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वैदिक काल में स्त्री की दशा,अपाला, घोषा, लोपामुद्रा vaidic kaal me striyon ki dasha apala,ghosha,lopamudra

            हड़प्पा सभ्यता एक ऐसी सभ्यता थी जिसमें नारी को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया था। उसके बाद भारत में वैदिक सभ्यता का उदय हुआ और यह सभ्यता एक पुरुष प्रधान सभ्यता थी। वैदिक काल में स्त्री की दशा,अपाला, घोषा, लोपामुद्रा  vaidic kaal me striyon ki dasha apala,ghosha,lopamudra जहां देवी-देवताओं से सिर्फ पुत्र प्राप्ति की इच्छा की जाती थी। लेकिन इतना होने पर भी वैदिक काल नारी की दशा उतनी दयनीय नहीं थी जितनी आगे जाकर हो गयी। इस लेख में हम वैदिक काल की प्रमुख विदुषी महिलाओं के बारे में जानेंगे जिन्होंने वेदों की ऋचाओं की भी रचना की। 

 वैदिक काल में स्त्री की दशा,अपाला, घोषा, लोपामुद्रा  vaidic kaal me striyon ki dasha apala,ghosha,lopamudra

 
women condition in vaidic prieod


     
प्राचीन काल, मध्यकाल और वर्तमान काल तक महिलाओं की दशा के विषय में निरंतर चिंतन और मनन होता रहा है। परंतु इस विषय में अधिकांश विद्वान और ऋषि-मुनि रूढ़िवादी और पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित रहे। वर्तमान समय में जिस प्रकार महिलाओं के प्रति अत्याचार और  अपराध को देख कर मन में यही प्रश्न उठता है कि क्या भारत में सदा ही महिलाओं की स्थिति इतनी ही दयनीय और पीड़ादायक थी? यद्यपि संविधान में महिलाओं को बराबर का दर्जा दिया गया है परंतु फिर भी भारत ही क्या समस्त विश्व में महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की ही सोच दिखाई पड़ती है। यद्यपि परिस्थितियों में सुधार के भी अंश दिखाई देते हैं परंतु उनकी गति अत्यंत मंद है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाओं की स्थिति प्राचीन काल से ही ऐसी थी या मध्यकाल में अत्यंत दयनीय हुई या आधुनिक काल में ज्यादा दयनीय है?

      ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति

   ऋग्वेद से यह ज्ञात नहीं होता कि सप्त सिंधु की आर्य- स्त्रियों की दशा उतनी हीन थी, जितनी कि आगे चलकर हो गई। यह ठीक है अब वह सामंतवादी व्यवस्था के अधीन नहीं थीं, जिसमें जन (पितृसत्ता के ) अवस्था के अधिकार सुलभ नहीं थे। शुद्ध जन- व्यवस्था में स्त्रियां हथियार लेकर लड़ सकती हैं। ईसा-पूर्व छठी शताब्दी में मध्य-एशिया के शकों में ऐसा ही देखा जाता था, जहां घुमंतू स्त्रियों ने कितनी ही बार हथियार उठाये। लेकिन, स्त्रियों का युद्ध में जाना आर्य बुरा समझते थे। शम्बर के पहाड़ी लोग जन अवस्था में थे, उनके लिए स्वभाविक था, कि दिवोदास के साथ उनका जो जीवन-मरण का संघर्ष चल रहा था, उसमें पुरुषों की तरह स्त्रियाँ भी शामिल हों। पर आर्य ऋषियों ने "अबला क्या करेगी" कह कर इसका उपहास किया था ( बभ्रु की एक ऋचा -५।३०।९ में है-----"दास ने स्त्रियों को आयुध ( हथियार) बनाया।" इस पर इन्द्र ने कहा--- "इसकी अबला सेना मेरा क्या करेगी?")  स्त्रियों के लिए अबला शब्द का प्रयोग शायद यहीं सर्वप्रथम हुआ , जिससे ध्वनित होता है, कि स्त्रियों में योद्धा होने की योग्यता नहीं है। इस प्रकार आर्य-स्त्रियों के संग्राम में खुलकर भाग लेने की संभावना सप्तसिन्धु में नहीं थी। वैसे अपवाद के तौर पर स्त्रियों ने कभी अपने हाथ दिखाये हों, तो दूसरी बात है।

      युद्ध बाद सबसे महत्व था ऋचाओं ( पदों ) की रचनाओं, जिसके कारण उन्हें ऋषि, ऋषिका कहा जाता । ऋषिकाओं की संख्या ऋग्वेद में दो दर्जन से कम नहीं हैं । पर विश्लेषण करने पर उनमें से अधिकांश को मानुषी नहीं कल्पित ही देखा जाता है। केवल घोषा और विश्ववारा को ही ऐतिहासिक ऋषि माना जा सकता है। ऋषिकाओं के नाम से जो ऋचाएँ ऋग्वेद में संग्रहित हैं, उनकी रचयित्रियाँ स्त्रियाँ ही रही होंगी, यह कहना मुष है। हाँ , इन ऋचाओं से ऋग्वैदिक आर्य-स्त्रियों के जीवन के विषय में कितनी ही बातों का पता जरूर लगता है। इन कल्पित-अकल्पित ऋषिकाओं की कुछ सूक्तियां निम्न प्रकार हैं;

