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आधुनिक भारत में किसान आंदोलन

 आधुनिक भारत में किसान आंदोलन

भारत में किसान आंदोलन का इतिहास ( औपनिवेशिक काल से वर्तमान काल तक )

आधुनिक भारत में किसान आंदोलन


       वर्तमान समय में भारत में चल रहे किसान आंदोलन ने समस्त विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इस किसान आंदोलन को विश्व की तमाम हस्तियों का समर्थन मिल रहा है। लगभग पिछले 3 महीनों से किसानों ने वर्तमान सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है। इस आंदोलन का कारण 3 नए कृषि बिल हैं। यद्यपि यह कोई पहली बार नहीं है जब किसानों ने सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा है इससे पूर्व भी मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसान आंदोलन चला जिसमें गोली चलने से कुछ किसानों की मृत्यु भी हुई। तेलंगाना के किसानों ने पैदल मार्च कर दिल्ली पहुंचते हुए अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया।

    लेकिन यह कोई प्रथम बार नहीं है जब भारत में किसानों ने आंदोलन की राह पकड़ी है। औपनिवेशिक काल से लेकर वर्तमान काल तक किसानों ने अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए आंदोलन किए हैं।

   जिस समय ट्रेड यूनियनों के अंतर्गत विभिन्न संगठनों में कटु संघर्ष जारी था और जब किसी न किसी बहाने मजदूर राष्ट्रीय आंदोलन की ओर खिंचे चले आ रहे थे भारतीय किसान उस समय भी काफी हद तक उपेक्षित और असंगठित हालत में गांव में ही अपने दुख के दिन काट रहे थे। एक अल्प विकसित और औद्योगीकरण की प्रक्रिया से गुजरते हुए देश के संदर्भ में यह स्वाभाविक ही है कि वहां किसानों के बजाय मजदूरों पर अधिक ध्यान दिया दिया जाए और इस कार्य में शासक और उनके विरोधी दोनों ही समान रूप से शामिल हों। इसका पहला कारण तो यह है कि ऐसे देश की अर्थव्यवस्था में उद्योग की बड़ी ही निर्णायक भूमिका होती है और इसलिए वहां औद्योगिक श्रम-शक्ति बहुत महत्वपूर्ण कारक होती है। औपनिवेशिक व्यवस्था में तो ऐसा और भी ज्यादा होता है। दूसरे अपने सामूहिक अस्तित्व की वजह से विविध संगठनों के प्रति, श्रम-शक्ति किसानों की अपेक्षा अधिक जिम्मेदार होती है क्योंकि अपनी सामाजिक स्थिति की वजह से किसानों का दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ और व्यक्तिवादी होता है। इसके बावजूद यह दलील उचित नहीं है कि किसानों को इसलिए संगठित नहीं किया जा सका कि मजदूरों को संगठित किया जा रहा था। बरहाल राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान किसानों की वास्तविक स्थिति यही थी और इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह स्थिति आज भी उसी तरह चली आ रही है। किसानों की समस्या आज भी हल नहीं हो पायी है।

 औपनिवेशिक काल में किसानों की स्थिति------

     भारतीय किसान बड़ी ही अस्त-व्यस्त समाज व्यवस्था में रह रहे थे। लगान पद्धति बड़ी कठोर और दमनात्मक थी। 1793 के 'स्थाई बंदोबस्त' नें किसानों को एकदम असहाय तथा कंगाल बना दिया। स्थाई बंदोबस्त मूलतः औपनिवेशिक शासन की एक चाल थी ताकि वे अधिक से अधिक राजस्व वसूल कर सकें और अपने हितों की रक्षा करने के लिए शासन तथा किसानों के बीच एक देशी अभिजात वर्ग (अरिष्टोक्रेटस -Aristocrats) की सृष्टि कर सकें। उनकी यह चाल निश्चय ही सफल भी हुई। जमींदारों के एक नवीन वर्ग का उदय हुआ जिसे किसानों से लगान वसूल करने का असीम अधिकार प्राप्त था। किंतु यह जमीदारी पद्धति पूरे भारत में लागू नहीं की गई। कुछ प्रांतों में 'रैयतवारी पद्धति' लागू की गई,  जबकि कुछ दूसरों में' महलवारी पद्धति'। किंतु यह सभी उस दमनात्मक लगान व्यवस्था के विभिन्न रूप थे जिसके तहत भारतीय किसान पिछले 50 वर्षों से रोने-झींकनेने के लिए विवश थे। जमीदारी प्रथा एक त्रिस्तरीय ( 3-Tier ) पद्धति थी जिसमें सरकार काश्तकार से लगान की वसूली जमीदारी के माध्यम से करती थी जबकि रैयतवारी प्रथा एक द्वि-स्तरीय (2-Tier) पद्धति थी जिसमें सरकार रैयत से सीधे लगान वसूल करती थी।। किंतु इन सभी प्रथाओं में शीघ्र ही मध्यस्थों की श्रेणियां विकसित हो गईं जो कि सर्वथा तर्कसंगत था। बढ़ते लगान की वजह से किसान उधार लेने के लिए बाध्य हुए और फलतः साहूकारों के एक नवीन वर्ग का उदय हुआ। कई बार किसान लगान  नहीं चुका पाते थे जिसके परिणामस्वरूप उन्हें बेदखल कर दिया जाता था। गरीब कृषक वर्ग के संदर्भ में बेदखली एक आम बात हो गई। और यदि किसानों को जमीदारों या सरकार द्वारा बेदखल नहीं किया जाता था तो, भी उनमें से अधिकांश शोषण के दबाव में अपनी जमीन बेचने के लिए विवश हो जाते थे। इस प्रवृत्ति ने एक ओर तो दूरवासी जमींदारी प्रथा ( Absentee Landlordism ) को जन्म दिया और दूसरी और बटाईदारी प्रथा को। किसानों तथा बटाईदारों के प्रति साहूकारों तथा दूरवासी जमीदारों का जो रुख था वह जमीदारों या विभिन्न प्रांतीय सरकारों के रुख की तुलना में अच्छा नहीं था। इनमें से प्रत्येक की अपने आप में एक स्वतंत्र सत्ता थी ( अपने अधीनस्थ किसानों या बटाईदारों  के संदर्भ में ) और इस हैसियत से हर जमींदार अपने-आप में शोषण का एक स्वतंत्र स्तूप था। इस प्रकार औपनिवेशिक कृषि-व्यवस्था के शोषण का स्वरूप उतना सीधा-सरल नहीं था। इस शोषण के अनेक आयाम थे। और भी खराब बात यह थी कि यह शोषण केवल अपने कानूनी स्वरूप तक ही सीमित नहीं था। जमींदार, ताल्लुकेदार और साहूकार अनेक प्रकार के अवैध उपकर वसूल करके काश्तकार वर्ग को तंग कर रहे थे। और ये उपकर अनेक तरह के थे, जैसे पथ-कर, मेला कर, पर्वी कर, जमीदार के परिवार में कोई विवाह होने पर कर, डाक खर्च ( जमींदार की डाक पर आने वाला खर्च ) , दाखिल खर्च ( लगान  की रसीद पर आने वाला खर्च ),  टोल खर्च ( जमीदार के दरबार में  बैठने की अनुमति देने की एवज में लिया जाने वाला कर ) और इसी प्रकार के अन्य अनेक उपकर। लगान या इन उपकरों के समय पर अदा न कर पाने की हालत में रैयत को ( जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं ) घोर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। उनके जीवन और संपत्ति को पूरी तरह जमींदारों और उनके दलालों के रहमोकरम परछोड़ दिया गया था।  

       किसान आंदोलन Farmer Protest

     अंग्रेजों ने राजस्व-प्रणाली में जो आमूल परिवर्तन किए उनके परिणामस्वरूप भू-स्वामी तथा महाजन वर्गों में तेजी से वृद्धि हुई और ग्रामीण क्षेत्रों में वे काफी शक्तिशाली हो गए। इसके अतिरिक्त जहां अंग्रेज बागान मालिकों ने चाय, रबर, कॉफी तथा नील के बाग लगाए थे वहां भारी संख्या में किसानों को जबरदस्ती अपनी जमीन से बेदखल कर दिया गया ( या फिर उन्हें मामूली कीमत पर अपनी जमीन बेच देनी पड़ी )। इन क्षेत्रों में किसान या तो दिहाड़ी पर काम करने वाले बन कर रह गए या फिर ठेके पर काम करने वाले श्रमिक जिनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों जैसी थी। किसानों ने इस दमन को चुपचाप नहीं सह लिया और कई स्थानों पर उन्होंने छुट-पुट विद्रोह किए जिन्हें निर्दयता पूर्वक कुचल दिया गया। उनकी एक भीषण प्रतिक्रिया 1857 के महान विद्रोह के समय देखने में आई जब लाखों किसानों ने देशी राज्यों का साथ दिया। जब अंग्रेज विजयी हो गए तो उन्होंने बगावत में भाग लेने वाले लोगों की जमीन जब्त कर लेने का निश्चय किया और उस जमीन को पुरस्कार स्वरूप उन वफ़ादार लोगों को दे दिया जिन्होंने उनका साथ दिया था। उदाहरण के तौर पर अवध के गवर्नर ने घोषणा की कि "राज्य के अंतर्गत सांपत्तिक अधिकार ( Proprietary Right ) ब्रिटिश सरकार के हक में अधिग्रहण कर लिया गया है और अब वह इस अधिकार की जिस रूप में उचित समझे उस रूप में व्यवस्था कर सकती है।"

    1757  से लेकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) तक  और उसके बाद भी भारत के विभिन्न क्षेत्र में अनेक विद्रोह हुए इनमें से कुछ प्रमुख विद्रोह हैं (1) सन्यासी विद्रोह-1770 (2) चुआर तथा हो का विद्रोह (3) कोल विद्रोह (4) बंगाल के कृषक विद्रोह ( 5 ) मराठा किसान जागरण ( 6 ) मुंबई के किसान विद्रोह, ( 7 ) पंजाब का कूका आंदोलन, ( 8 ) दक्षिण भारत के किसान विद्रोह, ( 9)  चम्पारन तथा खेरा आन्दोलन ( 10 ) मोपला विद्रोह ( 11 ) अखिल भारतीय किसान सभा ( 12 ) बारदौली  आदि ।

