Recent Post

भारत का इतिहास 1206-1757 The Indian History From 1206-1757

भारत का इतिहास 1206-1757 The Indian History From 1206-1757

  

   आज के समय में प्रतियोगी छात्रों को ध्यान में रखकर मैंने यह ब्लॉग बनाने का प्रयास किया है। जिसमें 1206 ईस्वी से लेकर 1757 ईसवी तक के इतिहास को समेटने का प्रयास किया गया है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम दास वंश से लेकर लोदी वंश तक के सल्तनत काल और संपूर्ण मुगल काल से लेकर उत्तर मुगलकालीन राजनीति, बक्सर तथा प्लासी के युद्ध का  अध्ययन करेंगे।

 

अनुक्रम/content 

1गुलाम वंश या दास वंश 1206-1290

2 खिलजी वंश-1290-1320 

3 तुगलक वंश 1320-1414

4 सैयद वंश 1414-1451

5 लोदी वंश 1451-1526 

मुगल साम्राज्य

उत्तरकालीन मुग़ल 

8 बंगाल में अंगेजी शक्ति का प्रवेश (बक्सर तथा प्लासी का युद्ध) 

        भारत में तुर्क राज्य की स्थापना शिहाबुद्दीन उर्फ मुईनुद्दीन मुहम्मद गोरी ने की। 1194 ईस्वी में चंदावर के प्रसिद्ध युद्ध में गहड़वाल शासक जयचंद को पराजित करने के पश्चात अपने विजित  प्रदेशों की जिम्मेदारी कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप कर वापस गजनी चला गया। 13 मार्च 1206 को मुहम्मद गोरी की हत्या के बाद उसके गुलाम सरदार कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ईस्वी में गुलाम वंश की स्थापना की। 1206 से 1290 के मध्य दिल्ली सल्तनत पर दास या गुलाम वंश का शासन माना जाता है।

 

    
 

दिल्ली सल्तनत का राजनीतिक इतिहास

 

1-- गुलाम वंश या दास वंश 1206-1290

     

 कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210)

दिल्ली सल्तनत का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था, जिसने 1206 से 1210 ईस्वी तक शासन किया।
ऐबक ने अपना राज्य अभिषेक जून 1206 से में लाहौर में करवाया।
इसने अपने नाम से न तो कोई सिक्का चलाया और न ही कभी खुतबे पढ़वाए।
अपनी दानता तथा उदारता के कारण ऐबक को लाख बख्स (लाखों का दानी) कहा गया।
▪️ इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज ने उसकी दानशीलता के कारण ही उसे (ऐबक) को हातिम द्वितीय की संज्ञा दी।
ऐबकके दरबार में प्रसिद्ध विद्वान हसन निजामी तथा फक्र-ए-मुदब्बिर को संरक्षण प्राप्त था।
अपने शासनकाल के 4 वर्ष बाद 1210 ईस्वी में लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरने के कारण ऐबक की मृत्यु हो गई।

  •  कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद 1191 ईस्वी में दिल्ली में बनबाई। 
  •  अढ़ाई दिन का झोपड़ा 1200 ईस्वी में अजमेर में बनवाया।  
  •  क़ुतुब मीनार  निर्माण  भी ऐबक ने शुरू कराया।

 

qutubminar delhi

 

 इल्तुतमिश 1210 से 1236

 

▪️ कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया। परंतु दिल्ली के तुर्क अधिकारियों एवं नागरिकों के विरोध के कारण ऐबक के दामाद इल्तुतमिश को दिल्ली आमंत्रित कर राज्य सिंहासन पर बैठाया गया।
शासक बनने के पहले इल्तुतमिश बदायूं का सूबेदार था।
विद्रोही सरदारों का दमन करने के उद्देश्य से इल्तुतमिश ने अपने गुलाम 40 सरदारों का एक गुट बनाया, जिसे तुर्कान-ए-चहालगानी का नाम दिया गया।
1215 में इल्तुतमिश ने यल्दौज को तराइन के मैदान में पराजित किया और 1217 में नासिरुद्दीन  कुबाचा ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली।
फरवरी 1229 में बगदाद के खलीफा से सम्मान का चोगा प्राप्त हुआ। सम्मान का चोगा प्राप्त होने के बाद इल्तुतमिश वैध सुल्तान एवं दिल्ली सल्तनत एवं दिल्ली सल्तनत एक वैध स्वतंत्र राज्य बन गया।
इल्तुतमिश पहला तुर्क सुल्तान था जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाए। इसने सल्तनतकालीन दो महत्वपूर्ण सिक्के चांदी का टंका (लगभग 175 ग्रेन का), तथा तांबे का जीतल चलवाया।
इल्तुतमिश ने  इक्ता व्यवस्था का प्रचलन किया तथा राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित किया।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार के निर्माण कार्य को पूरा करवाया। भारत में पहला मकबरा निर्मित करने का श्रेय भी इल्तुतमिश को जाता है।


रजिया सुल्तान 1236-1240


इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया था पर उसकी मृत्यु के बाद उसके बड़े पुत्र  रुकनुद्दीन फिरोज को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया।
फिरोज एवं उसकी मां शाह तुर्कान के अत्याचारों से तंग आकर जनता ने रजिया सुल्तान को दिल्ली का शासक बना दिया।
रजिया सुल्तान भारत की प्रथम मुस्लिम महिला थी जिसने दिल्ली पर शासन किया।
रजिया सुल्तान ने लाल वस्त्र धारण कर (लाल वस्त्र पहनकर ही न्याय की मांग की जाती थी) जनता से शाह तुर्कान के विरुद्ध सहायता मांगी।
1240 ईस्वी में इल्तुतमिश के तीसरे पुत्र बहरामशाह ने कैथल के समीप रजिया की हत्या करवा दी।


बहराम शाह 1240-42

 

▪️ मुईजुद्दीन बहरामशाह इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र था।

बहरामशाह को बंदी बनाकर मई 1242 ईसवी में उसकी हत्या कर दी गई।


अलाउद्दीन मसूद शाह 1242-46

 

▪️ वह सुल्तान रुक्नुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र और इल्तुतमिश का पौत्र था।
नसीरुद्दीन महमूद और उसकी माता ने एक षड्यंत्र के द्वारा 1246 ईस्वी में मसूद शाह का अंत कर दिया।


नसीरुद्दीन महमूद 1246-66

 

▪️ इल्तुतमिश का पौत्र नासिरुद्दीन महमूद 10 जून 1246 ईसवी को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसके सिंहासन पर बैठने के बाद अमीर सरदारों और सुल्तान के बीच शक्ति के लिए चल रहा संघर्ष समाप्त हो गया।
नासिरुद्दीन ने राज्य के समस्त शक्ति बलबन को सौंप दी। बलबन को 1249 ईस्वी में 'उलुग खाँ' की उपाधि प्रदान की। तदुपरांत उसे अमीर-ए-हाजीब बनाया गया।
1249 में ही सुल्तान नासिरुद्दीन ने अपनी बेटी का विवाह बलबन के साथ कर दिया।
'इमामुद्दीन रेहान'के बढ़ते प्रभाव के कारण बलबन को 'अमीर-ए-हाजीब' पद से हाथ धोना पड़ा (1253 ईस्वी में) तथा उन्हें हाँसी भेज दिया गया।
1254 ईस्वी में तुर्की सरदारों के सहयोग से बलवान ने रेहान को पदच्युत कर पुनः अपने पद को प्राप्त कर लिया।


बलबन 1266-1286


1266 ईस्वी में नासिरुद्दीन महमूद की अकस्मात मृत्यु के बाद बलबन उसका उत्तराधिकारी बना। क्योंकि महमूद के कोई पुत्र नहीं था।
बलवान इल्बरी जाति का तुर्क सरदार था।
इल्तुतमिश ने ग्वालियर जीतने के उपरांत बहाउद्दीन( बलबन का वास्तविक नाम) को खरीद लिया।(1232)
अपनी योग्यता के कारण बलबन इल्तुतमिश के समय में खासकर रजिया के समय में अमीर-ए-शिकार, बहराम शाह के समय में अमीर-ए-आखूर और महमूद शाह के समय में अमीर-ए-हाजिब, एवं सुल्तान नसीरुद्दीन के समय में अमीर-ए-हाजीब, नायब के रूप में राज्य के संपूर्ण शांति का केंद्र बन गया।
पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत पर मंगोल आक्रमण के भय को समाप्त करने के लिए सैन्य विभाग दीवान-ए-अर्ज की स्थापना की।
बलबन सल्तनत काल का पहला शासक था जिसने अपने सैनिकों को नगद वेतन देने की प्रथा प्रारंभ की।
इसने लौह एवं रक्त की नीति का अनुसरण करते हुए तुर्क-ए-चहलगानी का अंत कर दिया।
सिजदा (लेट कर नमस्कार करना) व पायबोस (पांव का चुंबन लेना) की प्रथा का प्रचलन किया
नवरोज प्रथा प्रचलित की।

  बलबन दिल्ली सल्तनत का पहला ऐसा सुल्तान था जिसने अपने राजतत्व सिद्धांत की विस्तारपूर्वक व्याख्या की।
बलवान ने फारसी रीति-रिवाज पर आधारित उनके राजाओं के नाम की तरह अपने पुत्रों के नाम रखे इनका दरबार ईरानी परंपरा के अंतर्गत सजाया गया था।
बलबन ने खलीफा के महत्व को स्वीकारते हुए अपने द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर खलीफा के नाम को अंकित कराया तथा उसके नाम से खुतबे भी पढ़ें।
   