१. अदिति--- ऋग्वेद के दसवें मण्डल का ७२वां सूक्त वृहस्पति अथवा अदिति का बनाया बतलाया जाता है। इसमें अदिति का नाम ( १०।७२ ) आया है, शायद इसीलिये इसे अदिति का बनाया सूक्त कह दिया गया। अदिति ( द्यौ ) दक्ष की पुत्री कही गई है, और दक्ष (सूर्य ) को भी अदिति का पुत्र बतलाया गया है----

"उत्तानपद ( वृक्ष ) से भूमि उत्पन्न हुई, भूमि से दिशाएं उत्पन्न हुई। अदिति से दक्ष, दक्ष से अदिति उत्पन्न हुई।।४।।"

"हे दक्ष , जो तेरी  दुहिता अदिति है उसने देवों को जन्म दिया। उसके पीछे महान अमृतबंधु ( अमर ) देव उत्पन्न हुये।।५।।"

"शरीर से अदिति के जो आठ पुत्र (  मित्र, वरुण, धाता, आर्यमा, अंश, भग, विवस्वान् आदित्य ) उत्पन्न हुये। (उनमें से ) सात के साथ वह देवताओं के पास गई। ( पर )मार्तंड को परे स्थापित कर दिया।।८।।"

    इसमें दिव्य अदिति ( द्यौ ) का वर्णन है। वह सप्तसिंधु की ऋषिका नहीं थी।

२. इन्द्र-मातायें----  इंद्र की माताओं का सूक्त ( १०।१५३ ) भी इसी तरह कल्पित नाम से है। इस सूक्त में इंद्र के जन्म तथा वीरता का वर्णन है। असली ऋषि का नाम मालूम न होने पर इंद्र को जन्म देने वाली इंद्र-माताओं को इसका रचयिता मान लिया गया। इसकी कुछ ऋचायें हैं -----

" उत्पन्न इंद्र के पास कार्य-तत्पर सुंदर-वीर्य अभिलाषिणि उपासना करती हैं ।१।"

"हे इंद्र, तुम सहस बल से ओज से पैदा हुये। तुम कामनापूरक ( वृष ) हो।२।"

"हे  इंद्र ओज के साथ वज्र को तेज करते तुम (अपने ) साथी अर्क ( सूर्य ) को दोनों बाहों में धारण करते हो।४।"

३. इन्द्राणी----  यह भी कल्पित नाम है। इसकी ऋचाओं (१०।१४५ ) में  कहीं इंद्राणी का नाम नहीं आया है। स्त्री को सौत से भय होना स्वाभाविक है। सपत्नी-बाधन के लिए यहां जड़ी-बूटियों के प्रयोग का उल्लेख है।  इंद्राणी का एक और सूक्त (१।८६ )  मिलता है, जिसमें इंद्राणी के तेज का पता जरूर लगता है। घर में वृषाकपि ( अग्नि ) के अधिक सम्मान को इंद्राणी सह नहीं सकी, इसलिए वह इंद्र के सामने उसके प्रति रोष प्रकट करती है। इंद्र ने ही आग में घी डालते हुए आरंभ किया---

 "सोम छानने के लिए कहा था, पर स्तोताओं ने देवेंद्र की उस यज्ञ में स्तुति नहीं की, यहां यज्ञ में पुष्ट मेरा सखा आर्य  ( स्वामी ) वृषाकपि ( अग्नि ) संतुष्ट हुआ। इंद्र सबसे उत्तम है।१।"

  इंद्राणी कहती हैं--- हे 'इंद्र, तुम विचलित होकर  वृषाकपि  के पास दौड़े जाते हो, अन्यत्र सोमपान के लिए नहीं जाते।०।२।"

" क्या है, जो तुम्हें इस पीले ( हरे ) मृग वृषाकपि ने ( ऐसा ) बना दिया है, कि उसके लिए पुष्टिकारक धन तुम अर्य ( स्वामी ) देते हो।०।३।"

"हे इंद्र, जिस इस प्रिय वृषाकापि के तुम रक्षक हो उसके कान में बराह (को काटने ) की चाहवाला कुत्ता काटे।०।४।"

 मेरे लिए साफ की हुई तैयार प्रिय वस्तु को कापे ने दूषित कर दिया। इसके सिर को काट लो। इस दुष्कर्मा को सुख न होवे।५।"

 इंद्र-- सुबाहु सुअंगुलीवाली, बड़े बालों, मोटी जांघों वाली हे सूरपत्नी ( इंद्राणी ) तुम क्यों हमारे वृषाकपि पर क्रुद्ध हो।८।"

 इंद्राणी----- यह दुष्ट वृषाकपि मुझे अवीर पुत्रों वाली समझता है। परंतु मैं वीर पुत्रा इंद्र-पत्नी हूं। मेरे सखा मरुत् हैं।९।"

  "हवन या युद्ध के समय नारी वहां पहले आती है। सत्य की विधाता वीर पुत्रा इंद्र पत्नी की पूजा होती है ०।१०।"

 इंद्र---- इन नारियों में इंद्राणी को मैंने सौभाग्यवती सुना है। दूसरों की तरह इसका पति बुढ़ापे से नहीं मरता ।।११।।

"हे इंद्राणी, ( अपने ) मित्र ( उस ) वृषाकपि के बिना मैं नहीं खुश रह सकता, जिसके द्वारा प्राप्त यह प्रिय हवि देवताओं के पास जाती है।१२।।