(1)-- सन्यासी विद्रोह 1770---  

बंगाल में अंग्रेजी राज्य के स्थापित होने से तथा उसके कारण नई अर्थव्यवस्था के स्थापित होने से जमींदार कृषक तथा शिल्पी सभी नष्ट हो गए। 1770 में भीषण अकाल पड़ा। उसे तथा कंपनी के पदाधिकारियों की कठोरता को लोगों ने विदेशी राज्य की ही देन समझा। तीर्थ स्थानों पर आने-जाने पर लगे प्रतिबंधों से सन्यासी लोग बहुत क्षुब्ध हुए। सन्यासियों की अन्याय के विरुद्ध लड़ने की परंपरा थी और उन्होंने जनता से मिलकर कंपनी की कोठियों तथा कोषों पर आक्रमण किए। वे लोग कंपनी के सैनिकों के विरुद्ध बहुत वीरता से लड़े तथा वारेन हेस्टिंग्स एक लंबे अभियान के पश्चात ही इस विद्रोह को दबा पाया था। इसी सन्यासी विद्रोह का उल्लेख वंदे मातरम के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंदमठ में किया है।

(2)- 'चुआर' तथा 'हो' का विद्रोह 1768---  

अकाल तथा बढ़े हुए  भूमि कर तथा अन्य आर्थिक संकटों के कारण मिदनापुर जिले की आदिम जाति के चुआर लोगों ने हथियार उठा लिए। दलभूम, कैलापाल, ढोल्का तथा बाराभूम के राजाओं ने मिलकर 1768 में विद्रोह कर दिया तथा आत्म-विनाश ( scorched earth ) की नीति अपनाई। यह प्रदेश 18वीं शताब्दी के अंतिम दिनों तक उपद्रवग्रस्त रहा।

     इसी प्रकार छोटानागपुर तथा सिंहभूम जिले के 'हो' तथा मुण्डा लोगों को भी अपने हिसाब चुकाने थे। उन्होंने 1820-22 तक तथा पुनः 1831 में कंपनी की  सेना से टक्कर ली तथा यह प्रदेश भी 1837 तक उपद्रव ग्रस्त रहा।

 (3)- कोल विद्रोह 1831---

  छोटा नागपुर के कोलों ने अपना क्रोध उस समय प्रकट किया जब उनकी भूमि उनके मुखिया मुण्डों से छीन कर मुस्लिम कृषकों तथा सिक्खों  को दे दी गई। 1831 में कोलों ने लगभग 1000 विदेशी अथवा बाहर के लोगों को या तो जला दिया या उनकी हत्या कर दी। यह विद्रोह रांची, सिंहभूम, हजारीबाग, पालामऊ तथा मानभूम के पश्चिमी क्षेत्र में फैल गया। एक दीर्घकालीन तथा विस्तृत सैन्य अभियान के पश्चात ही यहां शांति स्थापित हो सके। 

(4)- भील विद्रोह-1812-19 -- 

 भीलों की आदिम जाति पश्चिमी तट के खानदेश जिले में रहती थी। 1812-19 तक इन लोगों ने अपने नए स्वामी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। कंपनी के अधिकारियों का कहना था कि इस विद्रोह को पेशवा बाजीराव द्वितीय तथा उसके प्रतिनिधि त्रिंबकजी दांगलिया ने प्रोत्साहित किया था। वास्तव में कृषि संबंधी कष्ट तथा नई सरकार से भय ही इस विद्रोह का कारण था। अंग्रेजी सेना के अनेक टुकड़िया इसको दबाने में लगी थीं। परंतु भयभीत होने के स्थान पर  भीलो की उत्तेजना और भी बढ़ गई, विशेषकर जब उन्हें अंग्रेजों की बर्मा में हुई असफलता का ज्ञान हुआ।  उन्होंने 1825 में सेवाराम के नेतृत्व में पुनः विद्रोह कर दिया। 1831 तथा 1846 में पुनः उपद्रव उठ खड़े हुए जिससे यह सिद्ध होता है कि यह आंदोलन भी लोकप्रिय था।           

5- संथाल विद्रोह 1855-56----  

संथाल शांतिप्रिय तथा विनम्र लोग थे जो आरंभ में मानभूम, बड़ाभूम, हजारीबाग, मिदनापुर, बांकुड़ा तथा बीरभूम प्रदेश में रहते थे। जो भूमि वे लोग शताब्दियों से जोत रहे थे, 1793 के स्थायी भूमि बंदोबस्त के द्वारा अब वह जमीदारों की हो गई थी। जमीदारों की अत्याधिक मांग के कारण इन शांतिप्रिय लोगों को अपनी पैतृक भूमि को छोड़कर राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास बसना पड़ा। कड़े परिश्रम से इन लोगों ने जंगलों को काट कर भूमि कृषि योग्य बनाई। शीघ्र ही जमीदारों ने भूमि के स्वामित्व का दावा कर दिया। बंगाल तथा उत्तर भारत के साहूकारों ने यहां ब्याज प्रथा आरंभ कर दी। जैसा कि एक लेखक ने 'कोलकाता रिव्यू' में लिखा था कि"संथालों ने देखा कि उनकी आज ,उनके पशु, वे स्वयं और उनका परिवार भी उस  ऋण के लिए साहूकारों के हाथों में चला जाता था। जो यह सब कुछ दे देने पर भी ऋण शेष रह जाता था।" सबसे घृणित बात यह थी कि संस्थानों ने देखा कि पुलिस, भूमि कर तथा न्याय प्रशासक भी इन्हीं साहूकारों का पक्ष लेते थे तथा उनसे बलपूर्वक धन प्राप्ति तथा बेदखली इत्यादि करते थे।  साहूकारों ने कर्ज की गैर-अदायगी के आधार पर उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर दिया था। स्वाभिमानी संथाल तत्कालीन अन्याय के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उठ खड़े हुए। यह न्याय उन पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद  स्वाभिमानी संथाल तत्कालीन अन्याय के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उठ खड़े हुए यह अन्याय उन पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा थोपा गया था। वे ( विशेष रूप से पटना जिले में ) छोटी-छोटी कार्रवाइयों जैसे----अवैध मुकदमा और बढ़ी हुई दर पर लगान देने के लिए जबरन किए गए ( एकतरफा ) समझौतों का विरोध करने के लिए दल बनाकर खड़े हो गए। कोई 35000 संस्थानों ने अपने परंपरागत हथियारों जैसे तीरकमान, कुल्हाडड़ियों और तलवारों से अपने आपको लैस कर लिया। उन्होंने कोलकाता की तरफ कूच करना आरंभ किया ताकि उन पर अत्याचार करने वाले लोगों से मुक्ति पाने के लिए अपनी याचिका गवर्नर के सामने रख सकें । किंतु रास्ते में एक  इंस्पेक्टर  ने उन्हें रोकने की कोशिश कीजिससे वे हिंसा पर उतारू हो गए यह घटना जुलाई 1855 की है  दो भाइयों  सिद्धू तथा कान्हू के नेतृत्व में  संस्थालों ने यह घोषणा कर दी कि वे देश को अपने अधिकार में ले लेंगे तथा अपनी सरकार स्थापित कर देंगे। उन्होंने भागलपुर तथा राजमहल के बीच तार तथा रेल व्यवस्था भंग कर दी। संस्थानों ने कंपनी के राज्य की समाप्ति तथा अपने सूबेदार के राज्य के आरंभ की घोषणा कर दी। सेना सतर्क कर दी गई और सैनिक कार्यवाही आरंभ हो गई। सेना का प्रतिरोध न कर सकने के कारण विद्रोहियों ने जंगलों में शरण ली तथा अपनी कार्यवाही जारी रखी। मेजर बर्रो (Mejor Borrough ) के अधीन एक अंग्रेजी सेना को अपमानजनक मात खानी पड़ी। परंतु फरवरी 1856 में नेता बंदी बना लिए गए तथा विद्रोह बहुत कठोरता से दबा दिया गया। परंतु सरकार को अलग संथाल परगना बनाने पड़े तथा उनके रोष को शांत करना पड़ा।

6 - नील विद्रोह 1860-- 

यह विद्रोह 1860 में आरंभ हुआ और 1917 तक चला जब चंपारण से महात्मा गांधी ने किसान संघर्ष का नेतृत्व किया। नील विद्रोह उन बागान मालिकों के प्रति विरोध प्रकट करने के लिए हुए थे जो किसानों को ऐसी शर्तों पर नील की खेती करने के लिए विवश करते थे जो उनके लिए लाभप्रद नहीं थी। बागान मालिक ढाई बीघा भूमि को एक बीघा गिनते और नील के दो गट्ठर पौधों को एक गट्ठर मानते थे। नादिया के जिला जज ए. स्कोन्स ( A.Skonce ) ने लिखा है "बागान मालिक किसानों की फसलों को मनमाने ढंग से नष्ट कर देते थे, उनके परिवार उजाड़ देते थे, घर जला देते थे और उनके बैल-बधिया ( मवेशी ) जबरदस्ती लूट कर ले जाते थे या उन्हें पानी में डुबो देते थे।" बागान मालिकों के इस पाशविक दमन के खिलाफ किसानों में विरोध की भावना जड़ पकड़ती जा रही थी। किंतु फिर भी उनके दमन-चक्र की गति तेज होती गई। नील बागानों के मालिकों की पाशविकता इतनी स्पष्ट थी कि उनका किसी भी आधार पर समर्थन नहीं किया जा सकता था। इसलिए किसान शहरी मध्य वर्ग से और कुछ मिशनरियों तक का व्यापक समर्थन जुटाने में सफल हुए। किन्तु राजा राममोहन राय और  द्वारकानाथ टैगोर जैसे महत्वपूर्ण सुधारकों ने बागान मालिकों को सदव्यवहार के प्रमाण पत्र दिए। जिससे "वह खाई साफ जाहिर होती है जो  उस समय आम जनता और इन तथाकथित सुधारकों के बीच मौजूद थी

        अप्रैल 1860 में  बारासात उपविभाग (Sub-Division ),  तथा पावना और नादिया जिलों के समस्त कृषकों ने भारतीय इतिहास की प्रथम कृषकों की हड़ताल कर दी। उन्होंने नील बोलने से मनाही कर दी। शीघ्र ही यह हड़ताल जैसोर, खुलना, राजशाही, ढाका, मालदा, दिनाजपुर तथा बंगाल के अन्य प्रदेशों में फैल गई। सरकार ने व्यापक गड़बड़ी से बचने के लिए सूचना जारी कर दी कि रैयत की भूमि की रक्षा की जाए, जिसमें वे मनचाही खेती करें तथा नील की खेती करवाने वाले इसमें कुछ हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे। चाहे तो नील उगाने वालों पर दीवानी मुकदमा चला सकते हैं।   इसी पर 1860 में एक नील आयोग (Indigo Commission ) नियुक्त कर दिया गया और इसके सुझाव 1862 के अधिनियम 4 में लिख दिए गए। बंगाल के नील उगाने वाले भूमिपतियों ने मात खाई तथा कालांतर में यह लोग बिहार तथा यू.पी. में चले गए।  