    कैकूबाद- 1287-90

 

अपनी मृत्यु से पूर्व बलबन ने अपने पौत्र कायखुसरो (राजकुमार मुहम्मद के पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था।
किंतु दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन ने बलबन के नामनिर्देशन को ठुकरा दिया और बुगरा खाँ के पुत्र कैकूबाद को गद्दी पर बैठा दिया। इस नए सुल्तान ने मुइजुद्दीन कैकुबाद की उपाधि ग्रहण की।
कैकुबाद के शासनकाल में मंगोल ने चढ़ाई कर दी। गजनी का तामर खाँ उनका सरदार था।


2-खिलजी वंश-1290-1320


जलालुद्दीन खिलजी 1290-96

 

13 जून 1290 को जलालुद्दीन फिरोज खिलजी दिल्ली के सिंहासन पर बैठा उसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया।
किलोखरी एक नया नगर था जिसे कैकूबाद ने दिल्ली से कुछ मिल दूरी पर बनवाया था।
जलालुद्दीन ने अपने राज्य अभिषेक के एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया।
दिल्ली के सिंहासन पर खिलजी वंश का अधिपत्य हो जाने से भारत में तुर्कों की श्रेष्ठता समाप्त हो गई।
जलालुद्दीन के समय 1290 में कड़ा-मानिकपुर के सूबेदार मलिक छज्जू ने विद्रोह किया था।
इनके समय में दिल्ली का कोतवाल फखरुद्दीन था।
इसी के समय में ईरानी फकीर सिद्धि मौला का विद्रोह हुआ था, जिसे बाद में सुल्तान ने हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था।
इन्होंने 1290 में रणथंभौर पर आक्रमण किया जो असफल रहा। 1292 में मंडौर पर आक्रमण कर उसे दिल्ली में मिला लिया।
1296 ईस्वी में जलालुद्दीन की हत्या उसके भतीजे (दामाद) अलाउद्दीन ने कर दी तथा अपने आप को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया।

अलाउद्दीन खिलजी 1296-1316


अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन फिरोज का भतीजा था। चूँकि अलाउद्दीन पिताहीन था इसलिए जलालुद्दीन ने बड़ी चिंता के साथ उसका पालन-पोषण किया और बाद में उसे अपना दामाद बना लिया।
अलाउद्दीन खिलजी पहला सल्तनतकालीन शासक था जिसने शासन में इस्लाम के सिद्धांतों का पालन नहीं किया।
अलाउद्दीन खिलजी ने अपने राज्याभिषेक के बाद 'यामीन-उल-खिलाफत नासिरी अमीर मुमनिन' (खलीफा का नायब) की उपाधि ग्रहण की थी।

अलाउद्दीन स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश सुल्तान था। दिल्ली का कोतवाल अला-उल-मुल्क ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जिससे अलाउद्दीन ने शासन के विषय में सलाह-मशवरा  किया अथवा जो उसे सलाह देने का साहस कर सका।

अलाउद्दीन ने प्रशासन एवं राजस्व के क्षेत्र में सर्वथा नवीन उपाय लागू किए।
अलाउद्दीन मध्यकाल का पहला शासक था जिसने अपने शासनकाल में आर्थिक विनिमयन को लागू किया। आर्थिक विनिमयन के अंतर्गत खाद्यान्न एवं दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं शासक द्वारा तय दामों पर उपलब्ध थी।
अलाउद्दीन ने बकाया लगान की वसूली के लिए दीवान-ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की।
सल्तनत काल में अलाउद्दीन स्थायी सेना गठित करने वाला पहला सुल्तान था।
अलाउद्दीन ने अपनी सेना का केंद्रीयकरण किया और साथ ही सैनिकों की सीधी भर्ती एवं नगद वेतन देने की प्रथा प्रारंभ की।
इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार अलाउद्दीन के पास लगभग 4,75,000 सैनिक थे।
अलाउद्दीन खिलजी के शासन के समय मंगोलों के एक दर्जन से ज्यादा आक्रमण हुए।
अलाउद्दीन ने 'दाग' या घोड़ों पर निशान लगाने और विस्तृत सूचीपत्रों की तैयारी के लिए 'हुलिया' प्रथा प्रचलित की।
अलाउद्दीन के समय में राज्य गोदामों में अनाज का भंडार किया जाता था।
अलाउद्दीन खिलजी अपनी बाजार व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध है। उसके समय में यदि कोई व्यापारी सामान कम  तौलता था, तो उसकी जांघ से उतना ही मांस निकाल लिया जाता था।
राजस्व सुधारों के अंतर्गत अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम मिल्क, इनाम, वक्फ के अंतर्गत दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा (राजकीय भूमि)  भूमि में बदल दिया। साथ ही स्थानीय जमीदारों के विशेष अधिकारों को समाप्त कर।
2 जनवरी 1316 को अलाउद्दीन की मृत्यु जलोदर रोग से हो गई। कहा जाता है कि विष के मिश्रण में काफूर का हाथ था और इसी से सुल्तान की मृत्यु जल्दी हो गई।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद मलिक काफूर ने 36 दिन तक शासन की बागडोर अपने हाथ में रखी। परंतु उसके बाद उसकी हत्या कर दी गई।

कुतुबुद्दीन मुबारक शाह 1316-20


मलिक काफूर के प्रभाव में अलाउद्दीन ने खिज्रखां को उत्तराधिकार से वंचित करके शहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई उस समय इस बालक की आयु लगभग 6 वर्ष की थी। मलिक काफूर ने उसे सिंहासन पर बैठा दिया और स्वयं उसका संरक्षक बन गया। उसने खिज्रखां व शादीखाँ को अंधा करा दिया। मुबारकखाँ जो उस समय 17 या 18 वर्ष की आयु का था, उसे बंदी बना लिया गया और मलिक काफूर ने उसकी आंखें निकाल लेने के लिए अपने नौकर भेजे, किंतु मुबारक ने उन नौकरों को इतनी घूस दी कि उन्होंने मुबारक को अंधा करने के स्थान पर वापस जाकर मलिक काफूर की हत्या कर दी। मलिक काफूर की मृत्यु के बाद शिहाबुद्दीन उमर के संरक्षक का पद मुबारक को प्राप्त हुआ। लगभग दो महीने बाद मुबारक ने शिहाबुद्दीन उमर को गद्दी से उतार दिया और उसे अंधा करके स्वयं सिंहासनारूढ़ हो गया। यह घटना 1 अप्रैल 1316 को घटित हुई। मुबारक ने कुतुबुद्दीन मुबारक शाह की उपाधि ग्रहण की।
14 अप्रैल 1320 की रात्रि में खुसरो की सेनाएं राजमहल में घुस आईं और उन्होंने राजमहल के संरक्षकों का वध कर दिया। खुसरो ने स्वयं अपने हाथों से मुबारक शाह के बाल पकड़ लिए और उसके एक साथी झरिया ने उसके पेट में कटारी भोंक कर उसकी हत्या कर दी। मुबारक शाह का सिर काटकर राजमहल के  सहन में फेंक दिया गया।

नासिरुद्दीन खुसरो शाह 1320

 

▪️ मुबारक शाह की हत्या के बाद सरदारों की सहायता से खुसरो का 15 अप्रैल 1320 ईस्वी को सिंहासनारोहण हुआ। 5 सितंबर 1320 ईसवी तक उसका शासन चलता रहा। उसने नासिरुद्दीन खुसरो शाह की उपाधि ग्रहण की। बहुत से पुराने अधिकारियों व सरदारों को उनके पद पर रहने दिया गया। कुछ की हत्या भी कर दी गई। खुसरो शाह ने खिज्र खां की विधवा देवल देवी के साथ विवाह कर लिया।
खुसरो शाह की हत्या 5 सितंबर 1320 ईस्वी को कर दी गई इस प्रकार भारत में 30 वर्ष के शासन के बाद खिलजी वंश का अंत हो गया।

3-तुगलक वंश 1320-1414


गयासुद्दीन तुगलक 1320-1325
 

▪️ गयासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक तुगलक वंश का संस्थापक था।। यह वंश करौना तुर्क के वंश के नाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि गयासुद्दीन तुगलक का पिता करौना तुर्क था।
कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी की हत्या कर नासिउद्दीन खुशखशाह 1320 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। 4 महीने बाद गाजी मलिक ने एक युद्ध में खुशखशाह को पराजित कर मार डाला तथा गयासुद्दीन तुगलक के नाम से सत्ता संभाली। इसके साथ ही सल्तनत काल में तुगलक वंश की नींव पड़ी।
गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने 'गाजी' या 'काफिरों का घातक' की उपाधि ग्रहण की।
गयासुद्दीन ने सिंचाई के लिए नेहरों एवं कुओं का निर्माण करवाया। नहरों का निर्माण करने वालों में गयासुद्दीन प्रथम सुल्तान था।
गयासुद्दीन तुगलक ने अपने शासनकाल में करीब 29 बार मंगोलों के आक्रमण को विफल किया।
▪️ इसने लगान के रूप में उपज का 1/10  हिस्सा ही लेने का आदेश दिया।
बंगाल अभियान से लौटते समय उसके पुत्र जूना खाँ ( मुहम्मद तुगलक) द्वारा निर्मित लकड़ी के महल के गिरने से 1325 ईस्वी में सुल्तान की मृत्यु हो गई।