"हे धनवती सुपुत्रा सुबधु का वृषाकपि- पत्नी, इंद्र तेरे बैलों को खा जाये, प्रिय हवि को भख जाये ०।१३।"

" ( भक्त ) मेरे लिए पन्द्रह के साथ बीस ( ३५ ) बैलों को पकाते हैं, और मैं खाकर मोटा हूं। मेरी दोनों को कुक्षियों को ( भक्तजन ) पूर्ण करते हैं ०।१४।"

"हे वृषाकपि, मरूभूमि और काटने लायक जो बन हैं, वह कितने योजन हैं। आओ पासवाले उन गृहों में ०।२०।"

   वृषाकपि अग्नि है। अग्नि के मुख से ही इंद्र हवि ग्रहण करता है, इसलिए वृषाकपि को वह अपना परममित्र माने, तो कोई आश्चर्य नहीं। इसी कारण इंद्राणी का वृषाकपि के ऊपर कोप था। देवताओं में भी पारिवारिक कलह कितना था?

४. उर्वशी-----उर्वशी अप्सरा थी, जिससे पुरूरवा ने प्रेम किया। जैसे आज पंजाब में हीर-रांझा, सोनी-महीवाल की प्रेम कथाएं प्रचलित हैं, उसी तरह उर्वशी और पुरुरवा की प्रेम कथा सप्तसिंधु में उस समय प्रचलित थी। संभव है, वह मानुष प्रेमी और प्रेमिका रहे हों, जिन्हें मानव-देवी बना दिया गया। ऋग्वेद के इस प्रेम कथानक वाले सूक्त ( १०।९५ ) को उर्वशी और पुरुरवा की रचना बतलाया गया है, जिससे यही मालूम होता है, कि असली रचयिता ( लोककवि ) का नाम विस्मृत हो गया है था। उसको छोड़ कर जाती उर्वशी से प्रेमी पुरूरवा बहुत अनुनय-विनय करता है, उसे घोरा (चण्डी ) कहता है,। लेकिन उर्वशी कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं होती। वह यहां तक कह देती है, कि स्त्रियों में प्रेम नहीं होता, उनके हृदय भेड़ियों के से हैं।( १०।९५।१५ ) १७वीं ऋचा में वशिष्ठ का नाम आया है, जिससे सन्देह होता है, कि शायद वशिष्ठ ही इन ऋचाओं के कर्त्ता रहे हों ( १०.९५ )------

" आन्तरिक्ष को भरने वाली लोगों को नापने वाली उर्वशी से वशिष्ठ प्रार्थना करता हूं। सुकृत-दाता ( पुरूरवा ) तुम्हारे पास रहे, लौटो, मेरा हृदय तप रहा है।।१७।"

     यह सूक्त ऋग्वेद के उन सूक्तों में है, जिन्हें उत्तम काव्य कहा जा सकता है। 

५.  घोषा-----कक्षीवान्-पुत्री  दोनों अश्विनी कुमारों की प्रशंसा में घोषा ने दो सूक्त (१०।३९।४० ) रचे हैं। पहले सूक्त में उसने भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के ऊपर अश्विनी कुमारों के किये गये उपकारों का उल्लेख किया है। ये व्यक्ति थे--- तुग्र-संतान च्यवान ( १०।३९।५ ) विमद, शुन्घ्यु, पुरुमित्र, बध्रीमती ( ७ ) , पेदु (१०), शंयु (१३), भृगु (१४)।   घोषा अपनी सुंदर रचनाओं में किसी भी ऋषि का मुकाबला कर सकती है वह कहती है ( १०।३९ )----

"हे अश्विनो, सारी पृथ्वी पर जाने वाला तुम्हारा सुनिर्मित रथ है, जिसे हवि वाले यजमान प्रतिदिन प्रति रात्रि और प्रति उषा पुकारते हैं। तुम्हारे पिता के सुंदर पुकारे जाने वाले नाम की तरह तुम्हारे ( नामका ) हम सदा आह्वान करते हैं।१।"

हे अश्विनों, जैसे भृगु लोग रथ को गढ़ते हैं, वैसे इस स्तोम ( स्तुति ) को तुम्हारे लिए मैंने बनाया। पति के लिए जैसे बधू को अलंकृत करते हैं वैसे ही मैंने मानो नित्य पुत्र और पौत्र को धारण करती इसे अलंकृत किया।१४।"

    दूसरे (१०।४०) सूक्त में घोषा (५) कुत्स (६), भुज्यु-वंशज, सिंजार- ( ७ ) , कृश-संजु (८ ) का उल्लेख किया है। घोषा राजा की दुहिता थी, यह उसकी निम्न ऋचा (१०।४०) से पता लगता है---- 

"हे अश्विनो,  राजा की दुहिता घुमक्कड़ा घोषा तुमसे बात करती है,  हे नेताओं ( वह ) तुमसे आज्ञा मांगती है। दिन हो या रात इस समय अश्व वाले रथी अर्बन् को तुम दमन करते हो।४।"

  अश्विद्वय  से अपनी कामना प्रकट करती हुई घोषा वर मांगती है------

" मैं उस बात को नहीं जानती, उसे तुम बतला दो, जिसे कि युवा और युवती घरों में रहकर अनुभव करते हैं। मैं स्त्री-प्रिय सुपुष्ट वीर्यवान तरुण के गृह में जाऊं, हे अश्विनो मेरी यह कामना पूरी करो।११।"