  (7) मराठा किसान जागरण 1875 ----  

    यह विद्रोह मुख्यतः मारवाड़ी तथा गुजराती साहूकारों के विरुद्ध किया गया। इसमें कुछ विपरीत परिस्थितियों के संचित प्रभाव के कारण, अत्यधिक भूमि कर, संसार की मंडियों में कपास के भावों का गिरना, इत्यादि से मराठा कृषक अधिकाधिक ऋण के नीचे दब गए। गुजराती और मारवाड़ी साहूकार अत्याधिक लालची थे वे अपने लेखों में हेरा-फेरी करते थे। अनपढ़ कृषक बिना पूरी जानकारी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते थे दीवानी न्यायालयों में फैसले प्राय: इन साहूकारों के पक्ष में हो जाते थे तथा कृषक प्रायः बेदखल हो जाते थे।

     विवाद उस समय शुरू हुआ जब सिरूर तालुका में दिसंबर 1874 में एक मारवाड़ी साहूकार कल्लूराम ने बाबा साहेब देशमुख के विरुद्ध ₹150 के ऋण के लिए बेदखली का आज्ञापत्र प्राप्त कर लिया। जब साहूकार के लोगों ने बाबा साहेब के मकान को गिरा दिया तो ग्रामवासियों को क्रोध आ गया। जून 1875 तक समस्त पूना जिले में आग लग गई। फिर कृषकों ने साहूकारों के मकानों तथा दुकानों पर आक्रमण कर दिए तथा उन्हें जला दिया, विशेषकर वे लेखपत्र जिन पर कृषकों ने हस्ताक्षर कर रखे थे। शीघ्र ही यह विद्रोह अहमदनगर जिले में भी फैल गया। पुलिस तथा सेना बुलानी पड़ी। जून 1875 के अंत तक 1000 से भी अधिक लोग बंदी बना लिए गए तथा विद्रोह को पूर्णतया दबा दिया गया। इस विद्रोह का आधार  इतना लोकप्रिय था कि सरकार को किसी भी विद्रोही के विरुद्ध साक्षी नहीं मिला। सरकार ने एक दक्कन उपद्रव आयोग ( Deccan Riots Commission ) नियुक्त किया, जिसे उपद्रव के कारणों का पता लगाना था। कृषकों की अवस्था सुधारने के लिए 1879 में कृषक राहत अधिनियम ( Agriculturist Relief Act ) पारित किया गया जिसमें दीवानी विधि संहिता ( Civil Procedure Code ) की धाराओं पर प्रतिबंध लगा दिया और कृषकों को ऋण न लौटाने पर गिरफ्तार अथवा जेल में बंद नहीं किया जा सकता था। 

(8)-- कूका आंदोलन --- 

पंजाब के किसान भी अपनी जमीनों पर साहूकारों का तेजी से कब्जा होते जाने की वजह से उत्तेजित थे। 19वीं सदी के सातवें दशक में खेतों के रेहन रखे जाने की संख्या चौंकाने की हद तक बढ़ गई। आरंभ में, सरकारी अधिकारियों के एक भाग ने, इंग्लैंड में अपने अनुभव के आधार पर व्यापारियों एवं साहूकारों के हाथों में जमीन के हस्तांतरण का प्रकट रूप से स्वागत किया क्योंकि उनके पास कृषि को बढ़ावा देने के लिए अपेक्षित उद्यम एवं पूंजी थी। किंतु कानून एवं व्यवस्था के गिरती हुई स्थिति, पश्चिमी पंजाब के गांव में अपराध एवं हिंसा में बढ़ोतरी, सिख काश्तकारों के कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रवासन और यह भय कि यदि हालत और ज्यादा बिगड़ी तो इससे सैनिक सेवा में भारतीय पर असर पड़ सकता है--- ये कुछ ऐसे कारण थे जिन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को फिर से सोचने के लिए विवश किया। इसके अतिरिक्त कृषि में धन निवेश करने की दृष्टि से भी साहूकारों को विशेष उपयोगी नहीं पाया क्योंकि उनमें से ज्यादातर साहूकार ऐसे थे जो केवल लगान और भारी ब्याज पर कर्ज देकर ही संतुष्ट थे। विशेष रूप से पश्चिमी क्षेत्र में एक अन्य परेशान करने वाला अभिलक्षण यह था कि जहां किसान-जमींदार और खेतिहर दोनों मुसलमान थे, वहां साहूकार प्रायः हिंदू बनिया था। इस प्रकार इस क्षेत्र में कर्जदार और साहूकार के बीच के संघर्ष ने सांप्रदायिक रंग ग्रहण कर लिया। मुल्तान डिवीजन के कमिश्नर  आर्थर ब्रानड्रेथ ( Arthur Brandreth ) पहले अधिकारी थे जिन्होंने "वंशानुगत भू-स्वामियों से हिंदू व्यापारिक जातियों को स्वेच्छा से भूमि हस्तांतरित किए जाने की राजनीतिक खतरे" को रेखांकित किया। 1876 में एस. एस. थॉरबर्न ने और भी ओजस्वी शब्दों में अपना तर्क प्रस्तुत किया अभी शब्दों में प्रस्तुत किया और यह दावा किया कि यदि स्थिति का समय पर इलाज नहीं किया गया तो इससे इस देश में ब्रिटिश साम्राज्य का स्थायित्व ही में खतरे में पड़ जाएगा। अधिकारी एवं न्यायाधीश बढ़ते हुए कर्ज एवं ग्रामीण असंतोष के बारे में बराबर इस प्रकार की अनिष्ट सूचक  रिपोर्ट भेजते रहे। इसके बाबा रामसिंह के नेतृत्व में कूका आंदोलन ने पंजाब में ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया था।

      इसमें संदेह नहीं कि किसान साहूकारों द्वारा लूटे जा रहे थे और उन्हें सरकारी संरक्षण की आवश्यकता उद्धिग्नता राजनीति से प्रेरित थी। पहली बात तो यह थी कि पंजाब शाही ब्रिटिश सेना ( रॉयल ब्रिटिश आर्मी ) का भर्ती-क्षेत्र था और पूरी ब्रिटिश सेना के 50% कर्मचारी इसी क्षेत्र से आते थे। दूसरे आर्य समाज के प्रभाव के तहत शिक्षित हिंदू ब्रिटिश राज पर आक्षेप करने में सबसे मुखर थे। किसानों के असंतोष ने वहां के व्यापारियों और साहूकारों के खिलाफ भेदभाव करने का चिरप्रतीक्षित आधार प्रदान कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि आर्य समाज की नींव ये व्यापारी और साहूकार ही थे। फलतः 1900 में 'भूमि अन्यसंक्रमण अधिनियम' ( Alienation of Land Act ) पारित किया गया और जून 1901 में यह लागू भी हो गया। इस अधिनियम के तहत पंजाब के लोगों को कृषक एवं गैर-कृषक जातियों में एवं वर्गों में बांटा गया और इसमें यह प्रावधान किया गया कि भूमि गैर-कृषक वर्गों को हस्तांतरित नहीं की जा सकती। इस अधिनियम से निश्चय ही किसानों को फायदा जमीदारों हुआ किंतु यह लाभ जमीदारों एवं बड़े किसानों के बीच बँट गए। 

(9) -मोपला कृषक आंदोलन  1921 ---- 

19 वी सदी के दौरान कृष्णा तथा गोदावरी डेल्टा में और साथी कर्नाटक और रायलसीमा में भी किसानों ने नई लगन व्यवस्था के खिलाफ कई बार विद्रोह किया उन्होंने अनाप-शनाप लगान वसूली साहूकारों के शोषण जिन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त था और सिंचाई साधनों की कमी के खिलाफ आवाज उठाई।  दक्षिण मालाबार ( केरल राज्य ) के मुसलमान पट्टेदारों ( कनामदार ) तथा खेतीहरों ( वेरूमपट्टदार ) को प्राय: मोपला कहते थे। आरंभ में यह लोग हिंदुओं की निम्न जाति तिय्या से थे और मुसलमान बन गए थे। इनमें कुछ तो उन अरबी मुसलमानों के वंशज भी थे, जो आठवीं तथा नौवीं शताब्दी में मालाबार तट पर बस गए थे। यह लोग प्राय: खेती करते थे, अथवा हिंदू जमीदारों के पट्टेदार या जेमी ( बंधुआ मजदूर ) थे। 19वीं शताब्दी में मोपलाओं कीकृषि संबंधित शिकायतें बढ़ गईं जिनमें अत्यधिक मालगुजारी, पट्टेदारी की असुरक्षा, नवीनीकरण के समय अत्यधिक धन की मांग, तथा समय-समय पर जमीदारों की वसूली सम्मिलित थीं। 1836 से 1854 के बीच दक्षिणी मालाबार में 22 झगड़े हुए। जिसमें विद्रोहियों ने कई पुलिस तथा सरकारी पदाधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था। 19वीं शताब्दी में भी सरकार ने इन विद्रोहों को प्रायः सांप्रदायिक दंगों की की ही संज्ञा दी थी और उन्हें कठोरता से दबा दिया था क्योंकि मुख्य रूप से जमीदार लोग हिंदुओं की ऊंची जातियों --- नम्बूदरी तथा नायर जातियों से थे और कृषक मुख्यतः हिंदुओं की छोटी जाति से धर्म परिवर्तित मुसलमान थे। इसलिए यह मोपला दंगे केवल वर्गों के झगड़े न रहकर धार्मिक रंग धारण कर लेते थे। कई मोपला लोग यह विश्वास करते थे कि इन उत्पीड़न करने वाले जमीदारों को जान से मार देना ही उचित है क्योंकि इन काफिरों को मार देने से तुम 'गाजी' बन जाते हो अथवा उनके साथ लड़ते हुए मरने से तुम 'शहीद' हो जाते हो। दोनों अवस्था में तुम्हें सीधा स्वर्ग मिलता है। इसलिए यदि इस अत्याचार के स्रोत को ही समाप्त कर दो तो वे अपने लिए इस.संसार में सुख तथा मरने के उपरांत सीधे स्वर्ग को प्राप्त करेंगे। यदि हम इस ढंग से देखें तो धर्म केवल मार काट को औचित्य को ही  प्रदान करता था न कि प्रयोजन अथवा कारण।