मुहम्मद बिन तुगलक 1325-1352


गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जूना खाँ मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद बिन तुगलक सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था।
राज्यारोहण के बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने कुछ नवीन योजनाओं का निर्माण कर उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया जैसे--

दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि- 1326-27

राजधानी परिवर्तन -1326-27 (दिल्ली से दौलताबाद)

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन-1329-30

खुरासान एवं कराचिल अभियान- 1330-31

मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि विकास के लिए अमीर-ए-कोही (दीवाने कोही) नाम के एक नवीन विभाग की स्थापना की।
इसके शासनकाल में 1333 ईस्वी में अफ्रीकी यात्री इब्न-बतूता भारत आया। सुल्तान ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया। इब्नबतूता ने अपनी भारत से संबंधित जानकारियों को 'रेहला' नामक पुस्तक में लिपिबद्ध किया।
यह एकमात्र सल्तनतकालीन शासक था जो हिंदुओं के प्रमुख त्योहार होली में भाग लेता था।
मुहम्मद तुगलक ने अफ्रीकी यात्री  इब्न-बतूता को अपना राजदूत बनाकर चीन भेजा।
20 मार्च 1351 को थट्टा (सिन्ध) में एक विद्रोह दबाने के दौरान सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई।
इसकी मृत्यु पर इतिहासकार बदायूनी ने इस प्रकार कहा- " और इस प्रकार सुल्तान को अपनी प्रजा से एवं प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।"

फिरोजशाह तुगलक 1351-1388


फिरोजशाह, मुहम्मद बिन तुगलक का चचेरा भाई एवं सिपहसालार रजब का पुत्र था। इसकी मां बीवी जैला राजपूत सरदार रणमल की पुत्री थी।
23 मार्च 1351 ईस्वी को थट्टा के निकट एक डेरे में फिरोज का सिंहासनारोहण हुआ।
1359 में फिरोज ने बंगाल पर चढ़ाई की थी लेकिन वह सफलता प्राप्त नहीं कर सका।
1360 में सुल्तान फिरोज ने जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण किया तथा वहां पुरी के जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त किया।
1361 में फिरोज ने नगरकोट पर आक्रमण कर वहां के शासक को परास्त कर प्रसिद्ध ज्वालामुखी मंदिर को पूर्णत: ध्वस्त कर दिया।

फिरोज ने अपने शासनकाल में 24 कष्टकारी करों को समाप्त कर केवल चार कर-- खराज, खुम्स, जजिया एवं जकात को वसूल करने का आदेश दिया।
सुल्तान ने सिंचाई की सुविधा के लिए यमुना नदी से पांच बड़ी नहरें बनवाई।
इन्होंने मुस्लिम अनाथ स्त्रियों, विधवाओं एवं लड़कियों की सहायता हेतु दीवान-ए-खैरात नामक एक नये विभाग की स्थापना की।
फिरोज ने दासों की देखभाल के लिए दीवाने-ए-बंदगान नामक एक विभाग की स्थापना की।  इनके शासनकाल में दासों की संख्या 1.80 लाख तक पहुंच गई थी।
दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने इस्लामी नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए उलेमा वर्ग को प्रशासनिक कार्यों में महत्व दिया।
फिरोजशाह ने जियाउद्दीन बरनी एवं शम्स-ए-शिराज अफीफ जैसे इतिहासकारों को संरक्षण प्रदान किया।
फिरोज ने अपनी आत्मकथा फतुहात-ए-फिरोजशाही की रचना की।
फिरोज शाह ने मुद्रा व्यवस्था के अंतर्गत बड़ी संख्या में चांदी एवं तांबे के मिश्रण से निर्मित सिक्के चलाए, जिसे अद्धा एवं बिख जाता था।
फिरोज प्रथम सुल्तान था जिसने ब्राह्मणों पर जजिया कर लगाया।
फिरोज को निर्माण का सबसे अधिक चाव था। उसने फिरोजाबाद (दिल्ली का आधुनिक फिरोज शाह कोटला)फतेहाबाद, हिसार, जौनपुर और फिरोजपुर (बदायूं के निकट) उसी के द्वारा स्थापित हुए थे।
फिरोजशाह तुगलक ने 4 मस्जिदें, 30 महल, 200 कारवां सराय, 5 जलाशय, 5 अस्पताल, 100 मकबरे, 10 स्नानागार, 10 स्मारक स्तंभ और 100 पुल बनवाए।
फिरोज ने सिंचाई के लिए पांच नेहरे खुदवाईं, उसने दिल्ली के आसपास 1200 उद्यान लगवाए।
फिरोज शाह का मुख्य वास्तुकार मलिक गाजी सहना था। जिसे अपने कार्य में अब्दुल हक की सहायता मिलती थी।
फिरोजशाह तुगलक ने अशोक के 2 स्तंभों को मेरठ व टोपरा (अब अंबाला जिले में) से दिल्ली लाया गया। टोपरा वाले स्तंभ को महल तथा फिरोजाबाद की मस्जिद के निकट पुनः स्थापित कराया गया। मेरठ वाले स्तंभ को दिल्ली के वर्तमान बाड़ा हिंदू राव अस्पताल के निकट एक टीले कश्के शिकार या आखेट-स्थान के पास पुनः स्थापित कराया गया।
फिरोज शाह ने खैराती अस्पताल जिसे दारुल शफा कहते हैं की भी स्थापना की।
80 वर्ष की आयु में फिरोज तुगलक की 20 सितंबर 1388 को मृत्यु हो गई। मोरलैंड के मतानुसार फिरोज की मृत्यु से एक युग समाप्त हो गया। कुछ ही वर्षों में साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में भारत में एक भी प्रभावशाली मुस्लिम शक्ति न रही।

4 सैयद वंश 1414-1451

  खिज्र खां 1414-1422 

तुगलक वंश के अंतिम शासक नासिरुद्दीन महमूद शाह की मृत्यु के बाद खिज्र खाँ ने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार कर एक नए राजवंश सैयद वंश की नींव डाली।
खिज्र खाँ ने जीवन पर्यंत 1414 से 1421 सुल्तान की उपाधि न धारण कर अपने को रैयत-ए-आला की उपाधि से प्रसन्न रखा।
खिज्र खाँ अपने को तैमूर के लड़के शाहरुख का प्रतिनिधि बताता था साथ ही उसे नियमित कर भेजा करता था।
20 मई 1421 ईसवी को खिज्र खां की मृत्यु हो गई।

मुबारक शाह 1421-34


20 मई 1421 को खिज्र खाँ का लड़का मुबारक शाह गद्दी पर बैठा। इसने प्रसिद्ध विद्वान एवं इतिहासकार याहिया-बिन-अहमद सरहिंदी को अपना राज्याश्रय प्रदान किया। इसके ग्रंथ तारीख-ए-मुबारक शाही में मुबारक शाह के शासनकाल के विषय में जानकारी मिलती है।
20 फरवरी 1434 को मुबारक शाह की हत्या कर दी गई।

मुहम्मद शाह 1434-44


जब मुबारक शाह का वध हुआ, उसके कोई पुत्र नहीं था। अतः अमीरों व सरदारों ने मुहम्मद शाह को गद्दी पर बिठाया जो उसके भाई फरीद का पुत्र था।

आलमशाह 1444-51


जब 1444 में मुहम्मद शाह की मृत्यु हुई तो उसका पुत्र अलाउद्दीन गद्दी पर बैठा ,जिसने आलम शाह की उपाधि धारण की।
यह नया सुल्लान अपने पिता से भी अधिक कमजोर निकला।
19 अप्रैल 1451 को बहलोल लोदी ने दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा कर लिया। और लोदी वंश की स्थापना की।

 

5 -लोदी वंश 1451-1526  

 बहलोल लोदी 1451-1489 

  • बहलोल लोदी ने लोदी वंश( प्रथम अफगान राज्य) स्थापना की। 
  • इसके शासन की प्रमुख विशेषता थी जौनपुर का एक बार फिर से दिल्ली में शामिल होना। 
  • बहलोल अपने सरदारों को मकसद-ए-अली कहकर पुकारता था। 
  • इन्होनें अपने शासन काल में बहलोली सिक्के का प्रचलन करवाया जो अंग्रेजों के  समय तक चलता रहा। 
  • बहलोल लोदी का पुत्र एवं उत्तराधिकारी निज़ाम खां 17 जुलाई 1489 में सिकंदर शाह की उपाधि लेकर दिल्ली के सिंघासन पर बैठा।
  • 1505 में सिकंदर लोदी ने आगरा शहर की नींव डाली। 
  • सिकंदर लोदी ने  भूमि की मापग के लिए एक प्रामाणिक पैमाना गज-ए-सिकंदरी  प्रचलन किया। 
  • इन्होने आगरा को 1506 में अपनी नई राजधानी बनाया। 
  • 21 नवंबर 1517 को इब्राहिम लोदी आगरा के सिंहासन पर बैठा। 
  • 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में हुए भीषण युद्ध में बाबर के हाथों पराजित होना पड़ा  और अंत में उसकी हत्या कर दी गयी। 
  • इब्राहिम की  मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत का भी अंत हो गया। बाबर ने भारत में एक नए वंश ( मुग़ल ) की नींव रखी 

