रेडक्लिफ सीमा आयोग तथा पंजाब में नरसंहार(  Redcliff's Boundary Award And The Punjab Carnage 


 

 

  According to the plan of partition, the Hindu and Muslim members of the Punjab and Bengal legislatures met separately and decided to merge the provinces of Punjab and Bengal into India and Pakistan, that is, East Punjab and West Bengal to join India. and West Punjab decided to join West Pakistan and East Bengal into East Pakistan. As a result, Punjab was to be divided into Bengal provinces.

भारत पाकिस्तान के मध्य सीमा रेखा का निर्धारण

     इन सीमाओं का निर्धारण करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने न्यायमूर्ति 'रेडक्लिफ' की अध्यक्षता में एक सीमा आयोग नियुक्त किया जिसका काम हिंदू तथा मुस्लिम बहुसंख्या वाले परंतु संलग्न प्रदेशों अथवा ग्रामों का मानचित्रों पर निर्धारण करना था। परंतु केवल जनसंख्या को ही ध्यान में नहीं रखना था, अन्य तत्व जैसे संचार साधन, नदियों तथा पहाड़ों आदि को भी ध्यान में रखना था। दुर्भाग्य से आयोग को कई सीमा बंधनों में कार्य करना था। पहला था समय की कमी। अर्थात न्यायमूर्ति रेडक्लिफ को केवल 6 सप्ताह मिले अर्थात 15 अगस्त तक ही निर्णय लिया जाए, अधिक से अधिक दो अथवा तीन दिन अधिक में यह कार्य होना था। दूसरे उन्हें यह कार्य प्रांतीय सरकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों तथा मानचित्रों के आधार पर यह निर्णय देना था। मानचित्र कई बार स्थानीय नौकरशाही के कौशल से सर्वथा अशुद्ध थे, विशेषकर इसलिए कि पंजाब तथा बंगाल दोनों प्रांतों में मुसलमानों की संख्या अधिक थी तथा 1900 के उपरांत इन दोनों प्रांतों में मुसलमान अधिकारी अधिक थे और उन्होंने आंकड़े मनमाने ढंग से प्रस्तुत किए।  

     रेडक्लिफ की अनभिज्ञता-- 

    कई ग्राम 'बेचिराग'अर्थात यहां कोई नहीं बसता यह कहकर पाकिस्तान में सम्मिलित कर दिए जबकि वास्तव में वहाँ हिंदू बहुसंख्या में थे। अधिकारी वर्ग को उस समय तक पूर्ण रूप से सांप्रदायिक रंग में रंगा जा चुका था, इससे यह आशा ठीक नहीं थी कि वे न्याय करेंगे अथवा होने देंगे। न्यायमूर्ति रेडक्लिफ को भी भारत के विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं थी। समय था केवल 6 सप्ताह। आयोग ने महत्वपूर्ण स्थान निर्धारित किए और फिर सीमा निर्धारण के लिए इन स्थानों को जोड़ने के लिए रेखा खींच दी। जब यह रेखा वास्तविक रूप से ग्राम से ग्राम तक खींची गई तो देखा कि यह रेखा कई बार छोटे-छोटे ग्रामों के बीच से गुजरती थी अथवा रेल तथा स्थल मार्गों के बीच से गुजरती थी और कई बार तो यह घरों के बीच से गुजरती थी।

  नहरों का स्रोत एक राज्य में तथा नहर दूसरे राज्य में, ग्राम एक ओर तथा चारागाह दूसरी ओर, मार्ग तथा संचार साधन पूर्णतया अस्त-व्यस्त और जनता के लिए अनेकों अदृश्य समस्याएं विद्यमान थी" लेखक को स्मरण है कि पाकिस्तान बनने के उपरांत लगभग दो-तीन माह तक डलहौजी नगर से अमृतसर नगर ( यह दोनों नगर भारतीय पंजाब में थे) से टेलिफोन पर बात करने के लिए लाइन पहले डलहौजी से लाहौर (पाकिस्तान में) लेनी पड़ती थी और फिर लाहौर से अमृतसर लेनी पड़ती थी। क्योंकि डलहौजी नगर से अमृतसर सीधी लाइन नहीं थी।

 भारत का बंटवारा और संप्रदायिक दंगे----

  15 अगस्त 1947 के उपरांत सीमा के दोनों और हिंसा भड़क उठी यह कहना कठिन है कि पहल किसने की। संभवत: यह सब कलकत्ते में हुई अगस्त 1946 की सीधी कार्यवाही का परिणाम था। सिक्ख मुसलमानों को दोषी ठहराते थे और मुसलमान सिक्खों तथा हिंदुओं को। शीघ्र ही समर्थ पंजाब जलने लगा। लाहौर में  मुसलमान अफसरों ने नगर में कर्फ्यू लगा कर हिंदू बाजारों को आग लगा दी। (जून 1947 ) हिंदू सिक्ख तथा मुसलमानों के हथियारबंद दस्ते चारों ओर घूम रहे थे तथा एक दूसरे की निहत्थी जनता पर अत्याचार कर रहे थे जिनका वर्णन असंभव है। जिलाधिकारी बेबस थे क्योंकि सीमा सुरक्षा दल अपने सहधर्मियों पर गोली चलाने से मना ही कर देते थे।

   जनसंख्या की अदला बदली-----   

    अगस्त माह के नरसंहार विभित्सता तथा अत्याचारों ने दोनों देशों की सरकारों को यह स्वीकार करने पर बाध्य कर दिया कि पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पंजाब में हिंदू और मुसलमानों का एक साथ रहना असंभव है। और दोनों ने जनता की अदला-बदली मान ली। नगरों से तो लोग रेलगाड़ी में बैठकर सीमा पार कर सकते थे किंतु ग्रामीण क्षेत्रों से तो निकलना लगभग असंभव था। अतएव यह लोग बड़े-बड़े समूह बनाकर भारतीय सेना की सहायता से भारत आए। यह संसार के इतिहास में वह अध्याय जो न देखा गया और न सुना गया था अर्थात संपूर्ण अल्पसंख्यकों का देशांतरण।