     1882-85 और पुनः 1896 में और भी विद्रोह हुए। ऐसे विद्रोह ने जेनमियों की संपत्ति पर आक्रमण और उनके मंदिरों को भ्रष्ट करने का स्वरूप धारण कर लिया। यह कार्य मोपलों के छोटे-छोटे दल करते थे जो बाद में पुलिस की गोलियों का सामना होने पर एक प्रकार से सामूहिक आत्महत्या कर लेते थे। 1836 और 1919 के बीच दर्ज किए गए कुल 28  विद्रोहों में विद्रोहियों की संख्या कम ही थी--- केवल 349। इसका कारण यह था कि दक्षिण मालाबार में संचार-साधन बहुत कम थे और घर बिखरे हुए थे। अतः सामूहिक विद्रोह होना कठिन था। इस प्रकार मोपला विद्रोह "ग्रामीण आतंकवाद का एक विशिष्ट प्रकार थे जो शायद उन मोपलों के हित में जेनमियों की बढ़ी हुई शक्ति को सीमित करने का सबसे प्रभावशाली साधन थे जो स्वयं इन विद्रोहों में भाग नहीं लेते थे।" 1919 तक मोपला आक्रमण के 82 शिकारों में 62 सर्वर्ण हिंदू ( 22 नम्बूदरी और 34 नायरथे ) जिन अन्य 70 लोगों के वर्ग के संबंध में जानकारी है उनमें 58 जेनमी और/ या साहूकार थे ( डेवी और हॉपकिंस द्वारा संपादित , दि इंपीरियल इंपैक्ट : स्टडीज इन दि   इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ अफ्रीका एंड इंडिया, लंदन 1978 में कोनराड वुड का लेख' पेजेंट रिवोल्ट : ऐन इंटरप्रेटेशन ऑफ मोपला वायलेंस इन द नाइनटींथ सेंचुरी एण्ड ट्वेंटीएथ सेंचुरीज )। अधिकांश मोपला शहीद गरीब किसान  अथवा भूमिहीन श्रमिक होते थे, किंतु समृद्ध कनामदारों और छोटे व्यापारियों की सहानुभूति प्रायः उनके साथ होती थी। ऐसी मान्यता की बात भी कही जाती है कि मोपलों की सहायता के लिए युद्ध सामग्री से लदा जहाज आ रहा है। यह मिथक प्रशांत महासागर में स्थित औपनिवेशिक शासनवाले मेलनेसिया के 'माल-पंथ' ( कार्गो-कल्ट ) से आश्चर्यजनक रूप से मिलता है जिसका अध्ययन मानवविज्ञानी पीटर वर्सले ने किया है। मोपला असंतोष की जड़ें स्पष्टत: कृषि व्यवस्था में थी---1862 और 1880 के बीच दक्षिण मालाबार के ताल्लुकों में लगान के मुकदमों में 244% और कुर्की में 441% की वृद्धि हुई थी.। इसमें हिंदू किसान भी पिसे थे, किंतु उनके प्रतिशोध का स्वरूप भिन्न था। 1860 और 1870 के दशकों में अनेक हिंदू डाकू गिरोहों के सक्रिय होने का उल्लेख मिलता है। इस्लाम जैसी स्वर्ण युग की विचारधारा के अभाव में हिंदू किसानों का असंतोष सामाजिक लूटपाट के स्तर से ऊपर नहीं उठ सका।

 (10)- दक्कन के दंगे----- 

अब तक हमने उन विद्रोह का विवेचन किया है जिनका लक्ष्य एक प्रकार से समग्र परिवर्तन था जिसमें धार्मिक एवं स्वर्ण युग के मिथक की प्रबल ध्वनियां भी थीं प( सामाजिक रूपांतरण के किसी आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के अभाव में ऐसा होना स्वाभाविक भी था ) और इनका मूल भारतीय समाज के निम्नतम प्राणियों अर्थात, आदिवासियों एवं गरीब किसानों में था। किंतु एक अन्य प्रकार के ग्रामीण विरोध की परंपरा भी थी। जिसके मूल में विशिष्ट शिकायतें थीं और जिसका लक्ष्य सीमित था। इस विरोध को नेतृत्व एवं समर्थन अपेक्षाकृत समृद्धि कृषक वर्ग से मिलता था। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र,  दक्कन में 1860 के दशक में कपास की गरमबाजारी के कारण धनी किसानों का जो विकास हुआ था, वह अगले ही दशक में मूल्यों के अचानक गिर जाने से रुक गया। साथ ही 1867 के बाद से भू-राजस्व में तीव्र वृद्धि हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में कृषकों को ऋण लेना पड़ा, और पवासी मारवाड़ी साहूकार जन आक्रोश का स्पष्ट लक्ष्य बने। मई-सितंबर 1875 में दक्षिण के साहूकार-विरोधी दंगों ने पूना और अहमदनगर जिले के छ: ताल्लुकों में 33 स्थानों को प्रभावित किया। क्रुद्ध ग्रामवासियों ने अपने मुखियों ( पटेलों ) के नेतृत्व में ऋणपत्रों को बलपूर्वक छीन लिया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहां कहीं साहूकार बाहर के लोग न होकर स्थानीय छोटे भू-स्वामी या धनी किसान होते थे ( जैसे कि रत्नागिरी के खोट में ) वहां ये दंगे नहीं हुए। इसके 4 वर्ष पश्चात 1879 के डेक्कन एग्रीकल्चरिस्ट्स मृतकों को न्यायिक प्रक्रियाओं एवं उपायों के माध्यम से कुछ संरक्षण प्रदान । 

 11--पबना किसान विद्रोह 1873 ----- 

 बंगाल में भी ( आदिवासी क्षेत्र को छोड़कर ) साहूकार विरोधी दंगे कम होते थे, क्योंकि वहां भी महाजन प्रायः स्थानीय धनी किसान या जोरदार होते थे जिनसे मिलने वाले कर्ज की उत्पादन में अपरिहार्य भूमिका होती थी। इसके विपरीत जमींदार की भूमिका उत्पादन में नहीं के बराबर थी और उसकी जमींदाराना ज्यादतियों के विरुद्ध पूर्वी बंगाल में रैयतों के बड़े भाग ने 1870 के दशक में और 1880 के दशक के आरंभिक वर्षों में व्यापक प्रतिरोध किया। इस तूफान का केंद्र था 'पबना' जो एक अपेक्षाकृत समृद्ध जनपद था, जिसके कारण वहां होने वाली दोहरी फसल और पटसन का फलता फूलता व्यापार था। यहां 50% से अधिक काश्तकारों ने 1859 एक्ट X द्वारा दखली अधिकार प्राप्त कर लिया था। ( यह कानून उन्हें बेदखली और लगन वृद्धि के विरुद्ध कुछ सीमा तक संरक्षण प्रदान करता था।) फिर भी, 1793 से 1872 तक के बीच जमींदारों के लगानों में 7 गुना वृद्धि हुई थी, और भू-स्वामियों ने अनेक प्रकार के अबवाब ( महसूल ) लगाकर, पैमाइश के लिए मनमाने तौर पर छोटे मापों का प्रयोग करके ( जिससे काश्त का क्षेत्र स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता था), और बल प्रयोग द्वारा 1860 के दशक में और 1870 के दशक के आरंभिक वर्षों में लगान को मनमाना बढ़ाने का अभियान आरंभ कर दिया था। इन सब बातों से रैयत को हाल में प्राप्त  पट्टे की सुरक्षा पर आघात होता था। 1873 में पबना के युसूफशाही परगना के किसानों ने एक  कृषक संघ बनाया जो मुकदमा लड़ने के लिए धनराशि जुटाता था और सभाएं करता था। इन सभाओं की सूचना ग्राम वासियों को सिंगी और ढोल बजाकर तथा रात में एक गांव से दूसरे गांव हांक लगाकर दी जाती थी। कभी-कभी ये संघ लगान की अदायगी रोक भी लेते थे। अगले दशक में पूर्वी बंगाल के अनेक जिलों ( ढाका, मैमनसिंह, त्रिपुरा बेकरगंज, फरीदपुर, बोगुरा और राजशाही ) में भी ऐसे ही आंदोलन के होने के समाचार मिले। कलकत्ता के जमींदार हलकों में किसान विद्रोह एवं हिंसा की घबराहटपूर्ण चर्चा के बावजूद कुछ बातों को छोड़कर रैयतों का विरोध  मुख्यतः  कानूनी और शांतिपूर्ण रहा।  इस आंदोलन के लक्ष्य भी पर्याप्त सीमित थे क्योंकि लगान की अदायगी रोकना भी विशिष्ट मांगों को पूरा करवाने का एक साधन ही था। यह मांगें थीं----- पैमाइश के माप में परिवर्तन, गैर-कानूनी अबवाबों की समाप्ति और लगान में कमी। न ही पबना आंदोलन सचेत रूप से ब्रिटिश विरोधी था  :  वस्तुतः रैयतों की सबसे बड़ी मांग यह थी कि वे  'महामहिम महारानी की और केवल उन्हीं की रैयत होना चाहते थे।  समीपस्थ अत्याचारी के विरूद्ध दूरस्थ स्वामी से की जाने वाली ऐसी अभ्यर्थनाएं किसान आंदोलनों के लिए नई नहीं थीं। वस्तुतः पवना की रैयत को तो किसानों का समर्थन करने की सरकारी नीति के अंतर्गत प्रोत्साहन भी दिया गया था। लेफ्टिनेंट-गवर्नर कैंपवेल की जुलाई 1873 की घोषणा में किसानों की मांगों को जायज ठहराया गया था हालांकि इसमें हिंसक घटनाओं की निंदा की गई थी।