     सप्तसिंधु की आर्य कुमारियां क्या कामना करती थी, यह घोषा के इस वचन से मालूम होता है। स्वस्थ प्रिय पति पाना उनके जीवन का लक्ष्य था। घोषा के पुत्र कक्षीवान दीर्घतमा-पुत्र एक बड़े ऋषि थे, जिनकी ऋचायें ऋग्वेद के पहले मंडल के दस सूक्तों में मिलती हैं। कक्षीवान् के राजा होने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। घोषा का ब्याह जिससे हुआ, उसका भी नाम नहीं पाया जाता। उसके पुत्र सुहस्त को माता के नाम से ही याद किया गया है । पुत्र ने भी मां की तरह दोनों अश्विनी कुमारों की प्रार्थना की है ( १०।४१। १-३ ) घोषा चिरतक पिता के घर में कुंवारी बैठी रही ( १।११७।७ )

६.   जुहू---- यह भी कोई कल्पित नाम मालूम होता है। दसवें मंडल में जुहू का एक सूक्त ( १०।१०९ ) मिलता है। यद्यपि पीछे के लोगों ने जुहू  को ब्रह्मवादिनी बतलाया है, पर यहां उसने ब्रह्म की कोई बात नहीं की, और सिर्फ विश्वदेवों की स्तुति की। हां, उसने ब्रह्मचारी का उल्लेख जरूर किया है। इस सूक्त के बारे में बतलाया जाता है कि जुहू के पति बृहस्पति ने किसी कारण उसे त्याग दिया था, जिसके लिए समझा-बुझाकर, देवों ने उनको सीधे रास्ते में लाने में सफलता पाई। इसकी कुछ ऋचाओं से सप्त सिंधु के दांपत्य-जीवन पर प्रकाश पड़ता है। (१०।१०९ )----

" उन प्रथमों ने कहा ( ऐसा करने  से)  ब्रह्म-पाप लगा। फिर प्रथमजनों ( पूर्वजों ) सूर्य, वायु, जल, उग्र  सूख कर सोम और आप देवियों----ने सत्य के साथ प्रायश्चित कराया।१।"

प्रथम  सोमराज ने आकृष्ट हो ब्रह्मपत्नी को फिर से बृहस्पति को प्रदान किया। मित्र और वरुण ने उनका अनुगमन किया। होता अग्नि हाथ पकड़कर उसे ले आया।२।"

"इसका शरीर हाथ से ही पकड़ना चाहिए यह ब्रह्मजाया है--- ( यह )उन्होंने कहा। भेजे गए दूत के साथ इसने उसी तरह संपर्क नहीं किया, जैसे क्षत्रिय-का रक्षित राष्ट्र।३।"

" पुराने देवों और तपस्या में बैठे उन सात ऋषियों ने कहा--- भोमा पत्नी को ब्राह्मण के पास ले आयें, निकृष्ट (पत्नी ) भी परमस्थान पर स्थापित होती है।४।"

  " बिना पत्नी के ब्रह्मचारी रह विचरता, वह ( बृहस्पति ) देवताओं का एक अंग हो गया। सोम द्वारा लाई गई पत्नी जुहू को जैसे देवों ने, वैसे ही बृहस्पति ने प्राप्त किया।५।"

" देवों ने फिर (उसे) प्रदान किया, और फिर मनुष्यों ने प्रदान किया। राजाओं ने ( बात ) सच्ची करते ब्रह्मपत्नी को फिर प्रदान किया।६।"

 जहां तक ऋचाओं का संबंध है इसमें जुहू अग्नि देवता की पत्नी मालूम होती है। सप्तसिन्धु के आर्य पुरुष अपनी पत्नी से अनबन कर बैठते होंगे फिर उनका पुनर्मिलन कुछ इसी तरह होता होगा।

७.  दक्षिणा---- यह भी कल्पित नाम है। दक्षिणा को प्रजापति की पुत्री कहा जाता है। इसके सूक्त (१०।१०७ ) में दान-दक्षिणा की महिमा गाई गई है----

" मधवा (धनवान) सूर्य का महान तेज आविर्भत हुआ, ( उसने ) इनको और सारे जीवो को अंधकार से निरमुक्त किया। पितरों द्वारा दी गई बड़ी ज्योति आई। दक्षिणा का विस्तृत पंख दिखलाई पड़ा।१।"

"दक्षिणा वाले ( दानी ) ऊंचे द्योलोक में स्थान पाते हैं, जो अश्व-दायक ( हैं ) वह सूर्य के साथ होते हैं। सोना-दायक अमरता को पाते हैं, वस्त्र-दायक सोम के पास जा आयु को प्राप्त होते हैं।२।"

" देवों की पूजा वाली दक्षिणा दिव्य मूर्ति है। वे ( देव ) कंजूसों को तृप्त नहीं करते। और दोष से डरने वाले बहुतेरे जो नर दक्षिणा में तत्पर हैं, ( वह ) तृप्ति को प्राप्त होते हैं।३।"

" दक्षिणावान ( दानी ) पहले बुलाया जाता है। दक्षिणावान श्रेष्ठ ग्रामीणी होता है। जो पहले दक्षिणा देता है, उसी को मैं जनों का नृपति मानता हूं।५।"

" यज्ञक्र्त्ता, साम गायक उक्थ ( स्तुति ) बोलने वाले उसी को ऋषि उसी को ब्रह्मा कहते हैं। जिसने पहले दक्षिणा से आराधना की, वह शुक्र ( अग्नि ) के तीनों शरीरों को जानता है।६।"

