन विधेयक ने संसद द्वारा इन मूल  को सीमित करने का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।

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    भारत के संबिधान में मूल अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान (1789 ) से लिए गए हैं,परन्तु भारत के संविधान में इनकी विस्तृत व्याख्या की गयी है।

 संविधान के भाग-3 में मूल अधिकारों का विस्तृत वर्णन किया गया है तथा अनुच्छेद 12-35 तक भारत के संविधान में मूल अधिकार वर्णित हैं 

  भारत का मूल संविधान कुल 7 मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों को प्रदान करता था, परन्तु 44वें संसोधन अधिनियम 1978 द्वारा संपत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर दिया। संपत्ति का मूल अधिकार अनुच्छेद 19(1) (च) तथा अनुच्छेद-31 में वर्णित था। अब संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300 'क' के तहत एक कानूनी अधिकार है।  अतः वर्तमान में भारतीय नागरयकों को 6 मूल अधिकार प्राप्त हैं---

 

1- समानता का अधिकार                            (अनुच्छेद 14-18)

2- स्वतंत्रता का अधिकार                           (अनुच्छेद  19-22)

3- शोषण के विरुद्ध अधिकार               (अनुच्छेद  23-24)

4- धार्मिक सवतंत्रता का अधिकार              (अनुच्छेद  25-28)

5- संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद  29-30)

6- संवैधानिक उपचारों का अधिकार      (अनुच्छेद    32)

 



                1- समानता का अधिकार 

     संविधान का भाग-3 अनुच्छेद (14-18) समता का अधिकार प्रदान करता है अनुच्छेद 14  समता के मूल अधिकार का मूल सिद्धांत प्रतिपादित करता है तथा अनुच्छेद 15-18 समता के सिद्धांत के मूल अधिकार के मूल सिद्धांत के विशिष्ट उदाहरण हैं 

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विधि के समक्ष समता (Equality before Law )

  अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य किसी व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
   अनुच्छेद 14 में 'व्यक्ति' शब्द का प्रयोग किया गया है अतः अनुच्छेद 14 नागरिकों अनागरिकों एवं विधिक व्यक्तियों यथा-- कंपनी, निगम, व्यक्ति, समूह आदि सभी पर लागू होता है।
   विधि के समक्ष समता की अवधारणा ब्रिटेन के संविधान से ली गई है। यह ब्रिटिश विधि शास्त्री प्रो. डायसी के 'विधि के शासन' (Rule of law) के समरूप है।

अनुच्छेद 15 (1) केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर नाiगरिकों के मध्य भेद करने से राज्य को रोकता है।

अनुच्छेद 15 (2) के अनुसार कोई भी नागरिक केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी आधार पर निम्नलिखित में प्रवेश या उसका उपयोग करने के लिए किसी शर्त या प्रतिबंध के अधीन नहीं होगा जैसे--
     (¡) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालय, होटलों, सार्वजनिक मनोरंजन के स्थलों, तथा
   (¡¡) राज्य निधि से पोषित या सार्वजनिक उपयोग हेतु समर्पित-- कुओं, तालाबों, स्नानाघाट, सड़क या सार्वजनिक समागम के स्थलों आदि।

    अनुच्छेद 15 (3), (4)तथा (5) अनुच्छेद 15 (1) तथा (2) के सामान्य नियम का अपवाद हैं ये राज्य को संरक्षणात्मक भेदभाव की अनुमति देते हैं।
   
    अनुच्छेद 15 (3) राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति प्रदान करता है। इस शक्ति के प्रयोग में राज्य द्वारा कई कदम उठाए गए हैं जैसे बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबंध, उनके विकास के लिए संस्थाओं की स्थापना, महिला कल्याण के लिए विशेष कार्यक्रम, महिला आयोग की स्थापना आदि।
    
       डी. पॉलराज बनाम भारत संघ के नवीनतम् वाद में अनुच्छेद 15 (3) के आधार पर 'महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम-2005, को संबैधानिक घोषित किया गया है।

  अनुच्छेद 15 (4) को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम-1951 द्वारा संविधान में अंत: स्थापित किया गया है। यह संशोधन मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दोरइराजन के मामले में न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया गया था। इसके द्वारा राज्य को निम्न के संबंध में विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है--
   1- सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के लिए,
   2- अनुसूचित जाति के लिए तथा
   3- अनुसूचित जनजाति के लिए।