      पबना संघ एवं अन्य जिलों में होने वाले ऐसे ही आंदोलनों ने बंगाली बुद्धिजीवी वर्ग में विभिन्न प्रकार की तीव्र प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। जमीदारों के वर्चस्व वाले 'ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन' ने इसका कड़ा विरोध किया और इसके मुख्य पत्र 'हिंदू पेट्रियट' ने पबना आंदोलन को हिंदू भू-स्वामियों के विरुद्ध मुसलमान किसानों के सांप्रदायिक आंदोलन के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया। वास्तव में पबना के अधिकांश काश्तकारों के मुसलमान और जमीदारों के हिंदू होने पर भी उस समय तक इन आंदोलनों में सांप्रदायिक तत्व का अभाव था। यह स्थिति उस स्थिति के ठीक विपरीत थी जो आगे जाकर बीसवीं सदी में उत्पन्न होने वाली थी। पबना आंदोलन के तीन नेताओं में दो सवर्ण हिंदू ( छोटे भू-स्वामी ईशानचंद्र राय और ग्राम प्रधान शंभुपाल ) और एक मुसलमान मूल्ला थे। प्रसंगवश इस आंदोलन से मुख्य रूप से प्रभावित होने वाले एक जमींदार ( द्विजेंद्रनाथ ठाकुर रविंद्र नाथ के बड़े भाई ) थे जिन्होंने जुलाई 1873 में सरकार से व्यवस्था और शांति बहाल करने के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की थी। व्यावसायिक समूहों ने जिनका जमीदारों से इतना संबंध नहीं था, इस स्थिति के प्रति अधिक सहानुभूति का दृष्टिकोण अपनाया  जैसा की आर.सी. दत्त की रचना पेजेंट्री ऑफ़ बंगाल ( 1874 ) और कुछ समय पश्चात 1885 के टेनेंसी एक्ट के ठीक पहले  काश्तकारों के अधिकारों के पक्ष में इंडियन एसोसिएशन द्वारा किए गए प्रचार से ( जिसमें है रैयतों की अनेक मीटिंगें भी की गईं ) प्रमाणित होता है। इस प्रकार कानून ने दखली अधिकारों को सुरक्षा प्रदान की और उनमें कुछ बढ़ोतरी भी की। इस सब में ध्यान देने योग्य बात यह कि पवना आंदोलन हो, बाद में इंडियन एसोसिएशन का आंदोलन हो, या सरकारी कानून हों किसी में भी दखली अधिकारों से वंचित किसानों, बंटाईदारों या खेत मजदूरों के लिए किसी भी प्रकार की चिंता नहीं पाई जाती थी।  वास्तव में दखली अधिकार वाले रैयत तो अपनी जमीनों को प्रायः कोर्फा रेयतों को भाड़े पर देने लगे जो पूर्णत: अरक्षित थ दखली अधिकार और वास्तव में खेत जोतने के बीच किसी प्रकार का संबंध स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया था। इस समस्त अवधि में बंगाल में होने वाले कृषि आंदोलनों एवं मुकदमेबाजी का परिणाम अंततः यही हुआ कि जो जोतदार समूहों की स्थिति और मजबूत हुई जो जमींदारों जितने भी शोषक और परजीवी सिद्ध हुए और जो क्रमशः उन्हीं जमीदारों का स्थान लेने वाले थे।

  12-लगान की नाअदायगी का आंदोलन

      अस्थायी बंदोबस्त वाले रैयतवाड़ी क्षेत्रों में लगान बढ़ाने के ब्रिटिश सरकार के प्रयासों ने भी ग्रामीण प्रतिरोध को भड़काया। उदाहरण के लिए असम के कामरूप एवं दरांग जिलों में 1893-94 में एक नया राजस्व बंदोबस्त जारी किया गया जिससे लगान की दर में 50 से 70% तक वृद्धि हो गई थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए रैज मेल या ग्रामवासियों की सभाएं आयोजित की गईं जिनका नेतृत्व किया ग्रामीण अभिजनों ( ब्राह्मणों, गोसाइयों और दोलाइयों )  ने इन सभाओं में तय किया गया कि लगान की अदायगी ना की जाए। मध्यमवर्गीय राष्ट्रीयता ने 1905 के बाद ही इस साधन का प्रयोग किया था। बाजार लूटने की कुछ घटनाएं भी हुई थीं और जनवरी 1894 में दो स्थानों पर ( रंगिया और पत्थरूघाट में ) पुलिस ने गोली चलाई। जोरहाट सार्वजनिक सभा ने लगान घटाए जाने की मांग का समर्थन किया और बंगाल के नामदलीय कांग्रेसी नेता रासबिहारी बोस ने इस मामले को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भी उठाया। अंततः कुछ रियायतें प्राप्त कर ली गईं। किंतु सामाजिक सोपान की दूसरी और जनमानस ने सारूखेतरी के कांसा ढालने वाले कारीगर पुष्पराम कांहर जैसे निम्नवर्गीय विद्रोहियों की स्मृति को जीवित रखा।

       1896-97 में महाराष्ट्र दक्कन में अकाल पीड़ित जनता ने खाद्यान्न की दुकानें लूट ली और फेमीन कोड के अंतर्गत मालगुजारी की माफी की मांग की जिसे सरकार नें ठुकरा दिया। पूना सार्वजनिक सभा ने जिसे हाल ही में तिलक ने अपने हाथ में ले लिया था अक्टूबर 1896 अप्रैल 1897 के बीच ग्रामीण क्षेत्र में कार्यकर्ता भेजे ताकि अकाल की स्थिति में रैयतों के कानूनी अधिकारों के प्रति लोगों में चेतना जगाएं। इस स्थिति से सरकार घबरा गई और कहने लगी कि राष्ट्रवादी आयरीश आंदोलनकारियों के तरीके अपना रहे हैं। वस्तुतः तिलक का आंदोलन मुख्यतः सभाएं करने और परचे बांटने तक ही सीमित था।

      बम्बई प्रेसिडेंसी के केंद्रीय संभाग ( पूना के आसपास, महाराष्ट् कार मुख्य क्षेत्र ) लगान की नाअदायगी के कारण चल संपत्ति को ज़ब्त किए जाने के मामले 1892-97 के औसतन 26 से बढ़कर 1897-98 में 194 और 1898-99 में 2269 हो गए। 1899-1900 के अकाल के बाद सूरत, नासिक, खेड़ा और अहमदनगर जिलों में भी लगान की नाअदायगी के आंदोलनों के समाचार आने लगे। इनका नेतृत्व धनी किसान और साहूकार कर रहे थे, यद्यपि तब तक पूना सार्वजनिक सभा काफी निष्क्रिय हो चुकी थी

13-- बिजौलिया किसान आंदोलन----

 बिजौलिया में परमार राजपूत के अधीन एक बड़ी मेवाड़ी जागीर थी। वहां किसानों पर 86 प्रकार के कर लगाए गए थे। 1905 में और पुनः 1913 में किसानों ने सामूहिक रुप से जागीरदार की खेती करने से इंकार कर दिया और पड़ोसी क्षेत्र में जाने का प्रयास किया। 1913 में हुए विरोध का नेता सीतारामदास नाम का एक साधु था। 1915 में यहां एक नए तत्व का प्रवेश हुआ जिसका माध्यम था सचिन सान्याल के समूह का एक भूतपूर्व क्रांतिकारी भूपसिंह उर्फ विजयसिंह पथिक। पथिक को यहां देशनिकाले पर भेजा गया था। इस अवधि में पथिक किसान नेता बन गया और उसने माणिकलाल वर्मा नाम के एक अधिकारी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे दोनों मिलकर उदयपुर के महाराणा के विरुद्ध करों की नाअदायगी  के आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। युद्ध ऋण में किसानों का योगदान करने से इंकार  करना बिजौलिया आंदोलन का एक तत्व था। इसने आगे चलकर गांधीवादी संपर्क स्थापित किए और यह 1920 के दशक तक चलता रहा। बाद में पथिक और बर्मा दोनों ही राजस्थान के महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेता बने। 

     14-- तिनकठिया व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन----

      चंपारण में 1860 के दशक में तिनकठिया व्यवस्था का छिटपुट विरोध होता रहा था ।  इस व्यवस्था के अंतर्गत यूरोपीय प्लांटर (निलहे) रामनगर, बेतिया और मधुबन के जमींदारों से जमीन का पट्टा ले लेते थे और किसानों को बाध्य  करते थे कि वे अपनी जमीन के कुछ भाग में नील की खेती करें। इसके लिए उन्हें मजदूरी भी नहीं दी जाती थी। जब 1900 के लगभग कृत्रिम रंगों की प्रतिस्पर्धा के कारण  नील के व्यापार में मंदी आने लगी तो इन प्लांटरों ने यह भार भी किसानों पर डालने का प्रयास किया। नील उगाने की बाध्यता से मुक्ति के बदले उन्होंने शरहबेशी (लगान वृद्धि) अथवा तवान (एकमुस्त मुआवजा) की मांग की। 1905-08 के बीच मोतिहारी-बेतिया क्षेत्र में इसका बड़ा विरोध हुआ। इसने 400 वर्गमील क्षेत्र को प्रभावित किया जिसमें कुछ हिंसक घटनाएं हुई ( ब्लूमफील्ड नाम के एक फैक्ट्री मैनेजर की हत्या ), फौजदारी के 57 मामले  चले और 277 सजाएं हुईं। अधिक समृद्ध किसानों ने संघर्ष को अगले दशक में भी जारी रखा। वे प्रार्थना पत्र भेजते थे और मुकदमें करते थे। बिहार के कुछ कांग्रेसी नेताओं एवं पत्रकारों से भी उनका संपर्क था और इसी निरंतर संघर्ष के चलते 1916 की लखनऊ कांग्रेस में राजकुमार शुक्ल का गांधी जी से संपर्क हुआ। शुक्ल खाते-पीते किसान और छोटे-मोटे साहूकार थे। खेड़ा में भी गाँधी जी के आने से बहुत पहले ही सामूहिक रूप से राजस्व की नाअदायगी अधिकाधिक सामान्य बात होती जा रही थी। समृद्ध किसानों का एक उभरता हुआ वर्ग जिसे 19वीं सदी में तंबाकू उत्पादन से पर्याप्त लाभ हुआ था और जिसके सदस्य अपने आप को 'कंबी' न कह कर 'पाटीदार' कहने लगे थे। 1898 और 1906 के बीच महामारी और अकाल का शिकार हुआ था और सरकारी लगान में वृद्धि से उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा दिया था। सूरत जिले के बारदोली में जो कि गांधीवादी गतिविधियों का एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र था, 1908 से ही एक प्रकार का संगठन विकसित होने लगा था : 'कुंवरजी मेहता ने पाटीदार युवक मंडल' की स्थापना की थी। आरंभ में इसका आधार जातिगत था।