    मुगल साम्राज्य


    बाबर 1526-30

     
  • जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर भारत में मुगल वंश का संस्थापक था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ था। उसके पिता मिर्जा उमर शेख फरगना के शासक थे।
  •  
    बाबर अपने पिता पक्ष से तैमूर का पांचवा तथा मातृ पक्ष से चंगेज खाँ का चौदहवां वंशज था। वस्तुतः बाबर को  'तुर्क-चुगताई' वंश परंपरा से संबंधित माना जाता है।
  •  
    मध्य एशिया व अफगानिस्तान की दुर्बल राजनीतिक व आर्थिक स्थिति, भारत की संसाधन संपन्नता तथा भारत में दिल्ली सल्तनत की अस्थिर राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने की प्रेरणा दी। बाबर ने भारत पर 5 बार आक्रमण किया।
  •  
    1519 ईसवी में बाबर ने अपने प्रथम अभियान में हिंदुस्तान के प्रवेश द्वार भीरा और बाजौर के किले पर अधिकार किया। यह अभियान युसूफ जाति के विरुद्ध था जिसमें बाबर ने पहली बार तोपखाने का प्रयोग किया था।
    बाबर ने चौथे अभियान 1524 ईस्वी में लाहौर एवं दीपालपुर पर अधिकार कर लिया। इसी अभियान के समय दौलत खाँ, राणा सांगा ने बाबर को दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया।
  •  
    पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर के पांचवें अभियान की परिणति थी जिसमें अफगान शासक इब्राहिम लोदी (लोदी वंश) की मृत्यु हो गई और दिल्ली सल्तनत का अंत हो गया।
    पानीपत के युद्ध में बाबर ने उज्बेकों (मंगोलों) की 'तुलुग्मा युद्ध व्यूह नीति' का प्रयोग किया था, तथा इसमें तोपखाने का संचालन निशानेबाज उस्ताद अली एवं मुस्तफा ने किया
    पानीपत के युद्ध में लूटे गए धन को बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों, रिश्तेदारों सहित नौकरों में बांटा और काबुल के प्रत्येक निवासी को चांदी का एक-एक सिक्का प्रदान किया इस उदारता के कारण बाबर को कलंदर की उपाधि दी गई।
    पानीपत विजय के बाद बाबर ने अपने सबसे प्रिय पुत्र हुमायूं (बाबर के 4 पुत्र थे---हुमायूं, कामरान, अस्करी तथा हिंदाल ) को प्रसिद्ध कोहीनूर हीरा दिया। जिसे उसने ग्वालियर के राजा विक्रमाजीत से छीना था।
  •  
    बाबर ने अपनी आत्मकथा तजुके-बाबरी तुर्की भाषा में लिखी। इस पुस्तक में बाबर ने भारत की भूमि, लोग, पशु-पक्षी, धनसंपदा और राज्यों का विस्तार से वर्णन करते हुए दक्षिण भारत के विजयनगर के राजा (कृष्णदेव राय) का विशेष उल्लेख किया है और उसे क्षेत्र एवं सेना की दृष्टि से काफिर नृपतियों में सर्वाधिक शक्तिशाली कहा है।
    खानवा का युद्ध बाबर और मेवाड़ के शासक राणा सांगा के बीच 1527 ईस्वी में लड़ा गया। इस युद्ध के समय बाबर ने मुसलमानों से 'तमगा कर' न लेने की घोषणा और राणा सांगा के विरुद्ध जेहाद का ऐलान किया। इस युद्ध में विजय के पश्चात बाबर ने 'गाजी' की उपाधि धारण की।
    26 जनवरी 1528 को बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया और चंदेरी के युद्ध में राणा सांगा के मित्र और राजपूत शासक मेदिनीराय को पराजित किया।
    घाघरा का युद्ध 6 मई 1529 को हुआ, जिसमें बाबर ने बिहार के अफगान शासक और बंगाल के शासक नुसरत शाह की सेना को संयुक्त रूप से पराजित किया।
    बाबर को गद्य लेखन की शैली 'मुबइयान' का जन्मदाता माना जाता है। उसकी मृत्यु 27 दिसंबर 1530 को आगरा में हुई। उसे आगरा के आरामबाग में दफनाया गया जिसे बाद में काबुल ले जाया गया।

  • बाबर ने दिल्ली के सुल्तानों की परंपरा को तोड़कर खलीफा के प्रभुत्व को अस्वीकार किया और 1507 में पादशाह की पदवी धारण की।
    बाबर की आत्मकथा तुजुके-बावरी का तुर्की से फारसी भाषा में अनुवाद अब्दुर्रहीम खानखाना और प्यादाखाँ ने किया जो'बाबरनामा' के नाम से जाना जाता है।
    पानीपत का युद्ध--1526
    खानवा का युद्ध---1527
    चन्देरी का युद्ध----1528
    घाघरा का युद्ध----1529
    बाबर की मृत्यु-----1530

    बाबर का प्रधानमंत्री निजामुद्दीन खलिफा था।
    बाबर ने अपने दरबार का गठन फारसी रीति-रिवाज से किया।
    1826  ईस्वी में लेयडन और इर्सकिन ने तजुक-ए-बाबरी का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया।

    हुमायूं 1530-56


    भाग्यशाली हुमायूं बाबर का जयेष्ठ पुत्र था उसके तीन भाई कामरान, असकरी और हिंदाल थे।
    हुमायूं का जन्म 6 मार्च 1508 में काबुल में हुआ था। उसकी माता का नाम महिम बेगम था जो संभवत: शिया थी। 
  •  12 वर्ष की अवस्था में हुमायूं को बाबर ने उत्तराधिकारी घोषित किया और वदख्शां का गवर्नर बनाया।
    30 सितंबर 1530 को हुमायूं आगरा के सिंहासन पर बैठ गया। उस समय उसकी आयु 23 वर्ष की थी।
  •  
    अपने पिता की वसीयत के मुताबिक हुमायूं ने अपने भाई कामरान को काबुल तथा कंधार, अस्करी को संभल और हिंदाल को अलवर तथा मेवात की जागीरें दीं।
    गुजरात के अफगान शासक बहादुरशाह के विरोध को दबाने के लिए हुमायूं ने 1532 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया। लेकिन बिहार के शासक महमूद लोदी के जौनपुर की तरफ बढ़ने की सूचना पाकर उसने कालिंजर का घेरा उठा लिया और यह सैन्य अभियान असफल रहा।
    हुमायूं की सेना और महमूद लोदी की सेना के बीच 1532 ईस्वी में 'दौहरिया का युद्ध' हुआ जिसमें हुमायूं को विजय मिली और उसने जौनपुर पर अधिकार कर लिया।
    हुमायूं ने 1533 ईसवी में मित्रों एवं शत्रुओं को प्रभावित करने और विरोधी शासकों के आक्रमण से बचने के उद्देश्य से दिल्ली के नजदीक 'दीन-पनाह' नामक नगर की स्थापना की। वस्तुतः यह एक आपातकालीन राजधानी थी।
    बिहार में 1534 ईसवी में जमान मिर्जा एवं मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के विद्रोह को दबाने में हुमायूं सफल रहा
    गुजरात के शासक बहादुर शाह ने तुर्की के कुशल तोपची रूमी खां की सहायता से एक बेहतर तोपखाने का निर्माण करवाया लेकिन हुमायूं द्वारा घेरे जाने के बाद बहादुर शाह को इस श्रेष्ठ तोपखाने को स्वयं नष्ट कर भागना पड़ा। परंतु इसके बाद तोपची रूमी खां हुमायूं की सेवा में चला गया।
    शेरखाँ के व्यवहार से नाराज होकर 1537 ईस्वी में हुमायूं ने चुनार पर दूसरा घेरा डाला। पहला घेरा 1532 ईस्वी में डाला गया था जिसमें 4 महीने पश्चात शेरखाँ ने हुमायूं की अधीनता स्वीकार कर ली थी। तोपची रूमी खाँ के तोपखाने के कुशल संचालन के कारण और कूटनीति द्वारा हुमायूं चुनार के किले पर कब्जा करने में सफल रहा।
    26 जून 1539 को हुमायूं एवं शेरखाँ की सेनाओं के बीच चौसा का युद्ध हुआ। जिसमें हुमायूं की पराजय हुई। हुमायूं ने एक भिश्ती(सक्का) की मदद से गंगा नदी पार कर अपनी जान बचाई।
    17 मई,1540 को हुमायूं ने अपने भाइयों असकरी और हिन्दाल की सहायता से सेनाएं एकत्रित कर शेरशाह पर आक्रमण किया। लेकिन कन्नौज या बिलग्राम की इस लड़ाई में हुमायूं की निर्णायक पराजय हुई और वह भागकर सिंध चला गया।
  •  
    निर्वासन के समय हुमायूं ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरु फारसवासी शिया मीर बाबा दोस्त उर्फ मीर अली अकबर जामी की पुत्री हमीदा बानो से 29 अगस्त, 1541 को निकाह किया। अकबर का जन्म हमीदा बानो बेगम से ही हुआ (1543)
    ईरान के शासक तहमास्प ने हुमायूं को शरण दी और 1544 में दोनों में संधि हुई, जिसके अनुसार हुमायूं ने कंधार ईरान को दे दिया और बदले में हुमायूं को काबुल और गजनी पर अधिकार पाने में सहायता का आश्वासन मिला।
    ईरान (शाह तहमास्प) द्वारा काबुल व गजनी पर अधिकार करने में मदद नहीं देने पर हुमायूं ने 1545 ईस्वी में ईरानियों से कंधार छीन लिया। 1545 में ही उसने काबुल पर कब्जा कर लिया।
  •  
     सूर शासक इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद हुमायूं  ने लाहौर पर आक्रमण किया और 1558 ईस्वी में लाहौर पर कब्जा कर लिया।
     अफगान शूर शासक सिकंदर शाह सूर से मच्छीवारा का युद्ध (15 मई 1555) तथा सरहिंद का युद्ध (22 जून, 1555) जीतने के बाद 23 जुलाई, 1555 को हुमायूं ने पुनः दिल्ली की गद्दी प्राप्त की।
    हुमायूं की मृत्यु 26 जनवरी 1556 को दीन-पनाह किले में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर हो गई।
    लेनपूल के अनुसार हुमायूं ने जिस प्रकार लुढ़क-पुढ़ककर जीवन व्यतीत किया उसी प्रकार वह उन मुसीबतों से बाहर निकल आया। लेनपूल के कहने का आशय यह था कि पहले हुमायूं ने सबकुछ खो दिया और बाद में उसने पुनः प्राप्त कर लिया।
    उसकी मृत्यु पर लेनपूल ने कहा कि वह जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाकर ही उसकी मृत्यु हो गई।
    हुमायूं का ज्योतिष में अत्यधिक विश्वास था। इसलिए उसने सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाएं।
    हुमायूं के जीवन वृत्त 'हुमायूंनामा' की रचना उसकी बहन गुलबदन बेगम ने की।