"दक्षिणा  अश्व को, दक्षिणा गाय को देती है। दक्षिणा चंद्र ( चांदी ) और जो सोना है, उसे देती है। दक्षिणा अन्न को देती है, जो कि हमारा आत्मा है। आदमी जानते हुए दक्षिणा को कवच बनाता है।७।"

" भोज (भोजन दाता) न मरते, न दरिद्र होते, न क्लेश पाते हैं, न भोज व्यथित होते हैं। यह जो सारा भुवन और यह स्वर्ग है, सबको दक्षिणा उन्हें प्रदान करती है।८।"

" भोज पहले ही सुरभि-मूल पाते हैं। भोज सुंदर वस्त्र वाली बहू पाते हैं। भोज आंतरिक पेय सुरा को पाते हैं। जो बिना बुलाए आते हैं उन्हें भोज जीत लेते हैं।९।"

" भोज के लिए लोग शीघ्रगामी अश्व सजाते हैं। भोज के लिए वह सुंदरी कन्या है। भोज का यह घर पुष्करिणी सा देव- विमान सा अद्भुत परिष्कृत है।१०।"

    दान की महिमा आर्थों में  बहुत थी। अतिथियों को भोजन देने में वह बड़े उदार थे। हर एक संपत्तिशाली आर्य अपने घर को देव-विमान और पुष्करिणी सा देखना चाहता था।

८.   निबावरी या सिकता---- इन्हें अत्री-गोत्री ऋषिकायें बतलाया गया है, पर यह भी कल्पित नाम है, मूल रचयिता का नाम मालूम नहीं है। निबावरी ने अपनी रचनाओं में सोम की महिमा गाई है।----

" विचक्षण सौ धारों वाला द्यौ का पति सोम शब्द करता कलश में आता है। (वह) पीले वर्णमाला (हरि) कामवर्षक सिंधु के मेषों के लोमों से छाना जाता मित्र के घरों में बैठता है।११।"

" मेषलोम में यह स्तुति-सहित छाना जाता तरंगित (सोम) पक्षी जैसा चलता है। हे कवि इंद्र, तुम्हारे कर्म से द्यौ और पृथ्वी के बीच शुचि सोम स्तुति द्वारा पूत होता है।१३।"

"द्यौ- चुंबी अंतरिक्ष-पूरक भवनों में अर्पित यजिनीय द्रापि पहने, स्वर्ग में उत्पन्न (सोम) आकाश से चलता, इसके पुराने पितर (इंद्र)की सेवा करता है।१४।"

     सूक्त में कोई ऐसी बात नहीं है जिससे कहा जा सके कि इसकी कवियत्री कोई स्त्री थी।

९. यमी वैवस्वती----- यह भी कल्पित नाम है। विवस्वान की पुत्री कोई यमी थी। उसने अपने भाई यम से प्यार करना चाहा। इसी बात को यम और यमी के संवाद के रूप में यहां ( १०।१०।) बतलाया गया है।

 "यमी कहती है----"विस्तृत समुद्र में पहुंची इस स्थान में मैं सखी हो तुम्हें सखा चाहती हूं। विधाता ने ध्यान करते पृथ्वी पर पिता के श्रेष्ठ नाती को बनाये रखा।१।"

यम ने उत्तर दिया----  "( मैं ) तेरा सखा इस सख्य ( प्रेम ) को नहीं चाहता, क्योंकि तू सहोदरा होने से इसके अयोग्य है। विस्तृत द्यौ के धारण करने वाले असुर ( परमदेव ) के वीर महापुत्र चारों ओर ( हमें ) देख रहे हैं।२।"

    यमी----"वे अमर लोग इसे चाहते हैं, चाहे यह एक मर्त्य के लिए उचित न (भी ) हो। मेरे विषय में तू मन धारण कर, हमारे होने वाले ( पुत्र को ) उत्पन्न करने के लिये मेरे शरीर में प्रवेश कर।३।"

यम-----"जिसे हमने पहले कभी नहीं किया। (उसे) सत्यवादी होते उत्पादक कैसे हम झूठा करेंगे। पानी के गंधर्व जलवाली वह योषा हमारी नाभि, परम है। सो हम दोनों सहोदर हैं।४।"

 यम---- यम के प्रति मुझ यमी की कामना है, एक स्थान पर साथ सोने के लिए ( हो ) आई मैं पति के लिए जाया की तरह शरीर खोलती हूं। रथ के बड़े चक्र की तरह हम (दोनों) प्यार करें।७।"

यम-----"आगे वह युग आयंगे, ( जब )  भगिनियां  अ-भगिनियां काम करेंगी। ( किसी ) दूसरे वृषभ ( संड-मुसंड )  की बाहु का आलिंगन करो है। हे सुभगे , मुझसे अन्य को ( अपना ) पति बनाओ।१०।"

यमी---"भाई के होते यदि बहिन अनाथ होवे, तो वह भाई ही क्या? वह बहिन क्या, जो दु:ख पाये। कामवश हो मैं बहुत कह रही हूं, ( अपने ) शरीर से मेरे शरीर को तृप्त करो।११।"

 यम-----"मैं शरीर से तेरे शरीर को नहीं स्पर्श करता। बहिन के ( साथ ) अभिगमन को पाप कहते हैं। मुझसे भिन्न से तू प्रमोद प्राप्त कर। हे सुभगे, तेरा भाई यह नहीं ( करना ) चाहता।१२।"