 15-- चंपारण विद्रोह-- 

चंपारण में निलहों के विरुद्ध असंतोष और आंदोलन का एक लंबा इतिहास रहा था। जाक पुष्पादास का विस्तृत विश्लेषण दर्शाता है कि किसान आंदोलनों में मध्यस्थता की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कस्बे के बुद्धिजीवी नहीं थे जो गांधीवाद में दीक्षित हुए थे। ( राजेंद्र प्रसाद, एस. एन. सिन्हा जैसे वकील या कृपलानी जैसे मुजफ्फर कालेज के अध्यापक, जिन्हें ज्यूडिथ ब्राउन सब-कॉन्ट्रैक्टर्स कहती हैं ) बल्कि यह भूमिका समृद्ध और मंझोले किसानों के अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी ने ( राजकुमार शुक्ल जो गांधीजी को आमंत्रित करने के लिए लखनऊ गए थे, संत राउत और खेंडर राय ) स्थानीय महाजनों और व्यापारियों ने, जिन्हें साहूकारी एवं व्यापार के क्षेत्र में निलहों की प्रतिस्पर्धा से शिकायत थी, कुछ ग्रामीण मुख्तारों और स्कूली अध्यापकों ( पीर मुहम्मद, हरबंस सहाय ) ने भूमिका निभाई थी।  पहली दृष्टि में गांधीजी की इतनी ही भूमिका दिखाई देती है कि उन्होंने जुलाई 1917 में ( जब उनके प्रवेश पर लगी स्थानीय पाबंदी को सत्याग्रह की धमकी के कारण उच्च अधिकारियों ने निरस्त कर दिया था ) एक खुली जांच बिठाई और चंपारण के नील उत्पादकों की शिकायतों से सारे देश को अवगत कराया। इसी जांच और प्रचार के फलस्वरूप तिनकठिया प्रथा की समाप्ति हुई। लेकिन इसका जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा वह ठोस गतिविधियों से कहीं अधिक था। बेतिया के एस.डी.ओ. ने 29 अप्रैल 1917 की अपनी रिपोर्ट में लिखा गांधी "प्रतिदिन अज्ञानी जनसमुदाय की कल्पना को आसन्न  स्वर्णयुग के  स्वप्न दिखाकर रूपांतरित कर रहे हैं।"  एक रैयत ने गांधीजी की तुलना रामचंद्र से की और जांच समिति के समक्ष कहा कि "अब गांधी जी आ गए हैं तो काश्तकारों को राक्षसों निलहों का कोई भय नहीं है।" ऐसी भी अफवाहें फैलीं कि सभी स्थानीय अधिकारियों एवं निलहों को काबू में करने के लिए वायसराय या सम्राट ने गांधी जी को भेजा है, यह भी कुछ ही महीनों में अंग्रेज चंपारण छोड़कर चले जाएंगे। ऐसे संघर्ष के संकेत भी मिले जो गांधीवादी सीमाओं को पार करने लगे थे, जैसे कि नील के कारखानों पर आक्रमण एवं आग लगाने की कुछेक घटनाएं। 1917 के अंत तक किसान कभी-कभी तो घटी हुई दरों पर भी 'शरहबेशी' देने से इनकार करने लगे थे। जिसे गांधीवादी व्यवस्था  के अंतर्गत देना स्वीकार कर लिया गया था। गांधीजी अपने पीछे 15  स्वयंसेवकों को छोड़ गए थे। जिन्होंने गांव में रचनात्मक कार्य करने का प्रयास किया। उन्होंने  राजेंद्र प्रसाद से कहा था कि समस्याका एकमात्र हल  "रैयतों को शिक्षित करना और उनके एवं निलहों के बीच निरंतर मध्यस्था की प्रक्रिया है।" किंतु ऐसे उपाय चंपारण में अधिक सफल नहीं हुए। वहां मई 1918  तक ग्राम स्तर के केवल तीन कार्यकर्ता रह गए थे।

16-- खेड़ा विद्रोह--  

गुजरात के खेड़ा जिले में गांधीजी के हस्तक्षेप को अधिक स्थाई सफलता मिली। यहां के किसान अपेक्षाकृत समृद्ध कम्बी पाटीदार थे ( न कि चंपारण की भांति बड़े जमीदार या निलहे या अत्यंत दरिद्र काश्तकार )। खेड़ा के किसान समीप के अहमदाबाद शहर के लिए अनाज, कपास और तंबाकू का उत्पादन करते थे। अनेक पाटीदार व्यापार के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जा चुके थे और इन लोगों में प्राथमिक शिक्षा पर्याप्त प्रचलित थी। जैसा कि डेविड हार्डिमन ने खेड़ा जिले से संबंधित अपने ताजा अध्ययन में दर्शाया है, यहां 19वीं सदी के अंत में विद्यमान 'स्वर्णयुग' के बाद 1899 से  अकालों और महामारियों का दौर चला था जिससे किसानों के लिए मालगुजारी देना बहुत कठिन हो गया। ( मालगुजारी में शायद ही कभी कोई कमी की गई हो। ) गांवों में रहने वाले छोटे पाटीदारों पर जिनका अपनी बिरादरी की विवाह-व्यवस्था में हीन स्थान था, इस स्थिति का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जबकि बड़े पाटीदार दहेज के माध्यम से अतिरिक्त संपत्ति जमा कर लेते थे और उन्हें पड़ोस की बड़ौदा रियासत के सिविल सेवा में नौकरियां भी मिल जाती थीं। गांधी जी के राष्ट्रीय आंदोलन को सर्वाधिक स्थायी समर्थन छोटे पाटीदारों से ही मिला था। 1917-18 में फसल बहुत खराब हुई थी और साथ ही मिट्टी के तेल, लोहे के सामान, कपड़े और नमक की कीमतें बढ़ गई थीं, जबकि बरइया नामक निम्न जाति के लोग, जो पाटीदारों के यहां खेत-मजदूरों के रूप में कार्य करते थे अपनी मजदूरी बढ़ाने में सफल हो गए थे। अप्रैल 1918 में एक पाटीदार ने शिकायत की थी कि "पहले जो मजदूर 3 आने में मिलता था अब उसे  छः आने देने पड़ते हैं।" वस्तुतः नवंबर 1917 में मालगुजारी की नाअदायगी ( खराब फसल के कारण मालगुजारी की माफी की मांग पर बल देने के लिए ) की पहल करने वाले गांधीजी या अहमदाबाद के राजनीतिज्ञ नहीं थे अपितु मोहनलाल पंड्या जैसे खेड़ा के कापड़वंज तालुके के स्थानीय ग्रामीण नेता थे। पर्याप्त सोच-विचार के पश्चात 22 मार्च 1918 को गांधी जी ने इसे अपने हाथ में ले लिया। किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी और गरीब किसानों को डरा धमकाकर लगान वसूल कर लिया गया था। वैसे भी रवि की फसल अच्छी होने के आसार थी जिसमें मालगुजारी की माफी की मांग को कमजोर बना दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि खेड़ा सत्याग्रह जो भारत में वास्तविक गांधीवादी किसान सत्याग्रह था एक छिटपुट आंदोलन बन कर रह गया। 559 गांव में से केवल 70 गांव पर इसका प्रभाव पड़ा और जून में मामूली सी रियायत लेकर ही आंदोलन को स्थगित कर देना पड़ा। किंतु वर्षों तक नियमित रूप में होने वाले ग्राम-कार्य के कारण गुजरात में गांधीवाद की ठोस नींव पड़ी, विशेषकर खेड़ा के चरोटर क्षेत्र के समृद्ध तंबाकू एवं दुग्ध उत्पादन वाले आनंद और बरसाड़ तालुको में और सूरत के बारदोली तालुके में ( जहां गांधीवादी कार्यकर्ताओं ने अपने आपको कुंवरजी मेहता के पाटीदार युवकमंडल द्वारा पहले से चलाए जा रहे रचनात्मक कार्य से जोड़ लिया था )। गांधीजी की अहिंसा में पाटीदारों के गहन विश्वास का कारण केवल वैष्णव भक्ति की परंपरा ही नहीं थी, अपितु यह तथ्य भी था कि "संपत्तिधारी होने के कारण वे किसी प्रकार की हिंसक क्रांति नहीं चाहते थे।" वास्तव में खेड़ा सत्याग्रह के तुरंत पश्चात पाटीदारों के घरों में डकैतियों की बाढ़ सी आ गई।  इन डकैतियों में बरइयों का हाथ था जिन्होंने संभवत: अनुमान कर लिया था कि अंग्रेजी राज्य की कानून-व्यवस्था ढह रही है। गुजरात के किसानों की अपनी राय थी और वे गांधीजी के  अनुयायियों की कठपुतली  मात्र नहीं थे जैसा कि ज्युडिथ ब्राउन ने दर्शाया है। यह इस बात से सिद्ध है कि  1918 की गर्मियों में फौजी भर्ती के लिए गांधी जी द्वारा किए गए  आह्वान का खेड़ा में कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा  : "जो ग्रामीण पहले मालाएं लेकर उनके स्वागत के लिए आए थे अब उन्हें भोजन देने के लिए भी तैयार नहीं थे" ( हार्डीमन  के शोधग्रंथ पेजेंट एंजीटेशंस इन खेड़ा डिस्ट्रिक्ट, गुजरात, 1917-1934 ससेक्स थीसिस,1975 से उद्धृत पृ० 113, 158, 151)।

17--बारदोली किसान आंदोलन 1928---- 

 ग्रामीण संगठन और आंदोलन के विशिष्ट गांधीवादी तरीकों को पहले-पहल वास्तविक शक्ति मित्र 28 में (गुजरात के सूरत जिले में) बारदोली की अनोखी सफलता के साथ मिली। 137 गांववाले और 87000 जनसंख्या वाले इस तालुके में 1922 से मानवतावादी और रचनात्मक कार्य अत्यंत सफलतापूर्वक चलाए जा रहे थे। कुंवरजी और कल्याण जी मेहता जैसे स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में यहां के जोतधारी किसानों की प्रमुख जाति कम्बी-पाटीदार 1908 से ही संगठित होने लगे थी। उनके संगठन में पाटीदार युवकमंडल, पटेल बंधू नाम की पत्रिका और सूरत में विद्यार्थियों के लिए एक छात्रावास चलाने वाले पाटीदार आश्रम का बड़ा हाथ था। पाटीदारों के खेत दुबला आदिवासी जोतते थे जो पारंपरिक रूप से थे ऋण-दास थे और जिनको 'कालीपराज' (काले लोग) कहा जाता था। यह बारदोली की जनसंख्या का 50% थे। काली पर आज लोग अत्यंत पिछड़े हुए थे और गांधीजी के सचिव 'महादेव देसाई' ने अपनी स्टोरी ऑफ बारदोली (1929) में अत्यंत 'अहिंसक और निश्छल' और कानून मानने वाले कहकर उनकी बड़ी प्रशंसा की है। जैसा कि जेन ब्रेमन ने दक्षिण गुजरात के अनाविल ब्राह्मणों और दुबलों के पारस्परिक संबंधों के बारे में अपने अध्ययन में दर्शाया है ऋण-दासता "पराधीन श्रम का एक रुप थी जिसे संरक्षण के संबंध जटिल और कम असहाय बना देते थे" (पेट्रोनेज एंड एक्सप्लायटेशन, कैलिफोर्निया, 1974 , पृष्ठ 67 )।कालीपराज बंधुआ मजदूरों को पाटीदार पेट भरने को न्यूनतम भोजन और तन ढकने के लिए कपड़ा देते थे, और शोषण की वास्तविकताएं कुछ सीमा तक पारंपरिक पारस्परिकता के परदे में छिप जाती थीं। 1920 के दशक के आरंभ से ही गांधीवादी रचनात्मक कार्यकर्ता कालीपराज लोगों के बीच में सक्रिय थे, जिन्हें उन्होंने नया नाम 'रानीराज' (वनवासी) दिया था।