    कालिंजर का युद्ध--- 1531
    दौराहा का युद्ध -------1532
    चुनार का घेरा------- 1532
    बहादुरशाह के साथ युद्ध-1535-36
    शेरखाँ के साथ युद्ध 1537-39
    चौसा का युद्ध-------- 1539
    कन्नौज का युद्ध----    1540
  •  
  •  शूरवंश 1540-1555

    शेरशाह सूरी 1540-1545 ईसवी

    शेरशाह ने उत्तर भारत में सूर् वंश के अंतर्गत द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। उसके बचपन का नाम फरीद था और पिता हसन खाँ जौनपुर राज्य के अंतर्गत सहसराम बिहार के जमींदार थे।
  •  फरीद ने जौनपुर में शिक्षा ग्रहण की थी और वहां 3 वर्षों तक अरबी और फारसी का ज्ञान प्राप्त किया।
  •  1497 ईस्वी 1528 ईसवी तक निरंतर 21 वर्ष तक फरीद ने अपने पिता की जागीर की देखभाल की और शासन का अनुभव प्राप्त किया।
  •   फरीद ने भारत में दक्षिण बिहार के सूबेदार बाहर खाँ लोहानी के यहां नौकरी कर ली। वहां एक शेर को मारने के कारण फरीद को 'शेर खाँ' की उपाधि दी गई।
  •   एक समय शेर खां बाबर की सेवा में चला गया था, जहां उसने मुगलों के सैनिक संगठन और रणनीति को समझा। वह 1528 ईसवी में चंदेरी के युद्ध में शामिल हुआ था।
  •   1528 में बंगाल के शासक नुसरत शाह ने दक्षिण बिहार पर आक्रमण किया परंतु शेर खां ने उसे परास्त कर दिया। शेर खां की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर लोहानी सरदार जलाल खां को लेकर बंगाल भाग गए। इसी अवसर पर शेर खां ने 'हजरत-ए-आला' की उपाधि ग्रहण की और वह दक्षिण बिहार का वास्तविक स्वामी बन बैठा।
  •   1530 इसमें उसने चुनार के किलेदार जातखां की विधवा लाड मलिका से विवाह किया और चुनार के शक्तिशाली किले पर अधिकार के साथ-साथ अकूत संपत्ति प्राप्त की। 
  •  1532 ईसवी में दौहरिया का युद्ध महमूद लोदी के नेतृत्व में अफ़गानों ने हुमायूं से किया। इसमें शेर खां ने भी भाग लिया था जिसमें अफ़गानों की पराजय हुई थी।
  •   1534 ईस्वी में बंगाल के शासक महमूद शाह ने दक्षिणी बिहार पर आक्रमण किया, जिसे शेर खां ने 'सूरजगढ़ा के युद्ध' में पराजित किया।
  •   1539 में चौसा का युद्ध हुमायूं और शेर खां के बीच हुआ जिसमें हुमायूं पराजित हुआ। इस विजय के पश्चात शेर खां ने ' शेरशाह सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि ग्रहण की और वह बंगाल और बिहार का सुल्तान बन गया। 
  •  1540 में शेरशाह ने कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध में हुमायूं को पुनः पराजित किया और उसके बाद आगरा, दिल्ली, संभल, ग्वालियर, लाहौर आदि सभी स्थान पर अधिकार कर लिया।
  •   1541 ईस्वी में शेरशाह ने पश्चिमोत्तर सीमा के गक्खरों पर आक्रमण किया। गक्खर जाति मुगलों के प्रति वफादार थी।
  •   पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा व्यवस्था के लिए शेरशाह ने वहां एक दृढ़ किला बनवाया जिसका नाम रोहतास गढ़ रखा।
  •   1541 में ही खिज्र खां नामक सूबेदार ने बंगाल में विद्रोह किया, जिसे शेरशाह ने स्वयं जाकर दबाया।
  •   शेरशाह ने बंगाल के प्रशासनिक व सैन्य शक्ति का पुनर्गठन कर एक सैनिक अधिकारी को नव सृजित पद 'आमीन-ए-बंगला' अथवा अमीर-ए-बंगाल पर नियुक्त किया। सर्वप्रथम काजी फजीलात नामक व्यक्ति को यह पद दिया गया।
  •   1542 ईस्वी में शेरशाह ने मालवा को कादिर शाह से और 1543 ईसवी में रायसीन को पूरनमल से जीत लिया। चालाकी, धोखे और विश्वासघात के करण रायसीन की विजय को शेरशाह के नाम पर गहरा धब्बा माना जाता है।
  •   1543 में ही शेरशाह ने मुल्तान और 1544 ईस्वी में मारवाड़ पर विजय प्राप्त की। मारवाड़ विजय भी शेरशाह की कूटनीतिक चालों और चालाकी का परिणाम था। मारवाड़ के राजपूतों के शौर्य से प्रभावित हो उसने कहा : 'मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान के साम्राज्य को प्रायः खो चुका था।'
  •   1545 ईस्वी में बुंदेलखंड के कालिंजर के किले पर किया गया अभियान शेरशाह का का अंतिम अभियान था। गोला बारूद के ढेर में आग लग जाने के कारण शेरशाह बुरी तरह जख्मी हो गया। उसकी मृत्यु के पूर्व कालिंजर को जीत लिया गया था।
  •   शेरशाह की मृत्यु 22 मई 1545 ईस्वी को हुई।
  •   शेरशाह महान शासन प्रबंधक था उसे अकबर का अग्रणी माना जाता है। 
  •  पंजाब के फौजदार या हाकिम हैबत खां को शेरशाह ने 'मसनद-ए-आला' की उपाधि प्रदान की थी।
  •   शेरशाह की लगान-व्यवस्था मुख्यतः रैयतवाड़ी थी। जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क किया गया था। मुल्तान के अतिरिक्त राज्य के सभी भागों में यह लागू की गयी थी।
  •   न्याय करना धार्मिक कार्य में सर्वश्रेष्ठ है और इसे सभी काफिर और मुसलमान बादशाह स्वीकार करते हैं। -यह कथन शेरशाह का है।
  •   शेरशाह ने 'दाम' नामक ताँबे के नए सिक्के चलाए।
  •   शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका छोटा लड़का जलाल खां 27 मई 1545 ईसवी को इस्लामशाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।
  •  1553 इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद फिरोजशाह गद्दी पर बैठा लेकिन उसके मामा मुबारिज खां ने उसकी हत्या कर दी और मुहम्मद आदिलशाह के नाम से शासक बना। हेमू इसी का सेनापति था।