    विदित है कि शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 15 (4) के तहत ही किया गया है।

  अनुच्छेद 15 (5), 93 संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा जोड़ा गया है। इसके द्वारा प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के समय में राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के संबंध में विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है। किंतु अनुच्छेद 30  (1)  में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान इस प्रावधान के दायरे में नहीं आएंगे।
     पी. ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 7 सदस्य पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि राज्य अपनी आरक्षण नीति अल्पसंख्यक संस्थानों तथा निजी शैक्षणिक संस्थानों में लागू नहीं कर सकता है।
      अतः 93वें संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा उक्त निर्णय के प्रभाव को समाप्त करते हुए अनुच्छेद 15  (5)  के माध्यम से निजी शिक्षण संस्थाओं में छात्रों के प्रवेश के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
      अशोक ठाकुर बनाम भारत संघ के मामले में पांच सदस्य संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से केंद्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम-2005 तथा 93वें संविधान संशोधन अधिनियम को संवैधानिक घोषित किया है।


अवसर की समानता (Equality of Opportunity)

 
    अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता की प्रत्याभूति प्रदान करता है। अनुच्छेद 16  (1)   तथा  (2) में अवसर की समानता के सामान्य सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद-16, (3), (4) तथा (5) उसके अपवाद हैं। अनुच्छेद-16 (1) तथा (2) के अनुसार--
▪️राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन अथवा नियुक्ति के सम्बन्ध में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगे [अनुच्छेद-16 (1)]
▪️इस विषय में केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, उद्दभव एवं निवास के आधार पर नागरिकों के मध्य कोई भेद-भाव नहीं किया जायेगा। [ अनुच्छेद 16 (2)]   अनुच्छेद 16 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार सिर्फ नागरिकों के लिए हैं। अवसर की समानता का अर्थ अहर्ताओं और मापदंडों से मुक्ति (समाप्ति) नहीं है।

अनुच्छेद 16 (1) केवल प्रारंभिक नियुक्ति के मामले में ही नहीं बल्कि पदोन्नति, पदच्युति, वेतन, अवकाश, ग्रेच्युटी, पेंशन आदि में भी लागू होता है। अनुच्छेद 16 अनुच्छेद 15 से व्यापक है क्योंकि यह दो अन्य आधारों उद्भव एवं निवास के आधार पर भी विवेद का निषेध करता है।

अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability)

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         अनुच्छेद 17 , समता के अधिकार का एक विशिष्ट उदाहरण है। इसके द्वारा आचरण तथा व्यवहार में समानता का प्रावधान किया गया है। यह संविधान में सामाजिक समानता को अन्तर्विष्ट करता है। इसके द्वारा अस्पृश्यता को पूर्णता समाप्त करते हुए उसका किसी भी रूप में किया जाने वाला आचरण निषिद्ध किया गया है, तथा उससे उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। अनुच्छेद 35 संसद को अस्पृश्यता के संबंध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है। संसद द्वारा इस शक्ति के प्रयोग में 'अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955' पारित कर अस्पृश्यता के अपराध के लिए दंड का प्रावधान किया गया है। 1976 ईस्वी में इसमें संशोधन कर इसका नाम-- सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया, जो इसी रूप में प्रवृत्त है। ज्ञात हो कि अनुच्छेद-17 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं वरन प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध हैं।


उपाधियों का अंत (Abolition of Titels)


     अनुच्छेद 18 द्वारा राज्य को उपाधियां प्रदान करने तथा नागरिकों और अनागरिकों को उपाधियाँ ग्रहण करने से प्रतिषिद्ध किया गया है। अनुच्छेद 18 (1) के अनुसार राज्य सेना (मिलिट्री) तथा विद्या (एकेडमिक) संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। खण्ड-2 के अनुसार-कोई भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि ग्रहण नहीं करेगा। खंड  (3) ऐसे विदेशी व्यक्ति जो भारत में कोई लाभ या विश्वास का पद धारण करता है के बारे में है। ऐसा व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि 'राष्ट्रपति' की सहमति से ही ग्रहण करेगा अन्यथा नहीं।