     1927 में कपास की गिरती हुई कीमतों के बावजूद मुंबई के गवर्नर नें बारदोली में मालगुजारी में 22% की वृद्धि की घोषणा कर दी, तो मेहता बंधुओं ने बल्लभ भाई पटेल को मालगुजारी की नाअदायगी का आंदोलन संगठित करने के लिए राजी कर लिया।। यह आंदोलन जितना शांतिपूर्ण था उतना ही दृढ़निश्चयी भी सिद्ध हुआ। बड़े स्तर पर जमीन और जानवरों की कुर्की भी किसानों को झुकाना सकी और कालीपराज लोगों ने भी कुल मिलाकर सरकारी अधिकारियों द्वारा दिए गए प्रलोभन को ठुकरा दिया कि उन्हें आसान शर्तों पर जमीन दी जाएगी।  पटेल एवं अन्य स्थानीय नेताओं नें  जाति-समितियों, सामाजिक बहिष्कार की विधियों, धार्मिक  आह्वानों एवं भजनों का बड़ा ही कुशल प्रयोग किया। आदिवासियों से कहा जाता था कि उनके देवता सिलिया सिमलिया बूढ़े हो गए हैं और इसलिए अब उन्होंने  गांधीजी को अपने भक्तों की देखभाल करने का काम सौंप दिया है-- क्या महात्मा गांधी भी  उन्हीं की भांति लंगोटी नहीं पहनते और भैंस के दूध की जगह बकरी का दूध नहीं पीते?  ( घनश्याम शाह, 'ट्रेडिशनल सोसायटी एंड  पॉलीटिकल मोबिलाइजेशन, कंट्रीब्यूशंस टु इंडियन सोशियोलॉजी,1974)। दैनिक सत्याग्रह पत्रिका ( जिसकी सूरत से 10,000 प्रतियां छपती थीं ) में छपने वाले भाषणों और लेखों में बार-बार कहा जाता था कि किसान और ग्रामीण श्रमिक ही तो असल में "दौलत उत्पन्न करते हैं •••• यही तो राज्य के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।"  इसके साथ ही ग्रामीण वर्गों की एकता एवं पारंपरिक पारस्परिकता की भावना पर भी बारंबार बल दिया जाता था  : "साहूकार तो काश्तकारों के बीच दूध में पानी की तरह मिले हुए हैं। उन्हें अलग करना संभव नहीं है" ( महादेव देसाई की रचना में उद्धृत पटेल का भाषण पृष्ठ 169)।

       बारदोली शीघ्र ही एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। अहमदाबाद के कामगारों ने एक-एक आना चंदा करके 1300 ₹ एकत्रित किए जबकि मुंबई की काउंसिल में इंडियन मर्चेंट चेंबर के प्रतिनिधि लाल जी नारायणजी ने जुलाई में बंबई के व्यापारियों द्वारा मध्यस्था के प्रयास असफल हो जाने पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। बारदोली आंदोलन नेतृत्व एवं विचारधारा की दृष्टि से उसी समय बंबई में  कम्युनिस्ट नेतृत्व में होने वाले गिरनी कामगार हड़ताल से नितांत भिन्न था। फिर भी गवर्नर  विल्सन और भारत सचिव वर्केनहेड का गुप्त पत्र व्यवहार दर्शाता है कि अंग्रेजों को इन दोनों आंदोलनों के मिल जाने का भय था। सशस्त्र पुलिस यहां तक कि सेना की टुकड़ियों  को भी बारदोली भेजने की योजना अगस्त के पहले सप्ताह में अचानक बदल दी गई और न्यायिक जांच  एवं जब्त की गई जमीन लौटा दिए जाने के आधार पर समझौता हो गया। "मेरे पुलिस अधिकारियों की दी हुई सूचना के  अनुसार उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि सरकार बारदोली में कोई कदम उठाती है कम्युनिस्ट बारदोली की स्थिति का लाभ उठाकर बी. बी. सी. आई. और जी. आई. पी. ( रेल लाइनों ) में हड़ताल करवा देंगे और उनका विचार है कि  वे लोगों को निकाल लाते" (  वर्केनहेड के नाम विल्सन का पत्र 7 अगस्त 1928, वर्केनहेड कलेक्शन )। मैक्सवेल-ब्रूमफील्ड जांच समिति ने स्वीकार किया कि बारदोली के ( और निहितार्थ रूप से प्रांत में अन्य स्थानों के भी ) पुनर्मूल्यांकन में खामियां थीं, और वृद्धि को एक 1,87,492 ₹ से घटाकर 48648 ₹ कर दिया गया। पुनर्मूल्यांकन के विरोध में पटेल समस्त गुजरात और महाराष्ट्र में मालगुजारी की नाअदायगी के आंदोलन की योजना बना रहे थे और बॉम्बे प्रेसिडेंट लैंड लीग का संगठन करने लगे थे। हालात को देखते हुए बंबई के गवर्नर ने 16 जुलाई 1949 को मालगुजारी के पुनर्मूल्यांकन के काम को तब तक के लिए निरस्त कर दिया जब तक कि संवैधानिक सुधारों का तत्कालीन सिलसिला पूरा नहीं हो जाता। खेड़ा में राजस्व की 1890 के दशक वाली दरें बनी रहीं,  और  वस्तुतः 1940 के दशक तक उनमें कोई  मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया। गुजरात के किसानों को गांधीवादी राष्ट्रवाद से निश्चय ही ठोस लाभ प्राप्त हुए।

 18-  किसान सभाओं का गठन---  

1920 से आरंभ होने वाले दशक में बंगाल, पंजाब तथा यू.पी. में किसान सभा का गठन हुआ। 1928 में आंध्र प्रांतीय रैयत सभा ( Andhra Provincial Ryots Association ) बनी। 1934 ईस्वी में सहजानंद सरस्वती के प्रयत्नों से 'बिहार किसान सभा' ने जिसकी स्थापना 1927 में हुई थी, एक व्यापक व्यापक संगठन का रूप ले लिया। इसमें आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण का सक्रिय सहयोग ने हासिल था । 1935 में उत्तर प्रदेश में प्रादेशिक किसान सभा गठित हुई। परंतु अखिल भारतीय किसान सभा का गठन 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुआ। 1936 में ही कलकत्ता में बंगीय प्रादेशिक किसान सभा की स्थापना हुई। इसकी स्थापना भारतीय साम्यवादी पार्टी (सीपीआई) की बंगाल यूनिट ने की थी । किसान सभा का उद्देश्य किसानों की आर्थिक शोषण से रक्षा करना था। उन्होंने ऋणों पर ऋणस्थगन ( Moratorioum ) मांगा, कम लाभदायक जोतों ( uneconomic holdings ) पर भूमि कर का हटाना,  किराया तथा भूमि कर का कम करना, साहूकारों को लाइसेंस लेने पर बाध्य करना,  कृषि मजदूरों का कम से कम वेतन निश्चित करना, गन्ने तथा अन्य व्यापारिक फसलों के लिए उचित दर निश्चित करना तथा सिंचाई के साधनों आदि की मांग प्रस्तुत कीं। उन्होंने जमीदारी व्यवस्था की समाप्ति, तथा भूमि कृषक को ही मिले ऐसी मांग की। इसके अतिरिक्त उन्होंने कृषकों को भी स्वतंत्र संग्राम में भाग लेने को कहा।

      किसान सभाओं ने आंध्र प्रदेश में जमीदारों के जुल्म के विरुद्ध  भूमि व्यवस्था विरोधी आंदोलन आरंभ किए। यू.पी. और बिहार में जमीदारों के शोषण के विरुद्ध वीरतापूर्ण आंदोलन किए गये।1936 में बिहार में 

19-बाकाश्त भूमि आन्दोलन 1936---

'बाकाश्त' ( स्वयं जोती हुई ) भूमि के विरूद्ध आंदोलन आरंभ किया गया। बाकाश्त वह भूमि होती थी जो  जमींदार की अपनी विशेष भूमि होती थी और जिसमें से जमींदार फसल का भाग ले जाता था न कि   धन। जमीदारों नेअधिकाधिक भूमि इस वर्ग में लाने का प्रयत्न किया था ताकि कृषक को मौरूसी अधिकार न मिल जाएं। 1937 में किसी न किसी बहाने से मुजारों को बेेदखल किया गया। किसान सभा ने इन बेदखल हुए किसानों को संगठित किया और उन्होंने सत्याग्रह किया तथा अन्य लोगों को  वह भूमि नहीं जातने दी। इसके परिणामस्वरुप उपद्रव हुए तथा बहुत से सत्याग्रही जख्मी हुए। 18 अक्टूबर 1937 को किसान सत्याग्रहियों पर  हुए अत्याचार के विरूद्ध कृषक दिवस मनाया गया।

       किसान सभाओं के गठन से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ गया। अब कांग्रेस ने भी अपने कराची तथा फैजपुर अधिवेशन में अपने कृषक कार्यक्रम में अधिक परिवर्तनशील मांगें प्रस्तुत कीं। फैजपुर अधिवेशन में कर तथा भाटक में कमी करने, सामंतशाही देय (feudual dues) तथा अन्य मांगों को समाप्त करने, निश्चित समय के पट्टे, ऋणों पर स्थगन, कृषि तथा अन्य मजदूरों के लिए गुजारिन भृति ( Living Wage ) तथा अधिक अच्छे कार्य परिस्थितियों की मांग की।