    अकबर  1556-1605


     
  • अमरकोट के राजा वीरसाल के यहां 15 अक्टूबर 1542 को अकबर का जन्म हुआ। उसका पूरा नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था।
  •  हुमायूं की मृत्यु के बाद पंजाब के गुरदासपुर जिले के निकट 'कलानौर' नामक स्थान पर 14 फरवरी 1556 को अकबर को मुगल बादशाह घोषित किया गया। उस समय उसकी आयु 14 वर्ष के करीब थी।
  •  अकबर ने अपने संरक्षक बैरम खां को अपना वकील नियुक्त किया और उसे 'खान-ए-खाना' की उपाधि दी।
  •  बैरम खाँ फारस (पर्शिया) का रहने वाला था। उसके पिता सैफ अली बेग ने बाबर के यहां नौकरी प्राप्त की थी और स्वयं बैरम खाँ 16 वर्ष की आयु से हुमायूं की सेवा में आ गया था।
  •   पानीपत का दूसरा युद्ध अकबर और सूर मुहम्मद आदिल शाह सूर के सेनापति हेमू के बीच लड़ा गया। इसमें हेमू की पराजय हुई है। हेमू की पराजय का मुख्य कारण उसके तोपखाने का पहले ही मुगलों के हाथ में चला जाना और युद्ध के दौरान उसकी आंख में तीर लग जाना था।
  •   हेमू ने 24 युद्धों में भाग लिया था जिनमें से उसने 22 युद्धों में सफलता प्राप्त की। दिल्ली में हेमू ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।
  •   अकबर के राज्यारोहण के बाद बैरम खां के संरक्षण का 4 वर्ष का समय कंधार की हानि के अतिरिक्त सफलता, सुरक्षा और संगठन का था।
  •  1560 इसमें बैरम खाँ का पतन हो गया। निजामुद्दीन के अनुसार उसके पतन का मुख्य कारण विभिन्न सरदारों द्वारा अकबर को भड़काया जाना था। जबकि 'अकबरनामा' के अनुसार बैरम खां के पतन का मुख्य कारण उसका दम्भ था।
  •   मक्का की तीर्थ यात्रा के क्रम में 'पाटन' नामक स्थान पर मुबारक खां नामक एक अफगान युवक ने बैरम खां की हत्या कर दी। 
  •  अकबर ने बैरम खां की विधवा सलीमा बेगम से निकाह कर लिया और उसके 4 वर्षीय पुत्र अब्दुर्रहीम को पुत्रवत संरक्षण दिया जिसने आगे चलकर 1584 में 'खानखाना' की उपाधि प्राप्त की।
  •   1560-62 ईसवी तक के अकबर के शासनकाल को 'पेटीकोट' शासन की संज्ञा दी जाती है क्योंकि इस अवधि में अकबर पर हरम दल का प्रभाव था। इस दल के प्रमुख सदस्य- धाय माहम अनगा, जीजी अनगाआधम खां, मुनीम खां, शहाबुद्दीन खां थे।
  •   अकबर का साम्राज्य विस्तार 
  •  1559 ईस्वी में अकबर ने ग्वालियर पर, 1560 में अकबर के सेनापति जमाल खां ने जौनपुर पर तथा 1561 में चुनार पर अधिकार कर लिया।
  •   आधम खां के नेतृत्व में मुगल सेना ने 1561 ईस्वी में मालवा के शासक बाजबहादुर को पराजित किया और मालवा की राजधानी 'सारंगपुर' पर अधिकार कर लिया।
  •  अकबर ने 1564 में गोंडवाना विजय हेतु आसफ खां को भेजा। वहां के शासिक रानी दुर्गावती अपने पुत्र वीरनारायण सहित वीरगति को प्राप्त हुई।
  •   1562 ईस्वी में अजमेर स्थित शेख मुइनुद्दीन चिश्ती दरगाह की यात्रा के समय अकबर की मुलाकात आमेर के शासक भारमल या बिहारीमल से हुई। भारत का पहला राजपूत शासक था जिसने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की।
  •   भारमल की पुत्री जोधाबाई से अकबर ने विवाह कर लिया जिससे जहांगीर पैदा हुआ।
  •   1567-68 ईस्वी में मेवाड़ विजय को अकबर के विजय अभियानों में एक धब्बा माना गया है क्योंकि इस राज्य के चित्तौड़ किले पर अधिकार के बाद 30,000 राजपूतों को कत्ल कर दिया गया था। इसे मिटाने के लिए अकबर ने इस युद्ध के दो वीरों जयमल और फत्ता (फतेह सिंह) की मूर्तियां आगरा किले के दरवाजे पर स्थापित करवाई।
  •  अकबर के गुजरात विजय (1573 ईसवी) के दूसरे अभियान को इतिहासकार स्मिथ ने 'संसार के इतिहास का सर्वाधिक द्रुतगामी आक्रमण' कहा है
  •   गुजरात आक्रमण के समय ही अकबर सर्वप्रथम पुर्तगालियों से मिला और यहीं  उसने पहली बार समुद्र को देखा। 
  •  मेवाड़ पर आधिपत्य के लिए हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में राजा मान सिंह के नेतृत्व में राणा प्रताप से लड़ा गया लेकिन यह भी मेवाड़ पर पूर्ण आधिपत्य के बिना ही समाप्त हो गया।
  •  अकबर द्वारा काबुल विजय 1581 ईसवी में की गई और कश्मीर विजय 1585-86 ईसवी में की गई। अकबर द्वारा सिंध विजय-1591ईस्वी, उड़ीसा विजय 1590-92 ईस्वी, बलूचिस्तान विजय 1595 ईस्वी तथा कधार विजय 1595 में की गई।
  •   मुगल सीमा के सर्वाधिक नजदीक होने के कारण खानदेश ने मुगल आधिपत्य स्वीकार कर लिया। खानदेश को दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार माना जाता है।
  •   मुगल सेना ने 1599 ईस्वी में दौलताबाद एवं 1600 ईस्वी में अहमदनगर पर अधिकार कर लिया। वहाँ की शासिका चांद बीवी ने आत्महत्या कर ली।
  •   असीरगढ़ की विजय अकबर की अंतिम विजय थी जिस पर 1601 ईस्वी में कब्जा किया गया। अकबर ने सम्राट की उपाधि दक्षिण को जीतने के बाद ही ग्रहण की।
  •   अकबर द्वारा 1579 में जारी किए गए 'अजहर' नामक दस्तावेज की प्रेरणा शेख मुबारक फैजी और अबुल फजल से मिली। इसके बाद अकबर ने 'सुल्तान-ए-आदिल' की उपाधि ग्रहण की। इस घोषणा ने अकबर को सबसे बड़ा धर्माधिकारी बना दिया।
  •   अकबर द्वारा 1582 ई. प्रवर्तित 'दीन-ए-इलाही (तकहीद-ए-इलाही) दैवी एकेश्वरवाद और सर्वधर्म समभाव पर आधारित था। अबुल फजल इस धर्म का प्रधान पुरोहित था। हिंदू राजाओं में केवल बीरबल ने ही इसे स्वीकार किया था।
  •  अकबर के लिए 'राजत्व का सिद्धांत' अबुल फजल ने तैयार किया जिसमें 'अरस्तु' द्वारा उल्लिखित चार तत्वों आग, हवा, पानी और भूमि का सम्राट अकबर की शरीर संरचना में समावेश माना गया। इसमें योद्धा- अग्नि, शिल्पकार व व्यापारी-हवा, विद्वान-पानी तथा किसान व सेवक-भूमि स्वरूप थे।
  •  सूफी मत में अपने आस्था रखने वाले अकबर ने 'चिश्ती संप्रदाय' को आश्रय दिया।
  •   अकबर ने जैन धर्म के आचार्य हरिविजय सूरि को 'जगतगुरु' की उपाधि प्रदान की और 'खरतर-गच्छ' संप्रदाय के जैन आचार्य जिन जिनचंद्र सूरी को 200 बीघा जमीन जीवन निर्वाह हेतु प्रदान की।
  •   बंगाल एवं बिहार का विद्रोह 1580-81 ईसवी में हुआ। इस विद्रोह का दमन राजा टोडरमल ने किया।
  •   अकबर के कश्मीर अभियान के दौरान 1585 ई० में पश्चिमोत्तर सीमा पर यूसुफजाई अफ़गानों एवं बलूचियों ने विद्रोह कर दिया जिसे दबाने के लिए बीरबल को भेजा गया जिसमें उसकी हत्या हो गई।
  •   1602 ईसवी में सलीम (जहांगीर) के निर्देश पर दक्षिण से आगरा की ओर आ रहे अबुल फजल की रास्ते में वीर सिंह बुंदेला नामक सरदार ने हत्या कर दी।
  •   अकबर अबुल फजल का बड़ा भाई फैजी अकबर का राजकवि था। दीन-ए-इलाही धर्म का कट्टर समर्थक था। 
  •  अकबर के दरबार को सुशोभित करने वाले नवरत्न इस प्रकार थे--
  •  बीरबल।
  •  अबुल फजल 
  •  टोडरमल 
  •  भगवानदास 
  •  तानसेन 
  •  मानसिंह 
  •  अब्दुर्रहीम खानखाना 
  •  मुल्ला दो प्याजा और
  •  हकीम हुमाम 
  • तानसेन अकबर का दरबारी गायक था जिसका जन्म ग्वालियर में हुआ था। इसकी प्रमुख कृतियां (संगीत रचना) थीं-- मियां की टोड़ी, मियां का मल्हार, मियां का सारंग, आदी। अकबर ने तानसेन को 'कंठा भरण वाणी विलास' की उपाधि प्रदान की थी।
  •   अखबार ने तुलादान, झरोखा दर्शन आदि जैसे विभिन्न हिंदू प्रथाओं को स्वीकार किया था।
  •  हुमायूं जिस समय भारत पर पुनर्विजय के लिए संघर्षरत था, उस समय अकबर का संरक्षक मुनीम खाँ था। 

     

    जहांगीर 1605 1627 ईसवी

     