     अनुच्छेद 18 (4)  किसी विदेशी राज्य से मिलने वाले किसी भेंट (Present) उपलब्धि (emolument) या पद (office) के बारे में है। इसके अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति जो भारत में किसी लाभ या विश्वास के पद पर है किसी विदेशी राज्य से कोई भेंट, उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की अनुमति के बिना ग्रहण नहीं करेगा। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 18 सिर्फ निषेधात्मक आदेशात्मक है, आदेशात्मक नहीं। अतः इसका उल्लंघन दंडनीय नहीं है, यदपि संसद दंड का प्रावधान कर सकती है।


2-स्वतंत्रता का अधिकार (Right To Freedom) अनुच्छेद 19-22

 

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संविधान का भाग-3 अनुच्छेद 19-22 स्वतंत्रता के अधिकार के बारे में हैं।

अनुच्छेद -19 कुल 6 मूलभूत स्वतंत्रताओं को प्रत्याभूत करता है।
अनुच्छेद- 20 अपराधों के लिए 200 सिंधी के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है।
अनुच्छेद- 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को संरक्षित किया गया है।
अनुच्छेद -21 के को 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अंतः स्थापित कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया गया है।
अनुच्छेद -22 में कुछ दशा में गिरफ्तारी और विरोध से संरक्षण प्रदान किया गया है उपर्युक्त स्वतंत्रता एं मूल अधिकारों की आधार स्तंभ है इनमें अनुच्छेद 19 1 द्वारा प्रदत्त 6 मूलभूत स्वतंत्रता ओं का स्थान सर्व प्रमुख है।

1- बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता- अनुच्छेद 19 (1)  (क) भारत के सभी नागरिकों को बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है अपने विचारों एवं दृष्टिकोण को व्यक्त करने का अधिकार।
अनुच्छेद 19 (1) (क) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधीन मूल अधिकार माना गया है जैसे--
    (¡) प्रेस की स्वतंत्रता (साकल पेपर लिमिटेड बनाम भारत संघ-1962)


   (¡¡) राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार (भारत संघ बनाम नवीन जिंदल-2004)
   (¡¡¡) वाणिज्यिक भाषण (विज्ञापन) की स्वतंत्रता 

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   (iv) जानने का अधिकार 

   (v) मतदाता को सूचना का अधिकार 

   (vi) चुप रहने का अधिकार (राष्ट्रगान का मामला) (इमैनुअल बनाम केरल राज्य 1986)

  (vii) सूचनाओं तथा समाचारों को (साक्षात्कार आदि से) जानने का अधिकार (प्रेस की स्वतंत्रता में आती है। ) (प्रभुदत्त बनाम भारत संघ 1982)

  (viii) विदेश जाने का अधिकार (मेनका गाँधी बनाम भारत संघ 1978)

 (ix) इलक्ट्रोनिक मीडिया (टेलीविज़न, रेडियो आदि) द्वारा किसी घटना का आँखों हाल प्रसारित करने का अधिकार। 

 (x) प्रदर्शन या धरना (Demonstration or picketing) किन्तु यह अहिंसक और भड़काऊ नहीं हो। 

 (xi) पूर्व अवरोध (pre censorship)

 (xii) हड़ताल एवं बंद का अधिकार 19 (1) (क) के अंतर्गत कोई मूल अधिकार नहीं है। अतः बंद का आह्वान एवं आयोजन असंवैधानिक है। 

अनुच्छेद 19 (1) (क), अनुच्छेद 19 (2) के साथ पठनीय है। अनुच्छेद 19 (2) में उन आधारों का उल्लेख किया गया है, जिन पर राज्य वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकती है। ये आधार इस प्रकार हैं ---

  1. राज्य की प्रभुसत्ता एवं अखंडता 
  2. राज्य की सुरक्षा 
  3. विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध 
  4. लोक व्यवस्था 
  5. शिष्टाचार एवं सरदार के हित में 
  6. न्यायालय का अवमान 
  7. मानहानि तथा 
  8. अपराध उद्दीपन के सम्बन्ध में 

 उपर्युक्त आधार निःशेषकारी हैं। अतः राज्य केवल उन्हींआधारों पर निर्बंधन लगा सकता है किसी अन्य आधार पर नहीं। 


1- सभा एवं सम्मलेन की स्वतंत्रता ( Freedom of Meeting and Assembly)

अनुच्छेद 19 (1) (ख) भारत के सभी नागरिकों को यह स्वतंत्रता प्रदान करता है कि वह अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए शांतिपूर्ण तथा अहिंसक सम्मलेन कर सकते हैं। 

2-संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता (Freedom to Association or Unions)

अनुच्छेद 19 (1) (ग) द्वारा नागरिकों को संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। 