 यम---"तुझे यम, अफसोस है मैं तेरे मन और हृदय को नहीं समझ सकती। वृक्ष को लता की तरह ( या ) रस्सी की तरह मिलकर दूसरी स्त्री ( या ) तेरा आलिंगन करती है।१३।"

यम----"हे यमी, दूसरे की कामना करो, दूसरा ( कोई ) तुझे वृक्ष को लता की तरह आलिंगन करे। उसके मन को तू चाहे या वह तुझे, मंगलमय संयोग तुझसे करे।१४।"

यम-यमी  की इन उक्तियों से दो तरुण हृदयों के प्रेममालाप का दिग्दर्शन होता है, और साथ ही यह भी, कि आर्यों में भाई- बहन का विवाह निषेध माना जाता था। बुद्ध-वचनों में इक्ष्वाकु के जैसे संभ्रांत उच्च वंश में, कम से कम आपत्काल में भाई- बहन के विवाह का उल्लेख आता है। इक्ष्वाकु के चार पुत्रों ने बहनों से शादी करके अपने कुल को चलाया, जो शाक्य-कुल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इक्ष्वाकु के ही दासीपुत्र, किंतु पीछे महान ऋषि कृष्ण ने भी अपनी सौतेली बहन से विवाह किया। जातकों में राम और सीता के विवाह को भी भाई-बहन का विवाह बतलाया गया है। इनसे यह मालूम होता है कि चाहे अति प्राचीन काल में बहन भाइयों का विवाह होता था। थाई भूमि के राजवंश में अब भी यह होता है। ईरान के ससानी राजवंश में भी से देखा जाता था, और मिस्र के फरवा भी रक्त को शुद्ध रखने के लिए ऐसा करते थे यम यमी के इस संवाद से यह जरूर मालूम होता है कि इसे सप्तसिंधु के आगे ठीक नहीं मानते थे।

  यमी वैवस्वती का एक और सूक्त  (१०।१५४ ) मिलता है, जिसकी भाषा बहुत नवीन मालूम होती है इसमें प्रेत के बारे में कहा गया है---- 

"किन्हीं ( पितरों ) के लिए सोम छाना जाता है, कोई घृत का सेवन करते हैं। हे देवापि(  प्रेत ), उनके पास तुम जाओ जिनके लिए मधु बहता है।१।"

" तपस्या के कारण जो दुर्घर्ष हैं, तपस्या से जो स्वर्ग गये, जिन्होंने महान तपस्या की, है देवापि ( प्रेत ) तुम उनके पास जाओ।२।"

"जो युद्ध में लड़ते हैं  जो शूर वहां शरीर छोड़ते हैं, और जो सहस्रों दक्षिणा देते हैं, हे देवापि, तुम उनके पास जाओ।३।"

 "वैदिक आर्य यम को मृत्यु का देवता समझते यह मानते थे, कि पितर उनके पास जाते हैं। उसी यम और मृत्यु की बातों को यामी के इस सूक्त में बतलाया गया है।"

१०. रात्रि----- भारद्वाजी रात्रि भी कल्पित ऋषिका है। रात्रि का वर्णन इस सूक्त ( १०।१२७ ) में आया है। दूसरी परंपरा के अनुसार सोभरि-पुत्र कुशिक ( विश्वामित्र के वंश के-स्थापक ) इसके ऋषि माने गये हैं गायत्री छंद होने से यह गाने की ऋचायें हैं ?

" देवी रात्रि चारों ओर आकर प्रकट हुई, उसने नक्षत्रों द्वारा सारी शोभा को धारण किया।।१।।

" देवी ने आते समय अपनी बहिन उषा को ग्रहण किया। उसने तुमको हटाया।।३।।

"ग्राम चुप हैं, बटोही चुप हैं, पक्षी चुप हैं, इच्छा वाले बाज चुप हैं।।५।।

" हमें  ५चारों ओर काला अंधकार दिखाई दे रहा है यह स्पष्ट मौजूद है वह सारण की तरह तुम उसे हटाओ।।७।।

११. लोपामुद्रा----- यह वशिष्ठ के भाई अगस्त्य की पत्नी थी। पति-वियोग सहन करने में असमर्थ लोपामुद्रा का अगस्त्य के साथ का संवाद निम्न प्रकार ( १।१७९ ) है----

(लोपामुद्रा)----पहले बीते वर्षों बुढ़ापा लाने वाली उषाओं को दिन-रात सहती रही। बुढ़ापा शरीर-शोभा को नष्ट करता है। फिर ऐसी पत्नी के पास पति क्यों जायें ?।।१।।

 "जो पुराने सत्यपाल थे, देवों के साथ सच्ची बातें करते थे। वह अंत न पा पड़े रहे। फिर"।।२।।

(अगस्त्य) ----- हम व्यर्थ नहीं थके, देव लोग हमारी रक्षा करते हैं। हम सारे भोगों को पा सकते हैं, यदि ठीक से दोनों चाहें, तो यहां सैकड़ों ले सकते।।३।।

" काम को मैंने रोका है, पर यहां-वहां कहीं से भी आ जाता है। अधीरा कामिनी लोपामुद्रा धीर उसास लेते पति का संगम करती है।।४।। 