  • 1605 ईस्वी में अकबर की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सलीम 'नुरुद्दीन मुहम्मद सलीम जहांगीर' की उपाधि धारण कर मुगल बादशाह बना।
  • जहांगीर का जन्म सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से राजा भारमल की पुत्री जोधाबाई (मरियम उज्ज़मानी) से 30 अगस्त 1559 ई० को हुआ था। सूफी संत के नाम पर  ही इसका नाम सलीम रखा गया। अकबर उसे  शेखू बाबा के नाम से पुकारता था।
  • अब्दुर्रहीम खानखाना जहांगीर के गुरु थे। उसके व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव उसके गुरु का ही था।
  • सर्वप्रथम सैन्य अभियान के लिए जहांगीर को 1581 ईसवी में काबुल भेजा गया। इससे पूर्व 1577 ई० में उसे 10,000 मनसब  तथा बाद में 1585 ई० में 12000 मनसब प्रदान किया गया।
  • 15 वर्ष की आयु में उसका विवाह राजा भगवानदास की पुत्री मानबाई से हुआ। जिसे शाहबेगम का पद दिया गया। जहांगीर का सबसे बड़ा पुत्र खुशरो इसी से उत्पन्न हुआ।
  •   1586 ईस्वी में उसका दूसरा महत्वपूर्ण विवाह राजा उदय सिंह की पुत्री जगतगोसाई से हुआ जिसकी संतान शहजादा खुर्रम (बादशाह शाहजहां) था।
  •    1599 ई० में  जहांगीर ने बादशाह अकबर के विरूद्ध विद्रोह कर दिया और इलाहाबाद में स्वतंत्र शासक बन बैठा।
  •    जहांगीर ने आगरा के किले के शाहबुर्ज से बाहर यमुना नदी के तट पर एक सोने की जंजीर डलवा दी थी जिसे खींचकर कोई भी व्यक्ति बादशाह से न्याय की मांग कर सकता था।
  •    1606 में जहांगीर के ज्येष्ठ पुत्र खुसरो ने विद्रोह कर दिया जिसे भैरावल के युद्ध में पराजित कर बंदी बना लिया गया। खुसरो को समर्थन देने के आरोप में पांचवे सिख गुरु अर्जुन देव को मृत्युदंड दिया गया।
  •   1615 में मेवाड़ और मुगलों में संधि हो गई। राणा अमरसिंह ने जहांगीर के अधीनता स्वीकार कर ली। युवराज करण सिंह को मुगल दरबार में सेवा के लिए भेजा गया।
  •    1617 ई० में जहांगीर के पुत्र शहजादा खुर्रम ने दक्षिण विजय किया। इसके लिए खुर्रम को 'शाहजहां' की उपाधि दी गई। दक्षिण अभियान पर जाने के समय खुर्रम को 'शाहसुल्तान' की उपाधि दी गई थी।
  •    1620 ई० में शहजादा खुर्रम के नेतृत्व में राजा विक्रमाजीत ने कांगड़ा का किला जीत लिया।
  •    1611 में टोडरमल के पुत्र कल्याणमल ने खुर्दा (उड़ीसा) को राजा पुरषोत्तम दास से जीता। राजा ने अपनी पुत्री जहांगीर को भेंट की।
  •   1622 ई० में शाहजहां के विद्रोह के कारण जहांगीर कंधार की रक्षा न कर सका और कंधार मुगलों के हाथ से निकल कर पर्शिया (फारस)  के हाथ में चला गया।
  •    1611 सभी में जहांगीर ने नूरजहां से विवाह किया। नूरजहां का वास्तविक नाम मेहरून्निसा था जो ईरानी मिर्जा ग्यासबेग की पुत्री थी। ग्यासबेग को उसकी योग्यता के कारण 'एतमाद-उद-दौला' की उपाधि दी गई।
  •    जहांगीर ने बीजापुर के शासक आदिलशाह को 'फर्जंद' (पुत्र) की उपाधि देकर सम्मानित किया।
  •   नूरजहां का पहला विवाह अली कुली खां से हुआ था जिसे जहांगीर ने 'शेर अफगन' की उपाधि दी थी।
  •   जहांगीर के काल में विलियम हॉकिंस, विलियम फिच, सर टॉमस रो, एडवर्ड रो तथा एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री भारत आए। जहांगीर ने ही सर्वप्रथम अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने कीअनुमति प्रदान की।
  •   जहांगीर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहांगीरी फारसी भाषा में लिखी।
  •   शाहजहां के विद्रोह को समाप्त करने का श्रेय पाने वाले सेनापति महाबत खां ने शासन में नूरजहां के बढ़ते प्रभाव पर हस्तक्षेप के कारण 1626 ई० में विद्रोह कर दिया।
  •  
  •   7 नवंबर 1627 ई० को भीमवार नामक स्थान पर जहांगीर की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर स्थित शाहदरा नामक बाग में दफनाया गया।

    शाहजहां 1627-1658 ई०


    शाहजहां का जन्म 5 जनवरी 15 से 92 ईसवी में लाहौर में हुआ। उसका मूल नाम खुर्रम था। जहांगीर की मृत्यु के बाद 24 फरवरी 1628 को वह 'अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी' की उपाधि लेकर गद्दी पर बैठा।
  •   शाहजहां का विवाह आसिफ खां की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से 1612 में हुआ। उसने अर्जुनमंद बानो बेगम को मुमताज महल तथा मल्लिका-ए-जमानी की उपाधि प्रदान की।
  •   शहजादा के रूप में शाहजहाँ ने 1614 ई० में मेवाड़ तथा 1616 ई० में दक्षिण का सफल अभियान किया।
  •    1631 में शाहजहां ने दक्कन के अभियान का नेतृत्व महाबत ख़ां को सौंप दिया। महाबत खां ने 1633 ई० में अहमदनगर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
  •   1636 ई० में गोलकुंडा के शासक अब्दुल्ला कुतुबशाह ने मुगलों से संधि कर ली। उसने पहले चार खलीफाओं के अतिरिक्त शाहजहां का नाम का खुतवा और गोलकुंडा के सिक्कों पर सम्मिलित किया।
  •   1636 से 1644 ईसवी तक औरंगजेब  पहली बार दक्षिण का सूबेदार रहा और औरंगाबाद को मुगलों की दक्षिण के सूबे की राजधानी बनाया।
  •   1636 ई० में बीजापुर ने भी मुगल आधिपत्य स्वीकार कर लिया। वहां के शासक मुहम्मद आदिलशाह ने 20 लाख रुपया प्रति वर्ष मुगलों को देना स्वीकार किया।
  •   वीर सिंह बुंदेला के पुत्र जुझार सिंह बुंदेला ने 1628 ई० में शाहजहां के विरुद्ध विद्रोह किया जिसे दबा दिया गया।
  •   1628-31 के मध्य शाहजहां ने दक्षिण के सूबेदार खाने जहां लोधी के विद्रोह को दबाया।
  •   1632 ई० में पुर्तगालियों के विरूद्ध अभियान किया गया। जिसमें पुर्तगाली पराजित हुए और शाहजहाँ ने हुगली पर अधिकार कर लिया।
  •   शाहजहां के समय में सिक्खों के छठे गुरु हरगोविंद से मुगलों का संघर्ष रहा। गुरु ने नवीन सिख संप्रदाय की रक्षा के लिए पंजाब छोड़ दिया और कश्मीर की पहाड़ियों में कीरतपुर नामक स्थान पर रहना शुरू कर दिया। वहीं 1645 में उनकी मृत्यु हो गयी।
  •   सिंहासन के लिए शाहजहां के पुत्रों में जो युद्ध हुआ उसे मुगल इतिहास में उत्तराधिकार के युद्ध के नाम से अभिहित  किया जाता है।  उत्तराधिकार का यह युद्ध शाहजहां के जीवित रहते हुए लड़ा गया। 
  •  शाहजहां की बेगम मुमताज महल से उत्पन्न कुल 14 संतानों में से जीवित सात  पुत्र-पुत्रियों ने इस उत्तराधिकार युद्ध में भाग लिया। इनके नाम थे-- जहांनारा, दारा शिकोह, शाह शुजा, रोशनारा, औरंगजेब और मुरादबख्स  और गोहन आरा।  
  •  बहनों में जहानारा, दाराशिकोह  के पक्ष में, रोशन आरा  औरंगजेब के पक्ष में, और रोहन आरा ने मुरादबख्श का पक्ष लिया।  
  •  उत्तराधिकार के युद्धों की श्रंखला में चार महत्वपूर्ण युद्ध लड़े गए।  ये इस प्रकार हैं---
  •   बहादुरपुर का युद्ध- यह युद्ध शाहजहां और दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह  तथा आमेर के राजा जयसिंह के बीच 24 फरवरी 1658 को बहादुरपुर में लड़ा गया।  इसमें शुजा की पराजय हुई।  
  •  धरमट का युद्ध-- उत्तराधिकार का यह दूसरा युद्ध औरंगजेब और मुरादबख्श  तथा दाराशिकोह की सेना के बीच 25 अप्रैल, 1658 ईस्वी को उज्जैन के निकट धरमट  में हुआ।  इसमें दारा की पराजय हुई।  इस विजय की स्मृति में औरंगजेब ने फतेहाबाद नामक नगर की स्थापना की। 
  •   सामूगढ़ का युद्ध--  यह युद्ध भी औरंगजेब और दाराशिकोह  के बीच 8 जून 1658 को सामूगढ़ में हुआ।  इसमें भी दाराशिकोह को पराजय मिली। 
  •   देवराई का युद्ध-- उत्तराधिकार का अंतिम युद्ध 12 से 14 अप्रैल 1559 को देवराई की घाटी में लड़ा गया।  इस युद्ध में पराजित होने के बाद दाराशिकोह को इस्लाम धर्म की अवहेलना करने के आरोप में 30 अगस्त 1659 ईस्वी को कत्ल कर दिया गया।  
  •  औरंगजेब ने सितंबर 1658 ईस्वी में शाहजहां को आगरा के किले में कैद कर दिया।  कैदी  जीवन के आठवें वर्ष अर्थात  31 जनवरी 1666 ईसवी को 74 वर्ष की अवस्था में शाहजहां की मृत्यु हो गई।