3- घूमने की स्वतंत्रता (Freedom of Move)

   अनुच्छेद 19 (1) (घ) समस्त भारतीय नागरिकों को भारत में अबाध संचरण (घूमने) की स्वतंत्रता प्रदान करता है। 

4- निवास की स्वतंत्रता (Freedom to Reside)

अनुच्छेद 19 (1) (ङ) द्वारा नागरिकों को भारतीय राज्य क्षेत्र में कहीं भी निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता प्रदान किया गया। 

5-उपजीविका आदि की स्वतंत्रता 

अनुच्छेद 19 (1) (छ) द्वारा भारत के सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापर, अथवा कारोबार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। 

6-दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण (Protection in Respect Conviction)

अनुच्छेद - 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान करता है। 

अनुच्छेद 20 (1) यह उपबंधित करता है कि-किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए तब तक दोषसिद्ध नहीं किया जायेगा जब तक कि उसने कोई ऐसा कार्य नहीं किया है जो उस कार्य को करते समय लागू किसी विधि के अधीन अपराध है। 

अनुच्छेद 20 (2) इसके अंतर्गत दोहरे दंड से संरक्षण प्रदान किया गया है। इसके अनुसार किसी वयक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा। 

अनुच्छेद 20 (3) आत्म अभिशंसन के सिद्धांत से सम्बंधित है। जिसके अनुसार किसी अपराध के अभियुक्त (accused) वयक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य (witness) देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। 

7- प्राण और दैहिक स्वतंत्रता (Protection of Life and Personal Liberty)

अनुच्छेद 21 द्वारा प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया गया है। अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' के अनुसार ही वंचित किया जायेगा, अन्यथा नहीं। अनुच्छेद -21 विधायिका तथा कार्यपालिका दोनों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है तथा इसका संरक्षण नागरिकों व विदेशी सभी व्यक्तियों को प्राप्त है। 

8-शिक्षा का अधिकार (Right to Education) अनुच्छेद 21-क

86वे संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अनुच्छेद 21-क के अंतर्गत शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान कर दिया। इसके अनुसार 6-14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध करेगा। इस अधिकार को 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी (लागू ) किया। 

10-गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण (Protection against arest and detention)

अनुच्छेद-22, गिरफ्तार किये गए व्यक्तियों के अधिकार और स्वतंत्रता से सम्बंधित है। 


3- शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation) अनुच्छेद-23-24 

अनुच्छेद-23-24  के अंतर्गत शोषण के विरुद्ध मूल अधिकार प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 23 मानव  दुर्व्यापार, बलात्श्रम आदि का प्रतिषेध करता है तथा अनुच्छेद 24 के अंतर्गत कारखानों आदि में बालकों के नियोजन पर रोक लगाया गया।

मानव दुर्व्यापार के अंतर्गत निम्न शब्द शामिल किए गए हैं--

(¡) दास प्रथा 

(¡¡) बेगार अथवा बलात् श्रम 

(¡¡) मनुष्यों का वस्तुओं की भांति क्रय-विक्रय

(iv) स्त्रियों एवं बच्चों का अनैतिक व्यापार

(v) बंधुआ मजदूरी आदि।

अनुच्छेद 24  14 वर्ष से कम आयु के बालकों के बारे में है। इसके अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों, खानों अथवा अन्य किसी जोखिम पूर्ण कार्य में लगाना निषेध किया गया है।

 

 4-धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार(Right to Freedom of Religion) अनुच्छेद-25 -28 

अनुच्छेद अनुच्छेद 25 से 28 सभी व्यक्तियों के लिए, चाहे वे  विदेशी हों या भारतीय धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान करता है। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा उद्देशिका में पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़कर इस बात को और स्पष्ट कर दिया गया है। पंथ निरपेक्षता से अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थता और निष्पक्षता का व्यवहार करेगा। ध्यातव्य है कि पंथनिरपेक्षता पर आधारित प्रथम प्रजातंत्र की स्थापना संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी। संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता  शब्द का प्रयोग अत्यंत व्यापक अर्थों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की संतुष्टि को ध्यान में रखकर किया गया है। 

अनुच्छेद 25 व्यक्ति के अंत:करण और धार्मिक क्रिया-कलाप की स्वतंत्रता प्रदान करता है 