१२.  वसुक्र-पत्नीं----इंद्र के पुत्र वसुक्र की पत्नी के नाम से एक सुक्त ( १०.।२८ ) मिलता है, जिसमें वसुक्र-पत्नी तथा इंद्र की बातें आती हैं। वसुक्र-पत्नी कहती है----

" दूसरे सारे देवता आये, मेरे ससुर यहां नहीं आये। यदि आते, तो वह भुना दाना खाते, और सोम पीते। अच्छी तरह खाकर पुनः अपने घर जाते।।१।।"

 इस सूक्त का ऋषि वसुक्र भी बतलाया गया है। इंद्र ही नहीं सप्तसिंधु के आर्य भी भुने जौ का खाना और सोम का पीना बहुत पसंद करते थे। यदन्न पुरुषो ह्मत्ति तदन्न तस्य  देवता" ( जो भोजन आदमी खाता है वही उसका देवता भी ) । 

१३.  वाक्----- अम्भृण ऋषि की पुत्री वाक् भी कल्पित नाम है। यहां वाक् ( वाणी ) देवी की महिमा वर्णन की गई है ( १०।१२५ )------

" रूद्रों वसुओं के साथ आदित्यों और सारे देवों के साथ मैं विचरण करती हूं, मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूं। मैं इंद्र-अग्नि और दोनों अश्विनी को धारण करती हूं।।१।।

१४.  विवृहा----- कश्यप-गोत्री यह ऋषिका अभी कल्पित है। इसने याक्ष्मा के विनाश के बारे में टोटका-टोने की बात कही है, (१०।१६३।१०२ )।

१५.  विश्पला---- यह ऋषिका नहीं है, पर इसके ऊपर अश्विनों के उपकार करने का उल्लेख मिलता है ( १।१८२ )----

"हे मनीषियों, यह मन में होता है: अश्विनों का तृप्तिकारक सुखद रथ आया है। वह सुकर्मा सुचिव्रत द्यौ के नाती हैं। उन्होंने विश्पला का भला किया।।१।।

१६.   विश्ववारा---- घोषा की तरह यही एक और महिला है, जिसे ऐतिहासिक कहा जा सकता है। विश्ववारा अत्रि-गोत्र में उत्पन्न हुई। इसने अपने सूक्त ( ५।२८ ) में त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और गायत्री छ्न्दों में अग्नि की महिमा गाते अपना नाम भी दिया है----

 "प्रज्वलित अग्नि द्यौलोक में किरणों को फैलाता है, उषा के सामने विस्तृत होकर शोभा देता है। हवि-सहित श्रुवा को लेकर नमस्कार के साथ देवों को पूजती विश्ववारा पूर्व की दिशा की ओर जाती है।।१।।

१७. शची------- पौलोमी शची भी कल्पित नाम है। पुराणों से हमें मालूम है, कि इंद्र-पत्नी का नाम शची था, जो असुर पुलोमा की पुत्री थी। इस सुक्त ( १०।१५९ ) में एक संतुष्ट शक्तिशाली महिला अभिमान के साथ अपनी स्थिति का वर्णन करती है----

" वह सूर्य उगा, मानो यह मेरा भाग्य उगा। मैंने सौतों को परास्त किया, पति को अपने वश में कर लिया।।१।।

" मैं केतु ( ध्वज ) हूं, मैं मस्तक हूं। मैं उग्र, सुंदर बोलने वाली हूं। पति मेरे मत के अनुसार चलता है।।२।।

" मेरे पुत्र शत्रुहंता हैं, और मेरी दुहिता शोभायमाना है। मैं खूब जीतने वाली हूं, पति के पास मेरी उत्तम प्रशंसा होती है।।३।।

 १८.  शश्वती---- अंगिरा-गोत्री यह ऋषिका भी कल्पित मालूम होती है। इसके नाम का एक मंत्र (८।१।३४ ) मिलता है, जिसमें अश्लील रति की बातें कही गई हैं। 

१९.  सिखंडिनी काश्यपी----- यह अभी कल्पित नाम है। इस सूक्त में  सोम (भांग) की महिमा गाई गई है, जिसमें कोई विशेषता नहीं है। 

२०.   श्रद्धा कमायनी----- यह भी कल्पित नाम है। इसके सूक्त ( १०।१५१ )  में श्रद्धा की महिमा गाई गई है---

" श्रद्धा से अग्नि प्रज्ज्वलित होती है, श्रद्धा से हवि होम की जाती है। ऐश्वर्य के सिर पर रहने वाली श्रद्धा को में वाणी से बतलाती हूँ।।१।।

 "हे श्रद्धे, दाता का प्रिय करो। हे श्रद्धे देने की इच्छा वाले का प्रिय करो। भोज देने वाले (भोजों)में प्रिय करो। यज्ञ करने वाले के प्रति इस मेरे कथन को करो।।२।।

२१.  सरमा-----सरमा देवों की कुतिया मानी जाती है। सप्तसिंधु के आर्यों के निर्लज्ज लूट की कामना को सरमा ने किस तरह पणियों के सामने व्यक्त किया (ऋग १०।१०८)।

२२.  सार्पराज्ञी---- यह भी कल्पित नाम है। इसके सूक्त ( १०।१६९ ) को कक्षीवान के पुत्र शबर ऋषि का भी बतलाया जाता है। इस सूक्त में गाय का वर्णन है----