    औरंगजेब 1658 1707


  • 3 नवंबर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद नामक स्थान पर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म हुआ था। 
  •  उसका पहला राज्याभिषेक दिल्ली में 31 जुलाई 1658 ईस्वी को तथा दूसरा राज्याभिषेक भी दिल्ली में ही 15 जून 1659 को हुआ। वह 'अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी' की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा।
  •  सिंहासन पर बैठते औरंगजेब ने लगभग 80 करों को समाप्त कर दिया, जिनमें 'राहदारी' (परिवहन कर), पानडारी (चुंगी कर) आदि प्रमुख थे, जिन्हें आबवाव पुकारा जाता था।
  •   औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज का त्यौहार, तुलादान और झरोखा दर्शन आदि परंपराएं बंद करवा दीं। धार्मिक नियम माने जाएं इसके लिए औरंगजेब ने बड़े बड़े नगरों में मुहतसिबों ( धर्म निरीक्षकों) की नियुक्ति की।
  •   उसके समय में बनारस का विश्वनाथ, मंदिर मथुरा का केशव देव मंदिर तथा पाटन का सोमनाथ मंदिर तोड़ा गया।
  •   वर्ष 1679 ई० में औरंगजेब ने सभी गैर मुसलमानों पर जजिया (धार्मिक कर) लगा दिया। हिंदुओं पर तीर्थयात्रा कर भी लगाया गया।
  •  औरंगजेब की धार्मिक नीति के प्रति पहला संगठित विद्रोह 1669 में जाटों ने गोकुल के नेतृत्व में किया। तिलपत के युद्ध में गोकुल पकड़ा गया उसे मार दिया गया। 1686 ई० में जाटों ने राजाराम के नेतृत्व में विद्रोह किया। राजाराम ने सिकंदराबाद स्थित अकबर के मकबरे को हानि पहुंचायी और अकबर की कब्र खोदकर उसकी हड्डियों को जला डाला।
  •   1672 में नारनौल और मेवात के सतनामी साधुओं ने औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह किया।
  •   अपने राज्यकाल के प्रथम चरण में औरंगजेब में 1661 ई० में मीर जुमला के सेनापतित्व में असम पर आक्रमण किया। कूच बिहार, कामरूप, और रंगपुर को  मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। 
  •  सिक्खों के नवें गुरु तेगबहादुर ने औरंगजेब की धार्मिक नीति का खुले तौर पर विरोध किया। फलतः औरंगजेब ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।
  •   1667 ईस्वी में युसुफजाईयों ने  भागू.के नेतृत्व में विद्रोह किया। इसे रोशनाई नामक धार्मिक आंदोलन से  बौद्धिक और नैतिक सहायता प्राप्त हो रही थी।
  •   औरंगजेब के दक्षिण अभियानों को चार चरणों में बांटा जाता है :
  •   प्रथम चरण (राज्यरोहण से 1668 ईस्वी तक)-- इस दौरान औरंगजेब का प्रमुख लक्ष्य आमदनगर राज्य के उन क्षेत्रों को प्राप्त करना था, जो 1636 ईसवी की संधि द्वारा बीजापुर को मिल गए थे।
  •   द्वितीय चरण (1668 ई० से 1687 ई० तक)--- इस काल में मराठों के खिलाफ बीजापुर और गोलकुंडा को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास किया गया।
  •   तृतीय चरण (1684 ई० से 1687 ई० तक)-- इस चरण में औरंगजेब 1686 ई० में बीजापुर और 1687 ई० में गोलकुण्डा को मुगल साम्राज्य साम्राज्य में मिला लिया गया।
  •   अंतिम चरण (1687 से 1707 ई० तक)-- औरंगजेब के दक्षिण अभियान का यह चौथा चरण मराठों के संघर्ष पर केंद्रित रहा। 
  •  औरंगजेब एक अच्छा वीणा वादक था फिर भी उसने संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया। यह भी महत्वपूर्ण है कि  संगीत पर सबसे ज्यादा पुस्तकें उसी के काल में लिखी गई ।
  •  1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

    मराठा अभ्युदय एवं शिवाजी


    17 वीं शताब्दी में मराठों का दक्षिण की राजनीति में स्थान निम्नलिखित कारकों का परिणाम माना जाता है:---
  •  मराठवाड़ा क्षेत्र की विषम और अनुर्वर भौगोलिक परिस्थितियों ने लोगों को मेहनती, कठोर और जुझारू बना दिया।
  •   आजीविका हेतु पड़ोस के उर्वर क्षेत्रों में लूटमार की प्रवृत्ति ने मराठों में सैनिक प्रतिभा का विकास कर दिया। वे छापामार युद्ध कला में निपुण हो गए।  मराठों के उदय के लिए बौद्धिक व वैचारिक प्रेरणा भक्ति आंदोलन से प्राप्त हुआ। 12वीं-13वीं सदी से 17वीं सदी के बीच ज्ञानदेव, तुकाराम, एकनाथ, रामदास आदि संतों का उदय हुआ। उन्होंने मराठों के बीच एकता का संदेश प्रचारित किया।   17वीं शताब्दी के मध्य तक दक्षिणी रियासतों के पतन से मराठों का उत्कर्ष संभव हुआ और कालांतर में उनका विस्तार मुगल साम्राज्य की कमजोरियों के कारण हुआ।
  •   अहमदनगर रोड बीजापुर के शासकों ने मराठा सरदारों को शासन में स्थान दिया जिससे मराठों को सैनिक एवं प्रशासन का वास्तविक अनुभव प्राप्त हुआ। 
  •  बीजापुर के शासक इब्राहिम आदित्य ने मराठों को 'बरगीर' के रूप में नियुक्त किया और उन्हें अहमदनगर और निजामशाही शासकों के विरुद्ध उपयोग किया।
  •   मराठा के उत्थान में सर्वाधिक योगदान शिवाजी का है। उनके पिता शहाजी भोंसले ने सर्वप्रथम अहमदनगर के प्रधानमंत्री मलिक अंबर के अधीन काम किया तथा बाद में बीजापुर की सेवा में आ गए।
  • शिवाजी 1627-1680 
  •   शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल 1627 ईस्वी को पूना के निकट शिवनेर के दुर्ग में हुआ। शिवाजी के व्यक्तित्व सर्वाधिक प्रभाव उनकी माता जीजाबाई का पड़ा। उसके बाद गुरु एवं संरक्षक दादाजी कोंणदेव का शिवाजी के व्यक्ति को उभारने में महत्वपूर्ण योगदान है। आध्यात्मिक क्षेत्र में वे गुरु रामदास से प्रभावित थे।
  •   1643 ईस्वी में शिवाजी ने बीजापुर से सिंहगढ़ के किले को जीता तथा 1656 ईस्वी में चंद्रराव मोरे नामक मराठा सरदार से जावली छीन लिया।
  •   1657 ईस्वी में बीजापुर राज्य ने शिवाजी का दमन करने के लिए अफजल खां को नियुक्त किया लेकिन शिवाजी ने उसे मार डाला।
  •   15 अप्रैल 1665 ई० को शिवाजी ने पूना पर आक्रमण किया और मुगल सुविधा शाइस्ता खां को पराजित किया।
  •   10 फरवरी 1664 ई० को शिवाजी सूरत पर आक्रमण किया। वहां का मुगल किलेदार इनायत खां भाग खड़ा हुआ।
  •   1665 ई० में औरंगजेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। जयसिंह ने जून 1665 ई० में पुरंदर नामक स्थान पर शिवाजी को पराजित पराजित किया और पुरंदर की संधि की।  
  •  पुरंदर की संधि के अनुसार शिवाजी को अपने 35 किलों में से 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े और मुगल सम्राट की सेवा में अपने पुत्र शभाजी को भेजना स्वीकार किया।
  •   1666 ई० में शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए। औरंगजेब ने उन्हें बंदी बना लिया और राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह की देखभाल में जयपुर भवन में नजरबंद कर दिया।
  •  16 जून 1674 शिवाजी ने रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करवाया। इस अवसर पर उन्होंने 'छत्रपति' को उपाधि के साथ-साथ हैंदव धर्मोंधारक  एवं गौ- ब्राह्मण प्रतिपालक की पदवी धारण की।
  •   राज्याभिषेक के उपरांत शिवाजी का अंतिम महत्वपूर्ण अभियान 1677 ई० में कर्नाटक अभियान था। जिंजी को उन्होंने इस भाग की राजधानी बनाया।
  •   12 अप्रैल 1680 को शिवाजी की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद शंभाजी गद्दी पर बैठा।
  •   शंभाजी ने 1681 ईसवी में औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर II  को शरण दी, परिणामस्वरूप 1689 ई० में मुगलों से हुए संगमेश्वर के युद्ध में संभाजी की हत्या कर दी गई।
  •   औरंगजेब ने शंभाजी की विधवा येसुबाई और उसके पुत्र साहू को कैद कर लिया। शाहू का पालन पोषण औरंगजेब के पुत्री जीनत-उल-निशा ने किया।
  •   1689 से 1707 ईस्वी तक चलने वाले मराठा- मुगल युद्ध को 'मराठा स्वतंत्र संग्राम' के नाम से जाना जाता है।  इसका नेतृत्व राजाराम (1720 ई० तक) और ताराबाई ने किया।
  •   औरंगजेब के पुत्र आजमशाह ने 1707 में जुल्फिकार खां की सलाह पर शाहू को कैद से छोड़ दिया ताकि वह महाराष्ट्र जा सके और वहां मराठों में फूट पड़ जाए। 
नवंबर 1707 में 'खेद' नामक स्थान (भीमानदी) पर हुए युद्ध में ताराबाई पराजित हुई। 12 जनवरी 1708 ई० को शाहू ने सतारा में अपना राज्याभिषेक करवाया।

  1731 इसी में हुई वरना संधि द्वारा संभाजी दोस्त को कोल्हापुर की गद्दी का उत्तराधिकारी मान लिया गया कोल्हापुर दक्षिण मराठा संघ के लाता था। 

 

 

No comments