  भारत सरकार के एक रपट में शरणार्थियों के देश छोड़ने का विवरण इस प्रकार दिया गया है----

"भारत-पाकिस्तान सीमा के पास के नगरों तथा ग्रामों के गैर- मुसलमान, भारत में बड़ी संख्या में 1947 के अगस्त माह के अंत और सितंबर के आरंभ से ही कुछ छोटे-छोटे असंगठित दलों में आने आरंभ हो गए थे। पीछे जब पाकिस्तानी सेना ने (मुस्लिम) दलों की सहायता आरंभ कर दी तो यह लोग बड़े- बड़े समूहों में (30,000 से 40,000 तक) लायलपुर तथा मिण्टगुमरी के उपजाऊ क्षेत्रों से 150 मील की पैदल यात्रा पर चल पड़े। 18 सितंबर से 29 अक्टूबर तक, 42 दिनों में 24 गैर मुस्लिम समूह जिनकी कुल मानव संख्या 8,49,000 थी, भारत आए। इन काफिलों में सैकड़ों बैलगाड़ीयाँ और पशु की साथ थे।

शरणार्थियों के भारत आगमन से उत्पन्न समस्याएं----

      इन चलते हुए समूहों ने भारतीय सरकार के लिए अनगिनत दुरूह तथा जटिल समस्याएं पैदा कर दी। जब अन्न की कमी हो गई तो भारत सरकार को वायु सेना के द्वारा अन्न तथा चीनी भेजनी पड़ी। वायुयानों ने अमृतसर तथा दिल्ली से जड़ांवाला, लायलपुर, चूड़खाना, ढाबा सिंह वाला, बल्लोंकी नहरस्रोत (Headworks) तथा भाई फेरू की उड़ानें भरीं। दवाइयां, टीके तथा डाक्टरों तथा वायुयानों द्वारा भेजे गए। एक फील्ड एंबुलेंस यूनिट गए विंड को भेजा गया ताकि शरणार्थियों को भारत में आने से पूर्व टीके ( inoculate) लगाए जा सकें। मार्ग में इन समूहों पर प्रायः आक्रमण होते रहते थे और कई बार अत्याधिक जान की हानि होती थी। बच्चों तथा स्त्रियों का अपहरण हो जाता था तथा पाकिस्तानी सरकारी अफसर तथा सेना इन लोगों की अनाधिकृत तलाशियां भी ले लेते थे और जो थोड़ा बहुत धन होता था वह भी छीन लेते थे। इन्हें केवल मनुष्य का ही नहीं प्रकृति का भी प्रकोप सहना पड़ा। खुले आकाश के नीचे रहना महावृष्टि ( 21-25 सितंबर ) इत्यादि ने अपना अपना पथ- कर लिया। लोग सैकड़ों की संख्या में मर गए परंतु कारवां चलता रहा।"

      जब समूह चल रहे होते थे तो किसी के पास शवों को भी ठिकाने लगाने का समय नहीं होता था, रोने धोने की तो बात ही मत सोचो।

रेलवे की भूमिका----  

    रेलवे ने इन शरणार्थियों को इधर से उधर ले जाने का एक बहुत ही सराहनीय कार्य किया। एक अनुमान के मुताबिक 23 लाख शरणार्थी इधर से उधर ले जाए गए। 1947 के नवंबर माह के अंत तक शरणार्थियों की आवाजाही लगभग समाप्त हो गई थी। और एक अनुमान के अनुसार 80 लाख लोग सीमा पार कर भारत आए।

     सहस्र लड़कियां बलपूर्वक दोनों क्षेत्रों में रख ली गई थीं। कई युवतियों ने कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी थी। इन अपहृत लड़कियों को वापस लाकर उनके अभिभावकों को सौंपने का कार्य भारतीय तथा पाकिस्तानी पुलिस और सैनिक दल शांति स्थापित होने के2-3 वर्ष उपरांत भी करते रहे। 

     परंतु इस अथाह मानव को खाना खिलाना, कपड़े देना, पुनः स्थापन करना और ग्रामीण श्रमिकों, भूमिहीन कामगारों तथा नगरवासियों को काम धंधे में लगाना एक ऐसी समस्या थी जो कही-सुनी नहीं जा सकती थी। पाकिस्तान से आने वाले हिंदू और सिक्ख प्रायः छोटे व्यापारी थे और यहां से जाने वाले प्रायः श्रमिक और हस्तशिल्पी थे। दोनों वर्गों को नए देश में काम मिलना काफी कठिन था क्योंकि यहां तो पहले ही से उनके वर्ग के लोग काम कर रहे थे। लाखों लोग दिल्ली आए तथा भारत के अन्य भागों में बस गए।

    इन  शरणार्थियों ने जहां-जहां वे गए विशेषकर दिल्ली, हरियाणा तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और जातीय तत्वों को एक नई दिशा दी।  केंद्रीय सरकार ने एक नया विभाग पुनर्वास ( रिहैबिलिटेशन ) का गठन किया और  शरणार्थियों अथवा पाकिस्तान से  उजड़ कर आए लोगों की सहायता तथा उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए काम किया मुसलमान जो संपत्ति और भूमि छोड़ कर गए थे उसको इन में बांटा इस भीम का कार्य में बरसो लग गए तथा सरकार का करोड़ों का व्यय हुआ। 

 डा० सन्तोष कुमार सैन  

 



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