अनुच्छेद 26 के द्वारा धार्मिक कार्यों की स्वतंत्रता प्रदान करता है। परन्तु यह स्वतंत्रता व्यक्तियों को नहीं बल्कि धार्मिक सम्प्रदायों को प्रदान की गयी है।

अनुच्छेद 27 में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसा कर (tax) देने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा, जिसकी आय को किसी विशेष धर्म या धार्मिक सम्प्रदाय की उन्नति के लिए खर्च किया गया हो।

अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। ( अनुच्छेद 28 (3) के तहत यह प्रावधान किया गया है की किसी वयक्ति को, राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने अथवा उसमें की जाने वाली धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। 


5-संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (Cultural And Educational Right) अनुच्छेद 29-30 

  भारत की सांस्कृतिक विधता को संरक्षित करने के उद्देश्य से संविधान के अंतर्गत संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार को अनुच्छेद 29 व 30 के अंतर्गत पांचवें मूल अधिकार के रूप में शामिल किया गया है जहां अनुच्छेद 29 के अंतर्गत अल्पसंख्यक वर्गों के हितों को संरक्षण प्रदान किया गया है वहीं अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक वर्गों को शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है।

अनुच्छेद अनुच्छेद 29 (1)  अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है उसे बनाए रखने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद अनुच्छेद 29 (2)  यह प्रावधान करता है कि शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश समय किसी नागरिक को केवल धर्म, मूल वंश, जाति, भाषा इनमें से किसी आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 30  (1)  के अंतर्गत शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार दिया गया है इसके अनुसार भाषा या धर्म पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

 

6-संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to constitutional Remedies) अनु० 32

मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने हेतु उच्चतम न्यायालय को निम्नलिखित पांच प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति है। यथा---

 बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

परमादेश   (Mandamus)

प्रतिषेध .  (prohibition)

उत्प्रेषण .  ( Certiorari)

अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)

1- बंदी प्रत्यक्षीकरण- का अर्थ है शरीर को प्रस्तुत किया जाए। यह रिट ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध की जाती है जिसने किसी व्यक्ति को अवैध रूप से गिरफ्तार किया है।   और उसे 24 घंटे से अधिक समय तक न्यायालय के सामने प्रस्तुत ना किया गया हो।  इसके अंतर्गत न्यायालय निरोध या कारावासित व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित कराता है तथा उसके निरोध की वैधता की परीक्षा करता है निरोध का विधिक औचित्य न होने पर निरुद्ध व्यक्तिय को छोड़ने का आदेश दिया जाता है।

2- परमादेश- परमादेश के तहत ऐसे अधिकारी को आदेश दिया जाता है जो सार्वजनिक कर्तव्यों को करने से इनकार या उपेक्षा करता है अथवा वह अपने कर्तव्य का सही से निर्वहन नहीं करता। 

3- प्रतिषेध- यह रिट कनिष्ठ न्यायालयों या अधिकारियों को अपनी विधिक सीमा या अधिकारिता का अतिक्रमण करने से रोकता है तथा प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन से रोकता है।

4- उत्प्रेषण-- उत्प्रेषण रिट के माध्यम से अधीनस्थ न्यायालय में अधिकारिता का अभाव या आधिक्य है अथवा उसने नैसर्गिक न्यायालय का उल्लंघन किया है या निर्णय में वैधानिक गलती अभिलेख में स्पष्टतः दर्शित है।

5- अधिकार पृच्छा- इसका शाब्दिक अर्थ आपका अधिकार क्या है? यह रिट ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जारी की जाती है जो किसी लोकपद को अवैध रूप से धारण किए हुए है। इसके द्वारा यह पूछा जाता है कि वह किस प्राधिकार से उस पद को धारण किए हुए है? यदि वह कोई सुनिश्चित या विधिक उत्तर नहीं देता है तो उसे उस पद से हटाकर पद को रिक्त घोषित कर दिया जाता है।


      इस प्रकार मूल अधिकार भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है किन्तु इसे संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है।  ब्रिटेन के संविधान में 'बिल ऑफ़ राइट्स' को मूल अधिकार कहा गया है। फ्रांस एवं अमेरिका में इन अधिकारों को प्राकृतिक और अप्रतिदेय अधिकारों के रूप में स्वीकार किया गया है।  भारत में मूल अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकार हैं। इसमें उन आधारभूत अधिकारों का समावेश किया गया है जो राज्य द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।


   





 

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