 "जो गायें अपने शरीर को देवों के लिए देती हैं जिनके सारे रूपों को सोम जानता है। संतान वाली हमें दूध से परिपूर्ण करती उन गायों की गोष्ठ में लाओ।।३।।

२३.   सिकता---- यह भी कल्पित नाम है। निवावरी के साथ इसकी बनाई ऋचायें ( ९।८६।११-२० ) मिलती हैं, जिनमें सोम का वर्णन किया गया है। निवावरी के प्रकरण में ऋचायें आ गई हैं।

२४. सुदेवी---- उदास की पटरानी का उल्लेख एक ऋचा (१।११२।१९ ) में मिलता है।

२५.   सूर्या---- यह भी कल्पित नाम है। सूर्या को सविता ( सूर्य ) की पुत्री या पत्नी कहा गया है। चाहे कल्पित नाम से ही यह सूक्त ( १०।८५ ) संग्रह किया गया हो, पर इसमें आर्य-पत्नी के संबंध में बहुत सी बातें आई हैं। इस सूक्त के मंत्रों को आज भी विवाह के समय पढ़ा जाता है। सूर्या ने अपनी ऋचाओं में कहा है------

" सत्य द्वारा भूमि थामी गई है। सूर्य द्वारा द्यौ थामा गया है। सत्य द्वारा देव आदित्य द्यौ में सोम स्थित है।।१।।

" सोम से आदित्य बली हैं, सोम से पृथ्वी महान है। यह नक्षत्रों के पास सोम रखा गया है।।२।।"


  इसके बाद सूर्या कहती है----

" स्तोम ( स्तुति के मंत्र ) धुर थे, कुरीर छन्द उसका ओपश ( शिरो भूषण ) । था सूर्या के बर अश्विद्वय थे, अग्नि आगे जाने वाला दूत ( घटक ) था।।८।।"

" सोम व्याह-इच्छुक था, अश्विद्वय वर थे। पति की कामना करने वाली सूर्या को सविता ने ( अपने ) मन से अश्विनों को दिया।।९।।"

 "जब सूर्या घर को चली, तो मन इसका शकट था, और द्यौ छत  ( ओहार ) थी दोनों शुक्र दो बैल थे, ।।१०।।"

" जाते समय घुरे में फैले चक्के शुचि थे। पति के पास जाती सूर्या मनोमय रथ पर चढ़ी ।।१२।।"

" जिस उपबर्हण ( चादर ) को सविता ने प्रदान किया था, वह सूर्य के आगे-आगे चला। मघा नक्षत्रों में बैलों को हांका गया, अर्जुनी ( पूर्वा-उत्तराफाल्गुनी में ( सूर्या ) ले जाई गई है ।।१३।।"

"हे सूर्ये, नाना रूप सुनहले सुआच्छादित सुरंग सेमल के सुंदर चक्र वाले रथ पर चढ़। जाकर पति के लिए सुखमय अमृत लोग बना ।।२०।।"

 "विश्वावसु (सारे वसुओं ) को नमस्कारपूर्वक वाणी से मैं प्रार्थना करता हूं, तुम यहां से उठो, यह पतिवती है। तुम पिता के घर में बैठी दूसरी प्रसिद्ध कन्या की कामना करो , (जो ) वह तुम्हारे भाग्य से जानी है, उसे ढूंढो ।।२१।।"

"पूषन, तुझे हाथ में पकड़ कर यहां से ले जाये। दोनों अश्विन रथ द्वारा तुझे ले जायें। घरों में जा वशवाली गृहपत्नी हो घर की व्यवस्था कर ।।२६।।

"यह सुमंगली बधू है, आकर इसे तुम देख लो। इसको सौभाग्य प्रदान कर ( देवगन ) अपने-अपने घरों को जायें ।।३३।।"  

" सौभाग्य के लिए तेरे हाथ को मैं ग्रहण करता हूं। तू मुझ पति के साथ जरा अवस्था तक बनी रह। भग, अर्यमा, सविता, पुरन्धि देवों ने तुझे गृहपति धर्म के लिए मुझे प्रदान किया ।।३६।।"

"दोनों (पति-पत्नी) यहीं रहें, न बिछुड़ सारी आयु को प्राप्त करें। पुत्र और नातियों के साथ खेलते अपने घर में प्रमुदित रहें।।४२।।"

" हे इंद्र, सिंचन समर्थ हो इस (वधु) को सुपुत्रा सुभगा बनाओ। इसमें दस पुत्रों को धारण करो ,(और) पति को ग्यारहवां बनाओ ।।४५।।

" हे बधू , तू ससुर पर सम्राज्ञी हो, सास पर सम्राज्ञी हो। ननद पर सम्राज्ञी हो, देवरों पर सम्राज्ञी हो।।४६।।"

    ज्ञात हो कि ऋग्वेद की ऋषिकाओं की संख्या चाहे दो दर्जन हो, पर उनमें ऐतिहासिक घोषा और विश्ववारा ही हैं। स्त्री का स्थान उस काल में काफी ऊंचा था, पर पुरुष के समान नहीं था, यह उन ऋचाओं से मालूम होता है। सास- ससुर, ननद , देवर पर शासन करने की कामना नारी को होती थी, और सौत उसके सिर दर्द का सबसे बड़ा कारण थी। इस अध्याय से यह भी पता चलता है कि ऋग्वैदिक कालीन समाज में पुत्रों की कामना अधिक होती थी, संभवत: उसका कारण उस काल में होने वाले युद्धों के कारण हो। 

 


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