20-'तेभागा' आंदोलन 1946---- 

सितंबर 1946 में बंगाल की प्रांतीय किसान सभा ने  तेभागा संबंधी फ्लाउड कमीशन की सिफारिश को लागू करवाने के लिए जन-संघर्ष का आह्वान किया। सिफारिश यह थी कि जोतदारों से लगान पर ली गई जमीन पर काम करने वाले बंटाईदारों ( बरगादारों, भागचासी या अधियरों )  को फसल का आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलने के स्थान पर दो तिहाई हिस्सा दिया जाए। कम्युनिस्ट कार्यकर्ता जिनमें अनेक जुझारू शहरी विद्यार्थी भी थे गांव में गए और उन्होंने बंटाईदार ओं को संगठित किया। बंटाईदार अब तक ग्रामीण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बन चुके थे, क्योंकि मंदी और अकाल के कारण गरीब किसान अपनी जमीन खो बैठे थे और वो बंटाईदारों के स्तर पर आ गए थे, कहीं- कहीं तो गांव में इनकी संख्या 60% तक थी और यही क्षेत्र तेभागा आंदोलन के गढ़ बन गए थे। नवंबर में फसल की कटाई के समय आंदोलन ने अचानक जोर पकड़ लिया जिसका मुख्य नारा था 'निज खमारे धान तोलो' अर्थात बंटाईदार पहले की भांति जोतदार के घर धान ले जाने के स्थान पर अपने खलिहानों में ले जाने लगे ताकि तेभागा को लागू किया जा सके।  इस तूफान का केंद्र बना उत्तरी बंगाल और विशेष रूप से दिनाजपुर का ठाकुरगंज उपसंभाग और इसके साथ लगे हुए जलपाईगुड़ी, रंगपुर और मालदा के क्षेत्र। मैमनसिंह (किशोरगंज), मिदनापुर (महिषादल, सूताहाट और नंदीग्राम) और 24-परगना (काकद्वीप) में भी  तेभागा आंदोलन विकसित हो रहा था, और उत्तरी मैमनसिंह के हजोंग, जो 1937-38 में टंका ( उपज के रूप में लगान) कम करवाने में सफल रहे थे, अब मांग कर रहे थे कि इस लगान की अदायगी नगद करने दी जाए, ताकि अन्न के बढ़े हुए मूल्य से उन्हें लाभ मिल सके। उत्तरी बंगाल में तेभागा का आधार मुख्य रूप से राजवंशियों के बीच था जो आदिवासी मूल के निम्न जाति के लोग थे और अधिकांशतः अधियर और गरीब काश्तकार थे, किंतु इनमें कुछ बड़े जोरदार भी थे जिनमें वर्ग-संगठन के कारण पहले ही क्षत्रियत्व की मांग करते हुए चला संस्कृतिकरण का आंदोलन कमजोर पड़ चुका था।( कम्युनिस्ट रूपनारायण राय 1946 में कांग्रेस और क्षत्रिय समिति दोनों के ही प्रत्याशियों को हराकर दिनाजपुर की सीट जीत चुके थे।)  कलकत्ता और नोआखाली के बावजूद तेभागावाले क्षेत्रों में मुसलमानों ने भी हिस्सा लिया जिसके फलस्वरूप हाजी मोहम्मद दानेश और नियामत अली जैसे नेता उत्पन्न हुए, यहां तक कि कुछ मौलवी भी आगे आए जो जोतदारों के शोषण के विरुद्ध कुरान की आयतें उद्धृत करते थे। किंतु दक्षिण-पूर्वी बंगाल इससे अछूता ही रहा जिसमें किसान सभा का पुराना गढ़ टिपरा भी सम्मिलित था। जोतदारों एवं पुलिस की बढ़ती हुई हिंसा का सामना स्वयंसेवक लाठियों से करने लगे थे।:  "पिछली कई शताब्दियों से मूक ••• उनको ( बरगादारों को )अपने साथियों के साथ बंदूक की भांति लाठी कंधे पर रखें और जुलूस के आगे लाल झंडा लगाकर खेत में चलते हुए देखना प्रेरणादायक है"  ( स्टेट्समैन,19 मार्च 1947; सुनील सेन के एग्रेरियन स्ट्रगल इन बंगाल 1946-47 में उद्धृत, पृ. 38 )।

     किंतु लाठियां बंदूके नहीं होती और जब लीगी सरकार ने अपनी बहकाने के लिए प्रस्तुत बरगादार विधेयक ( जो1950 से पहले कानून नहीं बन सका और तब भी शायद ही कभी लागू हुआ हो ) की भरपाई फरवरी 1947 से दमन-चक्र चलाकर कर दी तो आंदोलन के सामने ऐसा संकट पैदा हुआ जो घातक सिद्ध हुआ।  बालुरघाट में पुलिस के साथ झड़पों में 20 संथाल मारे गए; सुनील सेन 49 किसान शहीदों की सूची देते हैं। कुछ जुझारू किसान हथियारों की मांग कर रहे थे, किंतु कम्युनिस्टों के पास उन्हें देने के लिए हथियार नहीं थे। वैसे भी उन्होंने सशस्त्र संघर्ष की बात नहीं सोची थ। सामाजिक रुप से भी इसकी सीमाएं दिखाई देने लगे थीं। आदिवासी तत्व अधिक उग्र संघर्ष के लिए दबाव डाल रहे थे ( जिनमें जलपाईगुड़ी के दुआर्स क्षेत्र के चायबागानों के कुली भी थे) किंतु मंझोले और गरीब किसानों का समर्थन कम होने लगा था, और उत्तरी बंगाल के शहरी व्यवसायिक समूह जो राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य आधार थे, अत्यन्त विरोधी हो गए थे ( इनमें से अनेक के पास जमीनें थीं जिन्हें बरगादार जोतते थे )। कम्युनिस्टों ने 28 मार्च को एक आम हड़ताल करने की योजना बनाई थी, किंतु इसी बीच हिंदू महासभा बंगाल-विभाजन को लेकर आंदोलन कर दिया था जो  जोर पकड़ने लगा था और कलकत्ता में 27 मार्च से नए सिरे से होने वाले दंगों ने शहरी क्षेत्र से मिलने  वाली सहानुभूति की संभावना को समाप्त कर दिया। यह आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति के काफी समय बाद तक चलता रहा और अंत में पुलिस कार्यवाही की वजह से धीरे-धीरे समाप्त हो गया। कुल मिलाकर इसकी उपलब्धि 1949 के वर्गदार अधिनियम (vargakar act ) के रूप में सामने आई जिसे बी. सी. राय सरकार ने एक अध्यादेश द्वारा जारी किया था।

  21--तेलंगाना कृषक आंदोलन---- ,

 तेलंगाना क्षेत्र में पटेल एवं पटवारियों की सहायता से देशमुखों ने अच्छी भूमि के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा करके उसे अनाप-शनाप लगान पर उठाना शुरू कर दिया। कालांतर में उन्होंने अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ा लिया और उनकी शक्ति एवं हैसियत में काफी वृद्धि हो गई जिससे वे ग्रामीण समाज के कर्ताधर्ता बन गए। देशमुखों ने इस भूमि को इतनी तेजी से लूटा की वर्तमान सदी के पांचवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने कुछ जिलों में तो साठ से सत्तर प्रतिशत भूमि पर कब्जा कर लिया और कई बार एक-एक देशमुख के पास 40,000 से 1,00,000 या डेढ़ लाख एकड़ तक भूमि हो गई। इन देशमुखों एवं जागीरदारों को निजाम की सरकार का संरक्षण मिला हुआ था। अतः किसानों और खेतिहरों ने, जिनका इस अवधि में भरपूर शोषण किया गया था, अपने शोषकों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया और धीरे धीरे स्थानीय कम्युनिस्ट, मझोले किसान और कांग्रेस संगठन भी इस अभियान में शामिल हो गए। साम्यवादियों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया और साथ में कृषक कार्यक्रमों पर जोर दिया जिससे निजाम के प्रभाव को कम किया जा सके।

     तेलंगाना आंदोलन ने कम से कम 1948 तक निम्न  काश्तकार वर्ग को बड़े किसानों, बल्कि कहना चाहिए कि छोटे-छोटे जमीदारों तक से मिलाया। इसे भारी जनसमर्थन मिला और सहस्त्र संघर्ष के द्वारा इसमें काफी सफलता अर्जित की। इस तथ्य से स्पष्ट है कि जुलाई 1948 तक गोरिल्लाओं के प्रभाव में ढाई हजार तक गांव आ चुके थे जिनमें से अधिकांश ने अपने कम्यून काम कर रहे थे और यह सब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशन के बिना ही संभव हुआ था।

      आगे चलकर स्वतंत्र भारत की लोकप्रिय सरकार ने आंदोलन को कुचल दिया। फिर भी इसने अपने पीछे किसानों की वीरता की जो विरासत छोड़ी उसकी बराबरी करने वाले उदाहरण आगे के युग में मुश्किल से ही मिलेंगे। भारत सरकार ने तेलंगाना आंदोलन का मुकाबला जहां दमनात्मक कार्यवाही के द्वारा किया, वहाँ गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे ने इसका जवाब अपनी प्रसिद्ध 'भूदान आंदोलन' द्वारा दिया। भूदान आंदोलन ने आगे चलकर ग्रामदान आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया। विनोबा भावे कि यह एक चाल थी जिससे वे किसानों का ध्यान बंटाकर उन्हें वर्ग संघर्ष से दूर रख सकें। यह उनकी एक ऐसी कोशिश थी जिसके द्वारा वह किसानों से यह मनवाना चाहते थे कि उनकी समस्याएं भूदान, ग्रामदान और शांतिपूर्ण आंदोलनों के द्वारा सुलझाई जा सकती हैं।

     निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत में किसान तथा किसान संगठन प्राय: असंगठित या कुसंगठित ही रहे और गरीब किसानों तथा भूमिरहित किसानों की समस्या पर राष्ट्रीय दल ( या दलों) तथा साम्यवादियों दोनों ने ही प्रायः कोई ध्यान नहीं दिया। बारदोली प्रस्ताव में कृषक वर्ग के प्रति राष्ट्रवादी पार्टियों का रुख भली-भांति प्रति फलित हुआ है और इसके प्रमाणीकरण के लिए हम स्वराज पार्टी का निम्नलिखित कथन और जोड़ सकते हैं "यह सत्य है कि यह पार्टी इस बात पर दृढ़ है कि किसानों को न्याय मिले, किंतु यदि इसमें जमीदारों के प्रति अन्याय शामिल है तो वह काफी घटिया किस्म का होगा।" ये शब्द वर्तमान सदी के तीसरे दशक के मध्य में रजनी पाम दत्त की शब्दावली में 'प्रगतिशील बुर्जुआ' (progressive bourgeoises)  द्वारा कहे गए थे किंतु आने वाले दशकों में कांग्रेस के वामपंथी राष्ट्रवादी भी व्यवहार में इनसे कुछ ज्यादा अच्छा करने वाले नहीं थे।  जहां तक साम्यवादियों का प्रश्न है अपने उद्देश्यों में ईमानदारी के बावजूद भी कृषक वर्ग पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रहे क्योंकि उन्हें भारतीय यथार्थ की समुचित समझ नहीं थी। एक अर्धपूंजीवादी तथा अर्धसामंतवादी समाज में किसान कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं है किंतु दुर्भाग्यवश अपनी सैद्धांतिक चर्चा में ऐंठे हुए साम्यवादी कदाचित यह नहीं समझ सके या यदि समझ भी गए हम तो इतना तय है कि वे व्यवहार में इसका कोई फायदा नहीं उठा सके। फलतः जब  भारत स्वतंत्र हुआ, किसान फिर भी पूरा पराश्रयदाता की पुरानी दुनिया में ही सड़ रहे थे और आज भी सड़ रहे हैं।

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